Tuesday, 13 September 2011

मेरी एक गज़ल-हमीं से रंज


हमीं से रंज ,ज़माने से उसको प्यार तो है 
चलो कि  रस्मे मोहब्बत पे एतबार तो है 

मेरी विजय पे न थीं  तालियाँ न दोस्त रहे 
मेरी शिकस्त का इन सबको इंतजार तो है 

हजार नींद में एक फूल छू गया था हमें 
हजार ख़्वाब था लेकिन वो यादगार तो है 

गुजरती ट्रेनें रुकीं खिड़कियों से बात हुई 
उस अजनबी का हमें अब भी इंतजार तो है 

तुम्हारे दौर में ग़ालिब ,नज़ीर ,मीर सही 
हमारे दौर में भी एक शहरयार तो है 

अब अपने मुल्क की सूरत जरा बदल तो सही 
तेरा निज़ाम है कुछ तेरा अख्तियार तो है 

हमारा शहर तो बारूद के धुंए से भरा 
तुम्हारे शहर का मौसम ये खुशगवार तो है 
[सभी चित्र गूगल से साभार ]

चलो मुश्किलों का हल ढूंढे खुली किताबों में

  आदरणीय श्री रमेश ग्रोवर जी और श्री आमोद माहेश्वरी जी एक पुराना गीत सन 2011 में लिखा गया  चलो मुश्किलों का हल ढूँढें खुली किताबों में  मित्...