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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
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| श्री जगदीश बरवाल कुंद समीक्षक और वरिष्ठ साहित्यकार आज़मगढ़ |
गीतों और गजलों के क्षेत्र में नये प्रयोगों के लिए जाने जाने वाले प्रयागराज के प्रख्यात कवि श्री जयकृष्ण राय 'तुषार 'ने मेरे पुत्र अवनीश कुमार बरनवाल एडवोकेट,उच्च न्यायालय,प्रयागराज के माध्यम से अपनी सद्यःप्रकाशित कृति" सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है "(गजल संग्रह)मुझे उपलब्ध कराया है।144पृष्ठीय इस गजल संग्रह में प्रेम, राष्ट्रभक्ति,प्रकृति,पर्यावरण,वर्तमान समय में वोट की राजनीति,होली,कुशीनगर,प्रयागराज,वाराणसी,लखनऊ की संस्कृति,माँ का महत्व,जनहित की भावना,आदि विविध विषयों से समन्वित 132गजलें हैं ।पुस्तक का प्रकाशन,राजकमल प्रकाशन समूह के प्रमुख प्रकाशक 'लोक भारती प्रकाशन प्रयागराज 'से हुआ है।सरल,सरस शब्दों में पठनीय एवं रोचक शैली में लिखी गयीं सभी गजलें महत्वपूर्ण हैं ।
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| सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है |
गजल को परिभाषित करते हुए कवि ने लिखा-
शोख इठलाती हुई परियों का है ख्वाब गजल।
झील के पानी में उतरे तो है महताब गजल।
कूचा-ए-जानाॅ,भी मजदूर भी,साकी ही नहीं ।
एक शायर की ये दौलत यही असबाब गजल।
यही नहीं,बल्कि गजल को धूप में शामियाना बताते हुए तथा इसे दर्द,तनहाई,गरीबी से भी,जोडते हुए
उन्होंने लिखा-
कुछ हकीकत कुछ फसाना है गजल ।
धूप में इक शामियाना है गजल।
दर्द,तनहाई,गरीबी, मुफलिसी
सरफरोशी का तराना है गजल ।
कवि की भावनायें राष्ट्रीयता से ओतप्रोत हैं ।वह कहता है -
मैं जब भी जन्म लूॅ गंगा तुम्हारी गोद रहे।
यही तिरंगा,हिमालय ये हरसिंगार रहे ।
ये मुल्क ख्वाब से सुन्दर है जन्नतों से बडा।
यहाँ पे सन्त,सिद्ध और दशावतार रहे ।
देश की वर्तमान राजनीति ढपोरशंखी हो गयी है।उनके वादों और जमीनी सच्चाइयों में कोई तालमेल नहीं है।द्रष्टव्य हैं-
इलेक्शन में हुनर जादूगरी सब देखिये इनकी ।
ये हर भाषण में सडकें और टूटे पुल बनाते हैं ।
हमारे वोट से संसद में नाकाबिल पहुॅचते हैं,
जो काबिल हैं गुनाहों से हमारे हार जाते हैं ।
ये संसद हो गयी बाजार इसके माइने क्या हैं,
बिके प्यादों से हम सरकार का बहुमत जुटाते हैं ।
नित्य प्रति वृक्षों के काटे जाने से उत्पन्न पर्यावरणीय संकट पर भी कवि की दृष्टि जाती है-
ऑधियों से अब दरख्तों को बचाना चाहिए ।
हमको मीठे फल परिन्दों को ठिकाना चाहिए ।
×× ××
तरक्की की कुल्हाडों ने हजारो पेड काटे हैं ।
जरूरत को कहाँ कोई नफा नुकसान दिखता है।
संस्कारों से विमुख होते जा रहे समाज को देख कर कवि द्रवित है।वह छल,कपट,लोभ से मुक्त एक सत्समाज की रचना करना चाहता है:
छल कपट और लोभ का यदि संवरण हो जाएगा।
स्वर्ग सा इस देश का वातावरण हो जाएगा ।
आप पश्चिम के ही दर्शन में अगर डूबे रहे,
वेद,गीता,उपनिषद का विस्मरण हो जाएगा ।
पुस्तक की प्रत्येक गजल नैतिकता से, नारों से पूरित है।सभी में प्रेम,मुहब्बत,अपनापन एवं नव निर्माण विषयक कोई न कोई सन्देश छिपा है।इस अच्छे गजल संग्रह के लिए श्री तुषार जी को बहुत बहुत बधाई ।
