Tuesday, 8 February 2011

दो ग़ज़लें : कवि सुरेन्द्र सिंघल

कवि -सुरेन्द्र सिंघल 
परिचय -
सुरेन्द्र सिंघल हिंदी गज़ल में एक जाना पहचाना नाम है | २५ मई १९४८ को बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश में जन्मे इस कवि की गजले देश की विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित होतीं रही हैं | डी .एच .लारेंस की कविताओं पर समीक्षा पुस्तक Where the Demon Speaks प्रकाशित हो चुकी है | सुरेन्द्र सिघल की इंग्लिश में लिखी कविताएँ अंग्रेजी की पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं हैं | जे .वी .जैन पी .जी .कालेज के अंग्रेजी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत सुरेन्द्र सिंघल रामधारी सिंह दिनकर सम्मान सहित कई सम्मानों से सम्मानित हो चुके |हिंदी गज़ल में सुरेन्द्र सिघल का अंदाज बिलकुल निराला है | सवाल ये है  गज़ल पर इनकी चर्चित पुस्तक है जो मेधा बुक्स, दिल्ली से प्रकाशित है : सुरेन्द्र सिंघल जी की दो ग़ज़लें आज हम आपके साथ साझा कर रहे हैं .......

से साभार

(१)

वो केवल हुक्म देता है सिपहसालार जो ठहरा
मैं उसकी जंग लड़ता हूँ ,मैं बस हथियार जो ठहरा |

दिखावे की ये हमदर्दी ,तसल्ली खोखले वादे
मुझे सब झेलने  पड़ते हैं ,मैं बेकार जो ठहरा |

घुटन लगती न जो कमरे में एक दो खिड़कियाँ होतीं
मैं केवल सोच सकता हूँ किरायेदार जो ठहरा |

तू भागमभाग में इस दौर की शामिल हुई ही क्यों ?
मैं कैसे साथ दूँ तेरा मैं कम रफ़्तार जो ठहरा |

मोहबत्त दोस्ती ,चाहत वफ़ा ,दिल और कविता से
मेरे इस दौर को परहेज है बीमार जो ठहरा |

उसे हर शख्स को अपना बनाना खूब आता है
मगर वो खुद किसी का भी नहीं, हुशियार जो ठहरा |
                     

(२)

जिक्र मत छेड़ तू यहाँ दिल का
कर न बर्बाद वक्त महफ़िल का |

उससे मिलने का वक्त आया है
गूंज जाये न सायरन मिल का |

रेस्तरां में हूँ उसके साथ मगर
खौफ मुझको है चाय के बिल का |

मैं ये समझूंगा जीत है मेरी
हाथ कापें तो मेरे कातिल का |

पांव मेरे हैं रास्ते उनके
खूब है ये सफर भी मंजिल का |


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