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चित्र साभार गूगल |
एक ग़ज़ल
ग़ुम हुए अपनी ही दुनिया में सँवरने वाले
हँसके मिलते हैं कहाँ राह गुजरने वाले
घाट गंगा के वही नाव भी केवट भी वही
अब नहीं राम से हैं पार उतरने वाले
फैसले होंगे मगर न्याय की उम्मीद नहीं
सच पे है धूल गवाहान मुकरने वाले
अब तो बाज़ार की मेंहदी लिए बैठा सावन
रंग असली तो नहीं इससे उभरने वाले
ढूँढता हूँ मैं हरेक शाम अदब की महफ़िल
जिसमें कुछ शेर तो हों दिल में उतरने वाले
कवि जयकृष्ण राय तुषार
सभी चित्र साभार गूगल
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर सोमवार 21 जुलाई 2025 को लिंक की जाएगी ....
ReplyDeletehttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
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आपका हार्दिक आभार. सादर अभिवादन
Deleteवाह
ReplyDeleteआपका हृदय से आभार सर. सादर अभिवादन
Deleteसबकुछ बदल रहा है , पर फिर भी एक उम्मीद एतबार की अभी भी कायम है ।
ReplyDeleteआपका हृदय से आभार. सादर प्रणाम
Deleteवाह! सच है और लाजवाब भी।
ReplyDeleteआपका दिल से शुक्रिया. सादर अभिवादन
Deleteसुन्दर
ReplyDeleteहार्दिक आभार आपका
Deleteवाह! तुषार जी ,बहुत खूब!!
ReplyDeleteहार्दिक आभार आपका. सादर प्रणाम
Deleteबहुत खूब
ReplyDeleteहार्दिक आभार. सादर अभिवादन
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