श्री जयकृष्ण राय तुषार मूल रूप से जनपद आजमगढ़ के विकास खण्ड ठेकमा के ग्राम पसिका के मूल निवासी हैं ।वह सम्प्रति प्रयाग उच्च न्यायालय में अधिवक्ता,राज्य विधि अधिकारी,उ0प्र0सरकार हैं ।पूर्व में उनके तीन कविता संकलन,सदी को सुन रहा हूँ मैं,कुछ फूलों के कुछ मौसम के तथा मेडों पर बसन्त प्रकाशित हैं ।भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित तथा श्री रवीन्द्र कालिया द्वारा सम्पादित "हिन्दी की बेहतरीन गजलें "एवं साहित्य अकादमी से प्रकाशित एवं श्री माधव कौशिक द्वारा सम्पादित "समकालीन हिन्दी गजल"आदि कई साझा संकलनों में उनकी गजलें प्रकाशित हो चुकी हैं । पत्र पत्रिकाओं में भी उनकी रचनायें प्रकाशित होती रहती हैं ।उ0प्र0हिन्दी संस्थान एवं अन्य अनेक संगठनों/संस्थाओं द्वारा उन्हें पुरस्कृत,सम्मानित किया गया है ।
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| लाल किला -चित्र गूगल से साभार |
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र -गूगल से साभार |
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| चित्र साभार गूगल |
एक पुराना गीत -
गीत नहीं मरता है साथी
गीत नहीं
मरता है साथी
लोकरंग में रहता है |
जैसे कल कल
झरना बहता
वैसे ही यह बहता है |
खेतों में ,फूलों में
कोहबर
दालानों में हँसता है ,
गीत यही
गोकुल ,बरसाने
वृन्दावन में बसता है ,
हर मौसम की
मार नदी के
मछुआरों सा सहता है |
इसको गाती
तीजनबाई
भीमसेन भी गाता है ,
विद्यापति
तुलसी ,मीरा से
इसका रिश्ता नाता है ,
यह कबीर की
साखी के संग
लिए लुकाठी रहता है |
यही गीत था
जिसे जांत के-
संग बैठ माँ गाती थी ,
इसी गीत से
सुख -दुःख वाली
चिट्ठी -पत्री आती थी ,
इसी गीत से
ऋतुओं का भी
रंग सुहाना रहता है |
सदा प्रेम के
संग रहा पर
युद्ध भूमि भी जीता है ,
वेदों का है
उत्स इसी से
यह रामायण, गीता है ,
बिना शपथ के
बिना कसम के
यह केवल सच कहता है |
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| चित्र साभार गूगल |
पेंटिंग्स गूगल से साभार
कल शाम सेन्ट्रल G. S. T परिसर में कवि गोष्ठी का आयोजन हुआ मेरे ग़ज़ल संग्रह का विमोचन भी हुआ. सभी आयुक्त एवं अपर आयुक्त गण मौजूद थे. आयोजन की जिम्मेदारी वरिष्ठ अनुवादक श्री उमेश कुमार मौर्य जी की थी. तीन दिवसीय पुस्तक प्रदर्शनी का समापन भी कल था. ऑफिस के सभी अधिकारी कर्मचारी इस साहित्य कुम्भ में शामिल थे.
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| मेरा काव्य पाठ |
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| ग्रुप फोटो |
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| मेरे ग़ज़ल संग्रह का विमोचन G. S. T. आयुक्त महोदय एवं अपर आयुक्त श्री रजनीकांत मिश्र जी एवं एम. रहमान |
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| ग्रुप फोटो |
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| चित्र साभार गूगल |
एक ताज़ा प्रेमगीत
बहुत दिनों के
बाद आज फिर
फूलों से संवाद हुआ.
हँसी -ठिठोली
मिलने -जुलने का
किस्सा फिर याद हुआ.
पानी की लहरों
पर तिरते
जलपंछी टकराये फिर,
पत्तों में उदास
बुलबुल के
जोड़े गीत सुनाये फिर
आज प्रेम की
लोक कथा का
भावपूर्ण अनुवाद हुआ.
