Thursday, 29 January 2026

एक ताज़ा गीत -बांसुरी वाले अधर

 

चित्र साभार गूगल

एक ताज़ा गीत -कहाँ हैं वो खिलखिलाते गाँव 


कहाँ हैं 
वो खिलखिलाते 
गाँव वो हँसते शहर.
कहाँ हैं 
वो डाकिए 
लाते हुए अच्छी ख़बर.

रंग फागुन के 
हुए मैले 
न टेसू खिल रहे,
मोड़ पर 
तन्हा मुसाफिर 
पर कहाँ हम मिल रहे,
मौसमों की 
आँख पीली 
हो गयी धुंधली नज़र.

फूल बासी 
चढ़ रहे हैं 
देवता के माथ पर,
नहीं मेहंदी 
हलद के रंग 
चाँदनी के हाथ पर,
मिल रहे हैं 
खुशबुओं के
संग हवाओं में ज़हर.

नदी वन के 
पास कैसा 
मौन है वातावरण,
गीत बासी हैं 
किताबों में
सुभग बस आवरण,
बहुत दिन
हो गए देखे
बांसुरी वाले अधर.

कवि/गीतकार जयकृष्ण राय तुषार
चित्र साभार गूगल


Wednesday, 28 January 2026

एक गीत -भारत माँ के पुण्य धाम की

 

प्रभु श्रीराम की खड़ाऊ



एक गीत -याद करो फिर क़सम राम की

सबका साथ 
विकास सभी का 
याद करो फिर क़सम राम की.
सही राह पर 
लौटो भाई 
नहीं लड़ाई किसी काम की.

अगड़ा, पिछड़ा 
दलित छोड़ दो 
दुश्मन का षड्यंत्र तोड़ दो,
अभी सनातन की 
जय बोलो 
हर आँधी की दिशा मोड़ दो.
संतो बनो 
संत के जैसा 
महिमा घटे न चार धाम की.

सिंहासन है 
राम खड़ाऊ 
भरत, लाल सा चरित बनाओ,
राजधर्म है 
कठिन तपस्या 
मातृभूमि की महिमा गाओ,
अब भी 
सुनो अयोध्या जाकर 
सरयू कहती कथा राम की.

तुलसी को 
रैदास को समझो 
समझो दास कबीरा को,
राजमहल को 
मिट्टी समझो 
पढ़लो भाई मीरा को,
गौरव गाथा
लिखो सुनहरी
भारत माँ के पुण्य धाम की.

काशी में
गंगा के तट पर
डिम-डिम-डिम डमरू बाजे,
मुरली की
धुन यमुना तीरे
वृंदावन में भक्ति विराजे,
नदी, नर्मदा
कावेरी में
सजी रहे आरती शाम की.
प्रभु श्रीराम वनवास में


माँ नर्मदा आरती



Sunday, 25 January 2026

एक देशगान -संविधान का गर्व तिरंगा

 

चित्र साभार गूगल तिरंगा


एक देशगान.

संविधान का गर्व तिरंगा 


संविधान का गर्व तिरंगा 

भारत का अभिमान है.

एक -एक धागे में इसके 

वीरों का बलिदान है.


शस्य श्यामला धरती 

इसकी मिट्टी प्यारी है,

विविध रंग के फूलों की 

यह अनुपम क्यारी है,

मानस की चौपाई सुन्दर

सामवेद का गान है.


सब तीर्थ यहाँ पर मिलते हैं 

इसमें गंगा का पानी है,

ऋषियों, मुनियों का तप इसमें 

यह मिट्टी ही वरदानी है,

सरहद के रक्षक सैनिक हैं

अन्नदाता यहाँ किसान है.


बहु संस्कृतियों का संगम यह 

इसका हर रंग रिझाता है,

यहाँ लोकरंग का जादू है 

हर मौसम गीत सुनाता है,

इसकी महिमा लिखना मुश्किल 

यह भारत भूमि महान है.


चंदन वन, केसर के संग संग

यह महाकाल की ज्वाला है

यह सती, रुक्मिणी, सीता है

यह गार्गी और आपाला है,

यह शास्वत और सनातन है

यह ईश्वर का वरदान है.

नेताजी सुभाष चंद्र बोस


गीत कवि 

जयकृष्ण राय तुषार

Saturday, 24 January 2026

एक गीत -फूलों में गंध नहीं

 

चित्र साभार गूगल

एक नवगीत -जेब कटी फागुन की 

जेब फटी 

फागुन की 

झर गए ग़ुलाल.

