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चलो कि रस्मे मोहब्बत पे एतबार तो है
मेरी विजय पे न थीं तालियाँ न दोस्त रहे
मेरी शिकस्त का इन सबको इंतजार तो है
हजार नींद में एक फूल छू गया था हमें
हजार ख़्वाब था लेकिन वो यादगार तो है
गुजरती ट्रेनें रुकीं खिड़कियों से बात हुई
उस अजनबी का हमें अब भी इंतजार तो है
तुम्हारे दौर में ग़ालिब ,नज़ीर ,मीर सही
हमारे दौर में भी एक शहरयार तो है
अब अपने मुल्क की सूरत जरा बदल तो सही
तेरा निज़ाम है कुछ तेरा अख्तियार तो है
हमारा शहर तो बारूद के धुंए से भरा