खुले -खुले
आँगन में कोई
खुशबू वंशी टेर रही,
भ्रमरों को
सतरंगी तितली की
टोली फिर घेर रही,
बंदी गृह से
जैसे कोई
मौसम फिर आज़ाद हुआ.
कवि जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |
एक ताज़ा गीत.कलम ख़ामोश थी आज कुछ कोशिश किए.
कोई चिड़िया
नीलगगन से
मेरे आँगन में आ जाये.
मेरे प्रेम गीत को
फिर से फूल
पत्तियाँ, मौसम गाये.
बाहर का मौसम
अच्छा है
लेकिन मन में धुंध, तपन है,
चाँद कहीं पर
सोया होगा
खाली -खाली नीलगगन है,
खुशबू ओढ़े
बैठे होंगे
घाटी में पेड़ों के साये.
हिरन दौड़ते
तेज धूप में
नदियों की भुरभुरी रेत में,
फसलों से
बतियाते होंगे
कितने राँझे -हीर खेत में,
हरी भरी मेंड़ों पर
कोई जोड़ा
नीलकंठ आ जाये.
सूने वन में
बनजारों के संग
वंशी, मादल का मिलना,
उस पठार की
भूमि धन्य है
जिसमें हो फूलों का खिलना,
गंगा की धारा में
जैसे कोई
मांझी शंख बजाये.
कवि जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |
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| भगवान केदारनाथ |
दिनांक 28-10-2025 को आयकर भवन प्रयागराज में हिन्दी पखवाड़ा के अंतर्गत कवि गोष्ठी का आयोजन हुआ एवं विभागीय कर्मचारियों का सम्मान. कार्यक्रम में आयकर आयुक्त श्रीमती मोना मोहंती जी. आयकर आयुक्त अपील तिवारी जी, अपर आयकर आयुक्त श्री शिव कुमार राय जी, उपनिदेशक राजभाषा हरिकृष्ण तिवारी जी, श्री मकरध्वज मौर्य जी और विभाग के श्रोतागण कविगण मौजूद रहे. प्रबुद्ध श्रोताओं के बीच एक खूबसूरत शाम का आनंद मिला.
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| आयकर आयुक्त श्रीमती मोना मोहंती को अपना ग़ज़ल संग्रह भेंट करते हुए दिनांक 28-10-2025 |
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| कवि गोष्ठी में मकरध्वज मौर्य जी मुझे सम्मानित करते हुए |
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| आयकर आयुक्त, आयकर आयुक्त अपील तिवारी जी राजभाषा उपनिदेशक हरिकृष्ण तिवारी एवं कवि गण |
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| आयकर आयुक्त महोदया से सम्मान ग्रहण करते हुए |
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| अपर निदेशक आयकर श्री शिव कुमार राय जी आयकर आयकर आयुक्त अपील श्री तिवारी जी मध्य में आयकर आयुक्त सुश्री मोना मोहंती जी |
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| प्रयागपथ |
प्रयागपथ का नया अंक मोहन राकेश पर एक अनुपम विशेषांक है. इलाहाबाद विश्व विद्यालय जगदीश गुप्त, कृष्णा सोबती,अमरकांत डॉ रघुवंश, श्रीलाल शुक्ल और मोहन राकेश की जन्मशती मना रहा है.पत्रिका के यशस्वी सम्पादक भाई हितेश कुमार सिंह ने एक अविस्मरणीय विशेषांक मोहन राकेश पर निकाला है.प्रयागपथ का हर अंक पठनीय और संग्रहणीय रहता है.इस अंक में उच्चतम न्यायालय के ख्यातिलब्ध माननीय न्यायमूर्ति आदरणीय पंकज मित्तल साहब की कविताएं भी पढ़ने को मिलीं. इस अंक में मेरी किताब *सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है *पर भाई अनिल कुमार सिंह की समीक्षा प्रकाशित है. इस अंक में स्मृतियों के अंतर्गत श्री हेरम्ब चतुर्वेदी जी और डॉ हरीश त्रिवेदी का आलेख है. यतीश कुमार और काव्या कटारे की कहानियाँ और सुभाष राय, प्रदीप कुमार सिंह, अभिमन्यु प्रताप