फूलों में 

गंध नहीं 

मौसम कंगाल.


चैता के 

गीत कहाँ 

शहरों के हिस्से,

वक़्त की 

किताबों में 

टेसू के किस्से,

स्मृतियों में

मृदंग

बजते करताल.


रफू किए

चुनरी में

वासंती खेत में,

हिरण

झुण्ड प्यासा है

नदियों की रेत में

मौसम की

आँखों में

टूटा है बाल.


चित्र साभार गूगल


Thursday, 22 January 2026

एक ताज़ा गीत -प्रेम गीत लिखने लगा फूलों में इतवार

 

चित्र साभार गूगल

एक ताज़ा गीत -फूलों में इतवार 


गीत, पपीहा 

बांसुरी 

वासंती श्रृंगार.

प्रेमगीत 

लिखने लगा 

फूलों में इतवार.


पीली -नीली 

चिट्ठियां 

वन में पढ़े पलाश,

नदी किनारे 

खाट पर 

मौसम खेले ताश,

सुबह 

हवा में उड़ रहे 

मेजों से अख़बार.


तन्हा बैठे 

फूल को 

फिर तितली की याद,

मौन मुखर 

करने लगा 

आँखों से संवाद,

रंगमंच पर

प्रकृति के

बदल गए किरदार.


पीली सरसों 

देखकर 

प्रमुदित हुए किसान,

गलियाँ

होरी गा रहीं

खाकर मगही पान.

सारंगी 

शहनाइयां 

बजने लगे सितार.


कवि /गीतकार

जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल


Tuesday, 20 January 2026

मेरी किताब पर समीक्षा. श्री श्रीप्रकाश मिश्र जी

 

प्रसिद्ध लेखक/कवि/समीक्षक श्री श्रीप्रकाश मिश्र जी
समीक्षक श्री श्रीप्रकाश मिश्र कवि कथाकर और सुप्रसिद्ध आलोचक हैं. उन्नयन पत्रिका में सम्पादक भी रहे हैं. आभार मिश्र जी का.

उर्दू ग़ज़ल है इश्क, मोहब्बत, महल में है 

जीवन का लोकरंग तो हिंदी ग़ज़ल में है।


जयकृष्ण राय ' तुषार ' जब ऐसा लिखते हैं तब साफ जाहिर होता है कि वे हिंदी और उर्दू ग़ज़ल की परंपरा को जानते हैं और उनके फर्क को भी जानते हैं। चूकि वे ग़ज़ल हिंदी की लिख रहे हैं तो उसकी परंपरा को तो वे स्वयं निभा ही रहे होंगे और पाठक को उसको ध्यान में रखकर उसे पढ़ना या सुनना चाहिए। तब हम पाते हैं कि भारतीय जीवन के लोकरंग में जो परिवर्तन तेजी से आ रहा है उसे वे छोटी -  छोटी बातों के सहारे दर्ज करते हैं। परिवर्तन के दो रंग होते हैं --शुभ और अशुभ। जो सदियों से आजमाए जीवन -मूल्यों को समृद्ध करता है, वह वरेण्य होता है, जो उसे छीजाता है, उससे किनारा करने की जरूरत होती है। इसी तरह ऐतिहासिक जीवन -प्रवाह में जो कल्मष बहता चला आया है, उसे न केवल उजागर करने की, उस पर प्रहार करने की भी जरूरत पड़ती है और उसका स्थानापन्न लखे जाने की भी जरूरत पडती है।इन चारों बातों को ध्यान में रख कर जब हम तुषार की ग़ज़लों को पढ़ते हैं तो पाते हैं कि वे अपनी बात हमारी आंखों की जद में आने वाली रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं के माध्यम से करते हैं। इससे उनकी जीवन की समृद्धि पर सूक्ष्मता से देखने की सामर्थ्य का भान तो होता है, उनकी चिंता का क्षितिज क्या है, यह भी गोचर हो जाता है। वे आज की स्त्री की साज - सज्जा के बारे में ही बात नहीं करते, उसकी सोच की भी बात करते हैं। वे सिर्फ दलित के शोषण की ही बात नहीं करते, हर बात में अपना ही हिस्सा खोजने की मानसिकता की भी बात करते हैं। जन के पक्ष में खड़े होने वाले लोगों के कलाप की विसंगतियों की ही बात नहीं करते, उनके निजी स्वार्थों की टकराहट की बात करते हैं जो संघर्ष में एका पैदा होने नहीं देती। लिखते हैं:--


