Saturday, 11 April 2026

एक गीत -जिस पावन मिट्टी में खिलते

  

चित्र साभार गूगल 

एक गीत -जिस पावन मिट्टी में खिलते 


जिस पावन मिट्टी में खिलते 
ये फूल उसे महकाते हैं.
हम भारत माँ के बच्चे हैं 
भारत के गीत सुनाते हैं.

ब्रह्म कमल की खुशबू इसमें 
गंगा निर्मल बहती है,
भक्ति भाव से सरयू माता 
रामकथा को कहती है,
राधा जी के संग स्याम जहाँ 
निधि वन में रास रचाते हैं.

इस मिट्टी का रंग सलोना 
मौसम यहाँ बदलते हैं,
लोकरंग के साथ विविधता 
साथ लिए हम चलते हैं,
हम आज़ादी का महापर्व 
उत्सव की तरह मनाते हैं.

विंध्य, नीलगिरि और हिमांचल 
खुलकर इसमें हँसते हैं,
इस नंदन कानन में जाने 
कितने पंछी बसते हैं,
मोर नाचते, हिरन खेलते 
झरने गीत सुनाते हैं.

भारत माँ की पावन छवि को 
फिर  सोने में मढ़ते हैं,
जो भी अनगढ़ पत्थर हैं 
हम उनको फिर से गढ़ते हैं,
हम अहं तोड़ते असुरों का 
लंका भी हमीं जलाते हैं 


कवि /गीतकार 
जयकृष्ण राय तुषार 
भारत माता चित्र साभार गूगल 


5 comments:

  1. आपके द्वारा रचित इस सुन्दर गीत का पारायण करके मन आह्लादित हो गया आदरणीय तुषार जी

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    Replies
    1. भाई साहब को सादर अभिवादन. हार्दिक आभार सहित

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  2. आपने देश की विविधता और संस्कृति को बहुत सुंदर तरीके से जोड़ा है। गंगा, सरयू और हिमालय जैसे चित्र मन में साफ उभरते हैं। मुझे इसमें भक्ति और प्रकृति का संतुलन बहुत अच्छा लगा। आपने देशभक्ति को सिर्फ नारे तक नहीं रखा, बल्कि उसे भावनाओं में उतारा है।

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  3. मनोबल बढ़ाने के लिए आभार. सादर अभिवादन

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  4. क्या बात है बेहद सुंदर गीत।
    सादर।
    -------
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार १४ अप्रैल २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    ReplyDelete

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एक गीत -जिस पावन मिट्टी में खिलते

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