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| चित्र साभार गूगल |
एक ताज़ा गीत -कहाँ हैं वो खिलखिलाते गाँव
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
एक ताज़ा गीत -कहाँ हैं वो खिलखिलाते गाँव
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| चित्र साभार गूगल |
एक गीत -याद करो फिर क़सम राम की
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| प्रभु श्रीराम वनवास में |
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| चित्र साभार गूगल तिरंगा |
एक देशगान.
संविधान का गर्व तिरंगा
संविधान का गर्व तिरंगा
भारत का अभिमान है.
एक -एक धागे में इसके
वीरों का बलिदान है.
शस्य श्यामला धरती
इसकी मिट्टी प्यारी है,
विविध रंग के फूलों की
यह अनुपम क्यारी है,
मानस की चौपाई सुन्दर
सामवेद का गान है.
सब तीर्थ यहाँ पर मिलते हैं
इसमें गंगा का पानी है,
ऋषियों, मुनियों का तप इसमें
यह मिट्टी ही वरदानी है,
सरहद के रक्षक सैनिक हैं
अन्नदाता यहाँ किसान है.
बहु संस्कृतियों का संगम यह
इसका हर रंग रिझाता है,
यहाँ लोकरंग का जादू है
हर मौसम गीत सुनाता है,
इसकी महिमा लिखना मुश्किल
यह भारत भूमि महान है.
चंदन वन, केसर के संग संग
यह महाकाल की ज्वाला है
यह सती, रुक्मिणी, सीता है
यह गार्गी और आपाला है,
यह शास्वत और सनातन है
यह ईश्वर का वरदान है.
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| नेताजी सुभाष चंद्र बोस |
गीत कवि
जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |
एक नवगीत -जेब कटी फागुन की
जेब फटी
फागुन की
झर गए ग़ुलाल.
फूलों में
गंध नहीं
मौसम कंगाल.
चैता के
गीत कहाँ
शहरों के हिस्से,
वक़्त की
किताबों में
टेसू के किस्से,
स्मृतियों में
मृदंग
बजते करताल.
रफू किए
चुनरी में
वासंती खेत में,
हिरण
झुण्ड प्यासा है
नदियों की रेत में
मौसम की
आँखों में
टूटा है बाल.
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
एक ताज़ा गीत -फूलों में इतवार
गीत, पपीहा
बांसुरी
वासंती श्रृंगार.
प्रेमगीत
लिखने लगा
फूलों में इतवार.
पीली -नीली
चिट्ठियां
वन में पढ़े पलाश,
नदी किनारे
खाट पर
मौसम खेले ताश,
सुबह
हवा में उड़ रहे
मेजों से अख़बार.
तन्हा बैठे
फूल को
फिर तितली की याद,
मौन मुखर
करने लगा
आँखों से संवाद,
रंगमंच पर
प्रकृति के
बदल गए किरदार.
पीली सरसों
देखकर
प्रमुदित हुए किसान,
गलियाँ
होरी गा रहीं
खाकर मगही पान.
सारंगी
शहनाइयां
बजने लगे सितार.
कवि /गीतकार
जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |
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| प्रसिद्ध लेखक/कवि/समीक्षक श्री श्रीप्रकाश मिश्र जी |
उर्दू ग़ज़ल है इश्क, मोहब्बत, महल में है
जीवन का लोकरंग तो हिंदी ग़ज़ल में है।
जयकृष्ण राय ' तुषार ' जब ऐसा लिखते हैं तब साफ जाहिर होता है कि वे हिंदी और उर्दू ग़ज़ल की परंपरा को जानते हैं और उनके फर्क को भी जानते हैं। चूकि वे ग़ज़ल हिंदी की लिख रहे हैं तो उसकी परंपरा को तो वे स्वयं निभा ही रहे होंगे और पाठक को उसको ध्यान में रखकर उसे पढ़ना या सुनना चाहिए। तब हम पाते हैं कि भारतीय जीवन के लोकरंग में जो परिवर्तन तेजी से आ रहा है उसे वे छोटी - छोटी बातों के सहारे दर्ज करते हैं। परिवर्तन के दो रंग होते हैं --शुभ और अशुभ। जो सदियों से आजमाए जीवन -मूल्यों को समृद्ध करता है, वह वरेण्य होता है, जो उसे छीजाता है, उससे किनारा करने की जरूरत होती है। इसी तरह ऐतिहासिक जीवन -प्रवाह में जो कल्मष बहता चला आया है, उसे न केवल उजागर करने की, उस पर प्रहार करने की भी जरूरत पड़ती है और उसका स्थानापन्न लखे जाने की भी जरूरत पडती है।इन चारों बातों को ध्यान में रख कर जब हम तुषार की ग़ज़लों को पढ़ते हैं तो पाते हैं कि वे अपनी बात हमारी आंखों की जद में आने वाली रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं के माध्यम से करते हैं। इससे उनकी जीवन की समृद्धि पर सूक्ष्मता से देखने की सामर्थ्य का भान तो होता है, उनकी चिंता का क्षितिज क्या है, यह भी गोचर हो जाता है। वे आज की स्त्री की साज - सज्जा के बारे में ही बात नहीं करते, उसकी सोच की भी बात करते हैं। वे सिर्फ दलित के शोषण की ही बात नहीं करते, हर बात में अपना ही हिस्सा खोजने की मानसिकता की भी बात करते हैं। जन के पक्ष में खड़े होने वाले लोगों के कलाप की विसंगतियों की ही बात नहीं करते, उनके निजी स्वार्थों की टकराहट की बात करते हैं जो संघर्ष में एका पैदा होने नहीं देती। लिखते हैं:--