सबने केवल धोखे बांटे सबने की गद्दारी जी

अबकी अपना वोट कहां पर देंगे आप तिवारी जी


जयकृष्ण आजमगढ़ के हैं ऐसे सरहदी इलाके के कि कब आजमगढ़ के हैं कब जौनपुर के, पता ही नहीं चलता। पर इसके नाते दलबदलू नहीं है, जीवन की वाचालता का पता चलता है। पढ़े हैं, बनारस में,वकालत करते हैं इलाहाबाद में। बनारस की आबोहवा में अलमस्ती अधिक है, इलाहाबाद में उसकी कसौटी थोड़ा आभिजात्य है। बनारस शहरनुमा गांव है, इलाहाबाद गांवनुमा शहर। बनारस में व्यवहार का लद्दडपन और संवेदना का खाटीपन। इलाहाबाद में रगड़ से उपजा नफासत है और विचारों का खुलापन। इलाहाबाद जो देता है वह पीढ़ियों से बसे स्थानीय लोगों के माध्यम से नहीं देता, नये आये लोगों के माध्यम से देता है। पर तभी जब वे इलाहाबाद के अखाड़े में रगड़ जाते हैं। यही कारण है कि आज बाहर से आए तमाम अकादमिक और प्रतिभासंपन्न लोग कुछ विशेष नहीं दे पा रहे हैं, क्योंकि इस रगड़ाई से भागे हुए हैं। पर तुषार दे पा रहे हैं , क्योंकि अपनी अनुकूलित निजी दुनिया से बाहर आ कर जनजीवन में भागीदार बन कर लिख रहे हैं। तभी वे देख पा रहे हैं कि


गले में क्रास पहने हैं  मगर चंदन लगाती है 

सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है


या फिर 


आसमानों के क ई रंग हैं सूरज हम तो 

एक ही रंग में पश्चिम की दिशा ढलते हैं 


इस संकलन को देखते हुए उम्मीद बनती है कि वे इलाहाबाद के साहित्यिक माहौल में जबरदस्त हस्तक्षेप तो करेंगे ही,उनका अवदान देश के स्तर पर पसरेगा। बाकी बातें संग्रह पढ़ कर तय करें।



Sunday, 18 January 2026

एक पुराना गीत -यह वसंत

 

चित्र साभार गूगल




एक गीत -यह वसंत भी प्रिये !
 तुम्हारे होठों का अनुवाद है 

तुमसे ही 
कविता में लय है 
जीवन में संवाद है |
यह वसंत भी 
प्रिये ! तुम्हारे 
होठों का अनुवाद है |

तुम फूलों के 
रंग ,खुशबुओं में 
कवियों के स्वप्नलोक में ,
लोककथाओं 
जनश्रुतियों में 
प्रेमग्रंथ में कठिन श्लोक में ,
जलतरंग पर 
खिले कमल सी 
भ्रमरों का अनुनाद है |

तुम्हें परखने 
और निरखने में 
सूखी कलमों की स्याही ,
कालिदास ने 
लिखा अनुपमा 
हम तो एक अकिंचन राही
तेरा हँसना 
और रूठना 
प्रियतम का आह्लाद है |
चित्र -गूगल से साभार 

गीत कुम्भ -यह प्रयाग है कवि जयकृष्ण राय तुषार


 मित्रों 2001 महाकुम्भ में इस गीत को मैंने लिखा था. आकाशवाणी कलाकारों ने इसे गाया है विडिओ भाई दिव्यांश द्विवेदी ने बनाया है. आज मौनी अमावस्या है. सभी को हार्दिक शुभ. भारत में और विश्व में सनातन आस्था अपराजेय बनी रही. लोगों का मार्गदर्शन सनातन के संत करते रहें. शुभकामनायें. आप सभी को प्रयाग का पुण्य फल मिले.



Sunday, 11 January 2026

एक गीत -शाल ओढ़े धूप

 

चित्र साभार गूगल
एक गीत मौसम का

साँवला सा 

हो गया है 

चाँदनी का रूप.

फूल -पत्तों में 

खड़ी है 

शाल ओढ़े धूप.


घने कोहरे 

में नदी तट,

नाव सोई है,

साफ़ मौसम 

की कहीं 

तसवीर खोई है,

बन्द घर 

पीने लगे हैं 

चाय, कॉफी, सूप.


