![]() |
| चित्र -गूगल से साभार |
गीत -इनसे कुछ मत कहना साथी
परधानों के
हिस्से आई
खेतों की हरियाली |
मजदूरों के
हिस्से स्लम की
बहती गन्दी नाली |
इनसे कुछ
मत कहना साथी
मौसम हुए पठारी ,
जंगल को
झुलसा देने की
है पूरी तैयारी ,
रोटी -दाल
हमें क्या देंगे
छीन रहे ये थाली |
सिर पर
भारी बोझ
हवा का रुख खिलाफ़ है ,
सत्ता
जिसकी- उसका
सारा कर्ज माफ़ है ,
सूदखोर
के लिए फसल की
हम करते रखवाली |
खेल तमाशा
और सियासत
चाहे जितना कर लो ,
लेकिन इस
निरीह जनता का
कुछ दुःख राजा हर लो ,
जनता होगी
तब होंगे ये
इन्द्रप्रस्थ ,वैशाली |