सबने केवल धोखे बांटे सबने की गद्दारी जी
अबकी अपना वोट कहां पर देंगे आप तिवारी जी
जयकृष्ण आजमगढ़ के हैं ऐसे सरहदी इलाके के कि कब आजमगढ़ के हैं कब जौनपुर के, पता ही नहीं चलता। पर इसके नाते दलबदलू नहीं है, जीवन की वाचालता का पता चलता है। पढ़े हैं, बनारस में,वकालत करते हैं इलाहाबाद में। बनारस की आबोहवा में अलमस्ती अधिक है, इलाहाबाद में उसकी कसौटी थोड़ा आभिजात्य है। बनारस शहरनुमा गांव है, इलाहाबाद गांवनुमा शहर। बनारस में व्यवहार का लद्दडपन और संवेदना का खाटीपन। इलाहाबाद में रगड़ से उपजा नफासत है और विचारों का खुलापन। इलाहाबाद जो देता है वह पीढ़ियों से बसे स्थानीय लोगों के माध्यम से नहीं देता, नये आये लोगों के माध्यम से देता है। पर तभी जब वे इलाहाबाद के अखाड़े में रगड़ जाते हैं। यही कारण है कि आज बाहर से आए तमाम अकादमिक और प्रतिभासंपन्न लोग कुछ विशेष नहीं दे पा रहे हैं, क्योंकि इस रगड़ाई से भागे हुए हैं। पर तुषार दे पा रहे हैं , क्योंकि अपनी अनुकूलित निजी दुनिया से बाहर आ कर जनजीवन में भागीदार बन कर लिख रहे हैं। तभी वे देख पा रहे हैं कि
गले में क्रास पहने हैं मगर चंदन लगाती है
सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है
या फिर
आसमानों के क ई रंग हैं सूरज हम तो
एक ही रंग में पश्चिम की दिशा ढलते हैं
इस संकलन को देखते हुए उम्मीद बनती है कि वे इलाहाबाद के साहित्यिक माहौल में जबरदस्त हस्तक्षेप तो करेंगे ही,उनका अवदान देश के स्तर पर पसरेगा। बाकी बातें संग्रह पढ़ कर तय करें।
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
साँवला सा
हो गया है
चाँदनी का रूप.
फूल -पत्तों में
खड़ी है
शाल ओढ़े धूप.
घने कोहरे
में नदी तट,
नाव सोई है,
साफ़ मौसम
की कहीं
तसवीर खोई है,
बन्द घर
पीने लगे हैं
चाय, कॉफी, सूप.
नई दिल्ली में
किताबों की
नुमाइश है,
विश्व भाषा
बने हिन्दी
यही ख़्वाहिश है,
हर विधा में
सजे सुन्दर
ज्ञान का स्तूप.
कुछ दिनों के
बाद
पीले फूल महकेंगे,
खुशबुओं का
ख़त लिए
फिर भ्रमर बहकेंगे,
फिर यही
मौसम लगेगा
इस धरा का भूप.
कवि -जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |
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| सफऱ के बाहर ग़ज़ल संग्रह कवि /प्रकाशक अरुण कुमार |
रोशनी की तलाश करते हैं
अब ये मंज़र उदास करते हैं
या ग़र थोड़ी औकात बड़ी हो जाती है
रिश्तों से सौगात बड़ी हो जाती है
या
लूट के समान से घर भर गए
छोड़िये इंसान कितने मर गए
आपने फेंके थे जितनी दूर तक
उससे भी आगे बहुत पत्थर गए
या
गुलों से ख़ार का किस्सा अलग है
मेरे किरदार का किस्सा अलग है
यह संग्रह ग़ज़ल समीक्षक डॉ नित्यानंद श्रीवास्तव जी को समर्पित है
मैं गज़लकार और प्रकाशक अरुण कुमार को इस संग्रह के लिए बधाई और शुभकामनायें देता हूँ. पाठकों के बीच यह लोकप्रिय हो
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| परिचय |
सफऱ के बाहर
मूल्य-250
प्रकाशक-भूमिजा समस्तीपुर, बिहार
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| आदरणीय श्री रमेश ग्रोवर जी और श्री आमोद माहेश्वरी जी |
एक पुराना गीत सन 2011 में लिखा गया
चलो मुश्किलों का हल ढूँढें खुली किताबों में
मित्रों दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला 10 जनवरी से 18 जनवरी को लगने वाला है. पुस्तकें सच्ची मित्र होती हैं.
बीत रहे हैं
दिन सतरंगी
केवल ख़्वाबों में |
चलो मुश्किलों
का हल ढूँढें
खुली किताबों में |
इन्हीं किताबों में
जन- गण -मन
तुलसी की चौपाई ,
इनमें ग़ालिब -
मीर ,निराला
रहते हैं परसाई ,
इनके भीतर
जो खुशबू वो
नहीं गुलाबों में |
इसमें कई
विधा के गेंदें -
गुड़हल खिलते हैं ,
बंजर मन
को इच्छाओं के
मौसम मिलते हैं |
लैम्पपोस्ट में
पढ़िए या फिर
दफ़्तर, ढाबों में |
तनहाई से
हमें किताबें
दूर भगाती हैं ,
ज्ञान अगर
खुद सो जाए
तो उसे जगाती हैं ,
इनमें जो
परवाज़ ,कहाँ
होती सुर्खाबों में ?
इनको पढ़कर
कई घराने
गीत सुनाते हैं ,
इनकी जिल्दों में
जीवन के रंग
समाते हैं ,
ये न्याय सदन ,
संसद के सारे
प्रश्न -जबाबों में |
प्रयागराज एक सांस्कृतिक शहर -लेखक गुंजन अग्रवाल आज यह पुस्तक व्हीलर की दुकान में दिखी तो मैंने खरीद लिया. इसके कवर पृष्ठ पर फ्लैप के स्था...