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चित्र -गूगल से साभार |
दहशत में
उड़े मचाते शोर |
जंगल के
सीने पर चढ़कर
बैठा आदमखोर |
संध्याओं के
हाथ जले हैं
पँख तितलियों के ,
कितनी तेज
धार वाले नाख़ून
उँगलियों के ,
फंदा डाल
गले में लटकी हुई
सुनहरी भोर |
इतना सब कुछ हुआ
मगर ये दिन भी
कहाँ अछूता ,
फर्जी
हर मुठभेंड़ कहाँ तक
लिखता इब्नबतूता ,
फिर बहेलिये
खींच रहे हैं
नये जाल की डोर |
सपनीली
आँखों में भी हैं
सपने डरे हुए ,
तपती हुई
रेत में सौ -सौ
चीतल मरे हुए ,
जलविहीन
मेघों के सम्मुख
संध्याओं के
ReplyDeleteहाथ जले हैं
पँख तितलियों के ,
कितनी तेज
धार वाले नाख़ून
उँगलियों के ,
फंदा डाल
गले में लटकी हुई
सुनहरी भोर |
... dare hue sapne , gahan abhivyakti
यही आज की सच्चाई है. सुन्दर प्रस्तुति.
ReplyDeleteसपनीली
ReplyDeleteआँखों में भी हैं
सपने डरे हुए ,
तपती हुई
रेत में सौ -सौ
चीतल मरे हुए ,
जलविहीन
मेघों के सम्मुख
कत्थक करते मोर
कालखण्ड भले ही बदल रहा हो किन्तु परिस्थितियां तो विकट से विकटतम की दिशा में ही जा रही हैं ।
गहन अभिव्यक्ति......आभार !
ReplyDeletehttp://shayaridays.blogspot.com
ReplyDeleteसुन्दर लिखा है ...आपको ढेरों बधाई व शुभकामना. ...
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