नई दिल्ली में 

किताबों की 

नुमाइश है,

विश्व भाषा 

बने हिन्दी 

यही ख़्वाहिश है,

हर विधा में 

सजे सुन्दर 

ज्ञान का स्तूप.


कुछ दिनों के 

बाद 

पीले फूल महकेंगे,

खुशबुओं का 

ख़त लिए 

फिर भ्रमर बहकेंगे,

फिर यही 

मौसम लगेगा 

इस धरा का भूप.

कवि -जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल


Friday, 9 January 2026

पुस्तक समीक्षा -सफऱ के बाहर

 

सफऱ के बाहर ग़ज़ल संग्रह
कवि /प्रकाशक अरुण कुमार
कल डाक से कवि /प्रकाशक अरुण कुमार समस्तीपुर द्वारा भेजा ग़ज़ल संग्रह मिला अच्छी गज़लों का संकलन है इसमें 127 ग़ज़लें हैँ. अरुण कुमार की ग़ज़लें खूबसूरत हैं. इन्होने अपना प्रकाशन भी शुरू किया है. प्रकाशन का नाम भूमिजा है. रेखांकन भी बढ़िया है जिसे अरुण जी ने स्वयं बनाया है.


रोशनी की तलाश करते हैं 

अब ये मंज़र उदास करते हैं 

या ग़र थोड़ी औकात बड़ी हो जाती है 

रिश्तों से सौगात बड़ी हो जाती है 

या 

लूट के समान से घर भर गए 

छोड़िये इंसान कितने मर गए 

आपने फेंके थे जितनी दूर तक 

उससे भी आगे बहुत पत्थर गए 

या 

गुलों से ख़ार का किस्सा अलग है 

मेरे किरदार का किस्सा अलग है 

यह संग्रह ग़ज़ल समीक्षक डॉ नित्यानंद श्रीवास्तव जी को समर्पित है

मैं गज़लकार और प्रकाशक अरुण कुमार को इस संग्रह के लिए बधाई और शुभकामनायें देता हूँ. पाठकों के बीच यह लोकप्रिय हो

परिचय
पुस्तक-ग़ज़ल संग्रह

सफऱ के बाहर

मूल्य-250

प्रकाशक-भूमिजा समस्तीपुर, बिहार
.

Saturday, 3 January 2026

चलो मुश्किलों का हल ढूंढे खुली किताबों में

 

आदरणीय श्री रमेश ग्रोवर जी और श्री आमोद माहेश्वरी जी



एक पुराना गीत सन 2011 में लिखा गया

 चलो मुश्किलों का हल ढूँढें खुली किताबों में 

मित्रों दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला 10 जनवरी से 18 जनवरी को लगने वाला है. पुस्तकें सच्ची मित्र होती हैं.


बीत रहे हैं 

दिन सतरंगी 

केवल  ख़्वाबों में |

चलो मुश्किलों 

का हल ढूँढें 

खुली  किताबों में |


इन्हीं किताबों में 

जन- गण -मन 

तुलसी की चौपाई ,

इनमें ग़ालिब -

मीर ,निराला 

रहते हैं परसाई ,

इनके भीतर 

जो खुशबू वो 

नहीं  गुलाबों में |


इसमें कई 

विधा के गेंदें  -

गुड़हल खिलते हैं ,

बंजर  मन  

को इच्छाओं  के  

मौसम मिलते हैं |

लैम्पपोस्ट में 

पढ़िए या फिर 

दफ़्तर, ढाबों में |


तनहाई से 

हमें किताबें 

दूर भगाती हैं ,

ज्ञान अगर 

खुद सो जाए 

तो उसे जगाती हैं ,

इनमें  जो 

परवाज़ ,कहाँ 

होती सुर्खाबों में ?


इनको पढ़कर 

कई घराने 

गीत सुनाते हैं ,

इनकी  जिल्दों में 

जीवन के रंग 

समाते हैं ,

ये न्याय सदन ,

संसद के सारे 

प्रश्न -जबाबों में |





प्रयागराज एक सांस्कृतिक शहर -लेखक गुंजन अग्रवाल

 प्रयागराज एक सांस्कृतिक शहर -लेखक गुंजन अग्रवाल  आज यह पुस्तक व्हीलर की दुकान में दिखी तो मैंने खरीद लिया. इसके कवर पृष्ठ पर फ्लैप के स्था...