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चित्र साभार गूगल |
एक गीत -सूनेपन का माथ सजा दो
सूनेपन का
माथ सजा दो
चन्दन, रोली.
सुविधाओं ने
छीन लिया है
हँसी -ठिठोली.
रंग -गंध से
रिक्त हुई
फूलों की घाटी,
परदेसी को
याद कहाँ
अब सोंधी माटी,
मन को
ऊर्जा देती
अब भी गँवई बोली.
गीतों से
गायब होते
मौसम बहार के,
संध्याएँ
अब मौन
नहीं हैं स्वर सितार के,
दीप शिखाएँ
ढूँढ रही हैँ
ठुमरी, होली.
आँगन ही
अब नहीं
चाँदनी कौन निहारे,
कृत्रिम समय
को पुनः
बदलना होगा प्यारे,
आओ
नदियों में
फेंके आटे की गोली.
जयकृष्ण राय तुषार
बहुत सुंदर
ReplyDeleteहार्दिक आभार आपका
Deleteसुन्दर रचना
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