Saturday, 19 July 2025

एक ग़ज़ल -अब तो बाज़ार की मेंहदी लिए बैठा सावन

  

चित्र साभार गूगल

एक ग़ज़ल 


ग़ुम हुए अपनी ही दुनिया में सँवरने वाले 

हँसके मिलते हैं कहाँ राह गुजरने वाले 


घाट गंगा के वही नाव भी केवट भी वही 

अब नहीं राम से हैं पार उतरने वाले 


फैसले होंगे मगर न्याय की उम्मीद नहीं 

सच पे है धूल गवाहान मुकरने वाले 


अब तो बाज़ार की मेंहदी लिए बैठा सावन

रंग असली तो नहीं इससे उभरने वाले


ढूँढता हूँ मैं हरेक शाम अदब की महफ़िल

जिसमें कुछ शेर तो हों दिल में उतरने वाले



कवि जयकृष्ण राय तुषार

सभी चित्र साभार गूगल

14 comments:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर सोमवार 21 जुलाई 2025 को लिंक की जाएगी ....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

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    1. आपका हार्दिक आभार. सादर अभिवादन

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    1. आपका हृदय से आभार सर. सादर अभिवादन

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  3. सबकुछ बदल रहा है , पर फिर भी एक उम्मीद एतबार की अभी भी कायम है ।

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    1. आपका हृदय से आभार. सादर प्रणाम

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  4. वाह! सच है और लाजवाब भी।

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    1. आपका दिल से शुक्रिया. सादर अभिवादन

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  5. वाह! तुषार जी ,बहुत खूब!!

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    1. हार्दिक आभार आपका. सादर प्रणाम

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  6. Replies
    1. हार्दिक आभार. सादर अभिवादन

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