सिंह, लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता लोकेश श्रीवास्तव, सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज, माननीय न्यायमूर्ति श्री पंकज मित्तल जी परमेश्वर फुंकवालऔर शीला चौहान की कविताएं भी हैँ. मोहन राकेश पर कलम चलाने वाले रचनाकार नामदेव निधि सिंह मुष्टाक अली, रेणु अरोड़ा, मेरी हांसदा, श्रीधर करूणानिधि, विजेंद्र प्रताप सिंह, सत्यदेव त्रिपाठी, आभा गुप्ता ठाकुर,, राजाराम भादू, कुमार वीरेंद्र, अजय वर्मा, शम्पा शाह, राहुल शर्मा, एकता मंडल, खेमकरण सोमन, रमेश प्रजापति, जमुना कृष्ण राज, मलय पानेरी, सुनीता,, उपन्यास लोक में आशुतोष कुमार सिंह, डायरी डेरा कुबेर कुमावत मधुरेश, आशुतोष, असलम हसन,. समीक्षा कालम में विजय बहादुर सिंह, राजेश मल्ल, मिताश्री श्रीवास्तव, सुलोचना दास, रंजीत सिंह और अनिल कुमार शामिल हैँ. मैं सम्पादक और समीक्षा लेखक के प्रति आभारी हूँ.
पत्रिका प्रयागपथ
सम्पादक -श्री हितेश कुमार सिंह
सह सम्पादक -डॉ नीतू सिंह
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| चित्र साभार गूगल |
एक ताज़ा गीत -सारा जंगल सुनता है
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
भारतीय सेना विश्व की सबसे अनुशासित और बहादुर सेना है. भारत ही नहीं इस सेना के त्याग और बलिदान की गाथा समूचे विश्व में गुंजायमान है. भारत की एकता अखंडता और विविधता इनके पुरुषार्थ और पराक्रम से सुरक्षित है. नायक वो नहीं जो फिल्मों में दिखते हैँ. देश के असली हीरो नभ. जल और थल को सुरक्षित रखने वाले हमारे सैनिक हैं. जो पर्वत, पठार, दलदल, रेगिस्तान में भी कष्ट सहकर अपने देश को सुरक्षित रखते हैं. प्रयागराज में 6 बटालियन N. C. C. में आज ऐसे ही देश के बहादुर नायक आदरणीय सूबेदार मेज़र हरविंदर सिंह जी से मुलाक़ात कर मैंने अपनी पुस्तक भेंट किया. भारतीय सेना की गाथा युगों तक गाये जाने लायक है. समूचे विश्व में मानवता के लिए जहाँ जरूरत पड़ी भारतीय सेना ने अपने साहसिक अभियानों से देश का मान बढ़ाया. जयहिंद वन्देमातरम. सत श्री अकाल
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| सूबेदार मेज़र श्री हरविंदर सिंह जी को अपनी पुस्तक भेंट करते हुए |
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| चित्र साभार गूगल |
एक गीत -मोरपँखी गीत
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| चित्र साभार गूगल |
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| समीक्षक श्री अनुपम परिहार |
मेरे ग़ज़ल संग्रह*सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है*
पर अनुपम परिहार की कलम
ग़ज़लकार जयकृष्ण राय 'तुषार' ने मुलाक़ात करके मुझे अपना ग़ज़ल संग्रह ‘सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है’ भेंट किया। इस संग्रह को मैंने आज शाम से पढ़ना शुरू किया है। पढ़ते हुए महसूस हुआ कि इन ग़ज़लों में समकालीन जीवन की विडम्बनाएँ, मनुष्य की जद्दोजहद और बदलते परिवेश के मार्मिक चित्र बड़ी सहजता से सामने आते हैं।
इन ग़ज़लों की ख़ासियत यह है कि तुषार अपने परिवेश और समाज से गहरे जुड़े हुए हैं। वे प्रतीकों और बिम्बों के सहारे पाठक को सोचने पर मज़बूर करते हैं।
आज़ादी पेड़ हरा है ये मौसमों से कहो न सूख पाएं ये परिंदों को एतबार रहे।
