Saturday, 15 January 2022

एक ग़ज़ल-धूप निकल जाए तो अच्छा

 

चित्र साभार गूगल

एक ग़ज़ल-धूप निकल जाए तो अच्छा


संक्रान्ति है मौसम ये बदल जाए तो अच्छा

भींगी हैं छतें धूप निकल जाए तो अच्छा


लो अपनी ही शाखों से बग़ावत में परिंदे

अब इनका ठिकाना ही बदल जाए तो अच्छा


अब ख़त्म हो ये लूट,घरानों की सियासत

कुछ देश का कानून बदल जाए तो अच्छा


जो दिन में अंधेरों को लिए घूम रहा था

उस सूर्य को आकाश निगल जाए तो अच्छा


मैं गीत लिखूँ कैसे कुहासे में उजाले

खिड़की से कोई चाँद निकल जाए तो अच्छा


अपराधमुक्त राज्य में दागी नहीं जीतें

हर बूथ पे जनता ये सम्हल जाए तो अच्छा


उस बार भी नाटक का विजेता था हमारा

इस बार भी जादू वही चल जाय तो अच्छा


अब गंगा को नालों से बचाना है जरूरी

गोमुख पे पड़ी बर्फ़ पिघल जाए तो अच्छा


इस बार भी सरयू के किनारे हो दिवाली

फिर राम का दीपक वही जल जाए तो अच्छा

कवि -जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल


22 comments:

  1. अब ख़त्म हो ये लूट,घरानों की सियासत

    कुछ देश का कानून बदल जाए तो अच्छा

    हर शेर गहन बात कहता है । बेहतरीन ग़ज़ल ।

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    1. मकर संक्रांति पर आपको हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।सादर प्रणाम

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  2. बेहतरीन ग़ज़ल।

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  3. मकर संक्रान्ति पर आपको हार्दिक शुभकामनाएं

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  4. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (16-1-22) को पुस्तकों का अवसाद " (चर्चा अंक-4311)पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है..आप की उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी .
    --
    कामिनी सिन्हा

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    Replies
    1. हार्दिक आभार आपका।सादर अभिवादन

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  5. उम्दा भाव!
    सार्थक अस्आर।

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  6. अपराधमुक्त राज्य में दागी नहीं जीतें
    हरबूथ पे जनता ये सम्हल जाए तो अच्छा
    समसामयिक स्थितियों के लिए चेतना जगाती रचना। बहुत अच्छा१--ब्रजेंद्रनाथ

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  7. काश ऐसा हो जाये तो बहुत अच्छा है । उम्दा अभिव्यक्ति ।

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  8. सुंदर सभावनाओं की तलाश करती सुंदर उत्कृष्ट रचना ।

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  9. बहुत खूबसूरत रचना

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  10. वाह!बेहतरीन सृजन।
    संक्रान्ति है मौसम ये बदल जाए तो अच्छा
    भींगी हैं छतें धूप निकल जाए तो अच्छा.
    . वाह!

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