| चित्र साभार गूगल |
एक ग़ज़ल-धूप निकल जाए तो अच्छा
संक्रान्ति है मौसम ये बदल जाए तो अच्छा
भींगी हैं छतें धूप निकल जाए तो अच्छा
लो अपनी ही शाखों से बग़ावत में परिंदे
अब इनका ठिकाना ही बदल जाए तो अच्छा
अब ख़त्म हो ये लूट,घरानों की सियासत
कुछ देश का कानून बदल जाए तो अच्छा
जो दिन में अंधेरों को लिए घूम रहा था
उस सूर्य को आकाश निगल जाए तो अच्छा
मैं गीत लिखूँ कैसे कुहासे में उजाले
खिड़की से कोई चाँद निकल जाए तो अच्छा
अपराधमुक्त राज्य में दागी नहीं जीतें
हर बूथ पे जनता ये सम्हल जाए तो अच्छा
उस बार भी नाटक का विजेता था हमारा
इस बार भी जादू वही चल जाय तो अच्छा
अब गंगा को नालों से बचाना है जरूरी
गोमुख पे पड़ी बर्फ़ पिघल जाए तो अच्छा
इस बार भी सरयू के किनारे हो दिवाली
फिर राम का दीपक वही जल जाए तो अच्छा
कवि -जयकृष्ण राय तुषार
| चित्र साभार गूगल |