इन पंक्तियों में कवि ने आज़ादी को हरियाली और जीवन से जोड़कर उसकी नमी और ताज़गी बचाए रखने का संदेश दिया है।
बाज़ारवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति के दबाव में बदलते घरेलू परिदृश्य का यथार्थ उनकी इन पंक्तियों में साफ़ झलकता है।
खिलौने आ गए बाज़ार से लेकिन हुनर का क्या
मेरी बेटी कहां अब शौक से गुड़िया बनाती है।
यह शेर केवल एक बच्ची की आदत के बदलने की बात नहीं है, बल्कि बदलते समय में लुप्त हो रही रचनात्मकता और सहजता की ओर भी इशारा करता है।
संग्रह में औरत की बदलती भूमिका पर भी बेहद सटीक टिप्पणी मिलती है।
न चूड़ी है, ना बिंदी है, न काजल, मांग का टीका है
यह औरत कामकाजी है, यह चेहरा इस सदी का है।
यह शेर समकालीन स्त्री के संघर्ष और आत्मनिर्भरता का स्पष्ट व सशक्त चित्रण करता है। यहाँ तुषार किसी आदर्श स्त्री की कल्पना नहीं करते, बल्कि वास्तविक जीवन से उठाए गए दृश्य को कविता में दर्ज़ करते हैं।
इस संग्रह की ग़ज़लें समाज के भीतर चल रहे छोटे-छोटे परिवर्तनों को गहरी संवेदनशीलता के साथ दर्ज़ करती हैं। तुषार की भाषा सधी हुई है और उनका शिल्प सहज। यह संग्रह निश्चय ही पाठक को अपने समय और परिवेश की पड़ताल करने को विवश करता है।
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| मेरा ग़ज़ल संग्रह |
18/08/25
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| चित्र साभार गूगल |
तमाम फूल, तितलियों में भी उदास रहा
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
एक ग़ज़ल
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
एक ग़ज़ल
साज साजिन्दे सभी महफ़िल में घबराने लगे
सब घराने आपकी मर्ज़ी से ही गाने लगे
भूल जाएगा ज़माना दादरा, ठुमरी, ग़ज़ल
अब नई पीठी को शापिंग माल ही भाने लगे
जिंदगी भी दौड़ती ट्रेनों सी ही मशरूफ़ है
आप मुद्द्त बाद आए और अभी जाने लगे
झील में पानी, हवा में ताज़गी मौसम भी ठीक
फूल में खुशबू नहीं भौँरे ये बतियाने लगे
प्यार से लोटे में जल चावल के दाने रख दिए
फिर कबूतर छत में मेरे हाथ से खाने लगे
हम भी बचपन में शरारत कर के घर में छिप गए
अब बड़े होकर ज़माने भर को समझाने लगे
बीच जंगल से गुजरते अजनबी को देखकर
आदतन ये रास्ते फिर फूल महकाने लगे
देखकर प्रतिकूल मौसम उड़ गए संगम से जो
ये प्रवासी खुशनुमा मौसम में फिर आने लगे
कवि जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |
नई किताब
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| आदरणीय श्री ज्ञानप्रकाश विवेक जी |
हिन्दी ग़ज़ल व्यापकता और विस्तार-लेखक श्री ज्ञान प्रकाश विवेक
हिन्दी ग़ज़ल पर वाणी प्रकाशन से आदरणीय ज्ञानप्रकाश विवेक की बेहतरीन आलोचनात्मक पुस्तक प्राप्त हुई. 371 पेज की यह पुस्तक है इसमें विशद आलेख हैं. मुझे भी शामिल किया गया है. बहुत मेहनत के साथ कुल पांच वर्षों के अथक प्रयास से यह पुस्तक प्रकाशित हुई है.इस पुस्तक में कुल तीन खण्ड हैं बहुत बहुत बधाई आदरणीय ज्ञान प्रकाश जी
पुस्तक -हिन्दी ग़ज़ल व्यापकता और विस्तार
लेखक -श्री ज्ञान प्रकाश विवेक
प्रकाशक वाणी प्रकाशन नई दिल्ली
मूल्य सजिल्द -795
आदरणीय श्री रमेश ग्रोवर जी और श्री आमोद माहेश्वरी जी एक पुराना गीत सन 2011 में लिखा गया चलो मुश्किलों का हल ढूँढें खुली किताबों में मित्...