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| चित्र -गूगल से साभार |
आप सभी को होली की बधाई एवं शुभकामनाएँ
एक गीत -होली
आम कुतरते हुए सुए से
मैना कहे मुंडेर की |
अबकी होली में ले आना
भुजिया बीकानेर की |
गोकुल ,वृन्दावन की हो
या होली हो बरसाने की ,
परदेसी की वही पुरानी
आदत है तरसाने की ,
उसकी आँखों को भाती है
कठपुतली आमेर की |
इस होली में हरे पेड़ की
शाख न कोई टूटे ,
मिलें गले से गले
पकड़कर हाथ न कोई छूटे ,
हर घर -आंगन महके खुशबू
गुड़हल और कनेर की |
चौपालों पर ढोल मजीरे
सुर गूंजे करताल के ,
रुमालों से छूट न पायें
रंग गुलाबी गाल के ,
फगुआ गाएं या फिर
बांचेंगे कविता शमशेर की |
कवि जयकृष्ण राय तुषार
[मेरे इस गीत को आदरणीय अरुण आदित्य द्वारा अमर उजाला में प्रकाशित किया गया था मेरे संग्रह में भी है |व्यस्ततावश नया लिखना नहीं हो पा रहा है |
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| चित्र -गूगल से साभार |



होली की ऐसी रचनाएं तो अब शायद ही पढ़ने को मिले। बहुत सुंदर गीत सर।
ReplyDeleteसादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार २७ फरवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
सुंदर
ReplyDeleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteइस होली में हरे पेड़ की
ReplyDeleteशाख न कोई टूटे ,
- wahhh
बेहद खूबसूरत गीत
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