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| चित्र साभार गूगल |
एक ताज़ा प्रेमगीत
बहुत दिनों के
बाद आज फिर
फूलों से संवाद हुआ.
हँसी -ठिठोली
मिलने -जुलने का
किस्सा फिर याद हुआ.
पानी की लहरों
पर तिरते
जलपंछी टकराये फिर,
पत्तों में उदास
बुलबुल के
जोड़े गीत सुनाये फिर
आज प्रेम की
लोक कथा का
भावपूर्ण अनुवाद हुआ.
खुले -खुले
आँगन में कोई
खुशबू वंशी टेर रही,
भ्रमरों को
सतरंगी तितली की
टोली फिर घेर रही,
बंदी गृह से
जैसे कोई
मौसम फिर आज़ाद हुआ.
कवि जयकृष्ण राय तुषार
चित्र साभार गूगल
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आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में रविवार 23 नवंबर , 2025 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
ReplyDeleteबहुत सुंदर रचना
ReplyDeleteहार्दिक आभार अभिवादन सहित
Deleteसुंदर
ReplyDeleteआपको सादर प्रणाम
Deleteसुंदर संवाद हुआ फूलों से ।
ReplyDeleteहार्दिक आभार. सादर प्रणाम
Deleteआज फिर फूलों से संवाद हुआ बहुत सुंदर ।
ReplyDeletebahut sundar lambe samy baad aapko padha
ReplyDeleteहार्दिक आभार. सादर अभिवादन
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