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| चित्र साभार गूगल |
एक गीत -मैं अपनी वंशी को टेरूंगा
गाओ कुछ
मैं अपनी
वंशी को टेरूंगा.
खेत हुए
अग्निकुण्ड
चढ़ा हुआ पारा,
नदियों को
प्यास लगी
मौसम बेचारा,
टुकड़ा भर
बादल बन
अंबर को घेरूंगा.
सूख रहे
कोकिल के कंठ
हरे पेड़ों पर,
कहाँ गयी
दूब हरी
सन्नाटा मेड़ों पर,
नीम छाँह
बनकर मैं
धूप को तरेरूँगा.
उपवन से
गंधहीन
लौटती हवाएं,
रंगहीन फूलों
को किस
जगह सजाएँ,
दर्पण से
पूंछूँगा
एक हँसी हेरूंगा.
कवि -जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |


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