Thursday, 24 February 2011

ग़ज़ल: तितलियाँ अच्छी लगीं

चित्र गूगल से साभार 
एक गज़ल -तितलियाँ अच्छी लगीं 
फूल, जंगल, झील, पर्वत घाटियाँ अच्छी लगीं 
दूर तक बच्चों को उड़ती तितलियाँ अच्छी लगीं |

जागती आँखों ने देखा इक मरुस्थल दूर तक 
स्वप्न में जल में उछ्लतीं मछलियाँ अच्छी लगीं |

मूंगे -माणिक से बदलते हैं कहाँ किस्मत के खेल 
हाँ मगर उनको पहनकर उँगलियाँ अच्छी लगीं |

देखकर मौसम का रुख तोतों के उड़ते झुंड को 
पके गेहूं की सुनहरी बालियाँ अच्छी लगीं |

दूर थे तो सबने मन के बीच सूनापन भरा 
तुम निकट आये तो बादल बिजलियाँ अच्छी लगीं |

उसके मिसरे पर मिली जब दाद तो मैं जल उठा 
अपनी ग़ज़लों पर हमेशा तालियाँ अच्छी लगीं |

जब जरूरत हो बदल जाते हैं शुभ के भी नियम 
घर में जब चूहे बढे तो बिल्लियाँ अच्छी लगीं |


चित्र -गूगल से साभार 

[मेरी यह ग़ज़ल आजकल फरवरी 2007 में प्रकाशित है ]

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