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| श्री निर्मल शुक्ल संपादक -शब्दायन |
शब्दायन -संपादक -श्री निर्मल शुक्ल
एक नज़र /एक समीक्षा -
शब्दायन की प्रस्तुति और सामग्री देखकर चमत्कृत और अभिभूत हूँ | यह एक दस्तावेजी कार्य सम्पन्न हुआ है |किसी आलोचक और किसी साहित्य के दुकानदार के वश की बात नहीं है कि वह गीत /नवगीत विधा के आवेग को बाधित कर सके |उसकी राह रोक सके |यह विधा सिर पर चढ़कर बोलती है |जब सिर पर चढ़कर बोलती है तो सहज ही अपनी स्वीकृति प्राप्त कर लेती है या कहें अपना हक प्राप्त कर लेती है |पिछले लगभग चार दशकों से सारे आलोचकीय षडयंत्रों के बाद भी कविता की इस आदिम विधा ने अपना लोहा मनवाने पर मजबूर किया है |उसी उजली परंपरा कि यह एक मजबूत कड़ी है |पुस्तक हाथ मे लेकर यह अनुभूति होती है ..जैसे गीत विधा का सागर ही हमारे मनप्राण में लहरा उठा है |यह एक साधक ही कर सकता था जो काम भाई निर्मल शुक्ल ने बड़ी कुशलता से किया है |आने वाले समय में यह महासंग्रह और अधिक प्रासंगिक होता चला जाएगा |यह बात मैं दावे के साथ कह रहा हूँ |यह तत्व कतई निष्फल नहीं जाएगा और आने वाले काल के भाल पर सदा सर्वदा देदीप्यमान रहेगा | भाई निर्मल शुक्ल ने गीत ऋषि की तरह अपनी परंपरा और नए काल बोध के बीच एक सेतु तैयार कर हम सब गीत विधा के रचनाकारों को कृतज्ञ होने का अवसर दिया है |मैं उनकी अकूत निष्ठा को अपने अशेष प्रणाम देता हूँ |--यश मालवीय
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| नवगीत पर एक प्रतिनिधि साझा संकलन या संदर्भ ग्रंथ |
एक समीक्षा -
हिंदी गीतों की बांसुरी पर जब -जब धूल की परतें जमीं है ,जब -जब उसकी लय बाधित हुई है किसी न किसी साहित्य मनीषी के द्वारा उस पर जमी धूल को साफ कर उसे चमकदार और लयदार बनाने का काम किया गया है |यह प्रयास दशकों पूर्व डॉ0 शंभुनाथ सिंह ने नवगीत दशक और नवगीत अर्द्धशती निकालकर किया था उसके पूर्व पाँच जोड़ बांसुरी का सम्पादन डॉ0 चन्द्र्देव द्वारा किया गया था |कालांतर में डॉ0 दिनेश सिंह ने नवगीत पर आधारित पत्रिका नए पुराने निकालकर नवगीत की वापसी का काम किया था ,डॉ0 कन्हैयालाल नंदन ने गीत समय निकालकर नवगीत को स्थापित करने का प्रयास किया |लेकिन हाल के दिनों मे डॉ0 राधेश्याम बंधु द्वारा संपादित नवगीत के नए प्रतिमान प्रकाशित हुआ |सबसे ताजातरीन प्रयास अभी हाल में नवगीत के चर्चित कवि और उत्तरायण पत्रिका के संपादक श्री निर्मल शुक्ल द्वारा शब्दायन का सम्पादन कर किया गया |जब कोई बड़ा काम किया जाता है तो उसकी आलोचना भी होती है उसमें कुछ कमियाँ भी होती है ,लेकिन कोई पहल करना या कोई बड़ा काम करना मुश्किल होता है| आलोचना करना बहुत आसान काम है |निर्मल शुक्ल द्वारा संपादित इस महासंग्रह मे कुल एक हजार चौसठ पृष्ठ हैं |पुस्तक का मूल्य एक हजार दो सौ रक्खा गया है | यह ग्रंथ नवगीत के शोध छात्रों के लिए बहुत उपयोगी हो सकता है |संपादक निर्मल शुक्ल ने इस पुस्तक के प्रथम खंड मे दृष्टिकोण के अंतर्गत नवगीत पर नवगीतकारों की टिप्पणी या परिभाषा प्रकाशित किया है |खंड दो में लगभग चौतीस कवियों के नवगीत प्रकाशित हैं |खंड तीन में भी कुछ गीतकारों के गीत प्रकाशित हैं |खंड चार सबसे वृहद खंड है जिसमें अधिकाधिक नवगीतकारों के गीत /नवगीत उनके जीवन परिचय के साथ प्रकाशित हैं |पुस्तक के आखिर में आभार और परिचय और प्रारम्भ में संपादक द्वारा समपादकीय भी लिखा गया है |श्री निर्मल शुक्ल द्वरा किया गया यह प्रयास बहुत ही सरहनीय है और आने वाले दिनो में गीत /नवगीत की दशा और दिशा दोनों ही बदलने में समर्थ होगा |पुस्तक की साज -सज्जा भी सरहनीय है |श्री निर्मल शुक्ल जी को मैं अपनी ओर से और हिंदी नवगीत के पाठकों और कवियों को ओर से बधाई देता हूँ और उनके इस महत्वपूर्ण कार्य को नमन करता हूँ |
संकलन से हिन्दी के सुपरिचित गीत कवि डॉ0 कुँवर बेचैन का एक गीत -
संकलन से हिन्दी के सुपरिचित गीत कवि डॉ0 कुँवर बेचैन का एक गीत -
बहुत प्यारे लग रहे हो
बहुत प्यारे लग रहे हो
ठग नहीं हो ,किन्तु फिर भी
हर नज़र को ठग रहे हो
बहुत प्यारे लग रहे हो |
दूर रहकर भी निकट हो
प्यास में ,तुम तृप्ति घट हो
मैं नदी की इक लहर हूँ
उम नदी का स्वच्छ तट हो
सो रहा हूँ किन्तु मेरे
स्वप्न में तुम जग रहे हो
बहुत प्यारे लग रहे हो |
देह मादक, नेह मादक
नेह का मन गेह मादक
और यह मुझ पर बरसता
नेह वाला मेह मादक
किन्तु तुम डगमग पगों में
एक संयत पग रहे हो
बहुत प्यारे लग रहे हो |
अंग ही हैं सुघर गहने
हो बदन पर जिन्हें पहने
कब न जाने आऊँगा मैं
यह जरा सी बात कहने
यह कि तुम मन की अंगूठी के
अनूठे नग रहे हो
बहुत प्यारे लग रहे हो | कवि -डॉ0 कुँवर बेचैन
पुस्तक का नाम -शब्दायन
संपादक -डॉ0 निर्मल शुक्ल
प्रकाशन -उत्तरायण प्रकाशन
मूल्य -एक हजार दो सौ रूपये मात्र
मूल्य -एक हजार दो सौ रूपये मात्र
लखनऊ संपर्क -09839825062

