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चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार |
कैसे लिख दें
शाम सुहानी
इतना ऊँचा तापमान है |
प्यासी चिड़िया
लौट रही है गुमसुम
सूखे हुए ताल से ,
अँजुरी भर थे
फूल उन्हें भी
हवा उड़ा ले गई डाल से ,
बाहर भी
आंधियां तेज हैं
अंदर भी ठहरा उफान है |
इच्छाओं के
पांव थक गये
पथरीली राहों में चलते ,
हमको बस
जुगनू दिखलाकर
मौसम के हरकारे छलते ,
झोपड़ियों में
स्याह रात है
महलों में बस दीपदान है |
इत्र नहीं अब
महज पसीने
आँसू से भींगा रुमाल है ,
अम्मां ने
खत लिखकर पूछा
बेटा कैसा हालचाल है ,
परीकथाओं वाले
सपनों में अब
केवल बियाबान है |
बहुत दिन हुए
चंदा देखे
पानी की लहरों को गिनते ,
लुकाछिपी का
खेल खेलते
चरवाहों की वंशी सुनते ,
इन्द्रधनुष की
आभा मद्धम
धुँआ -धुँआ सा आसमान है |
हमको बस
ReplyDeleteजुगनू दिखलाकर
मौसम के हरकारे छलते ,
अम्मां ने खत लिखकर पूछा
बेटा कैसा हालचाल है ,
परीकथाओं वाले सपनों में
अब केवल बियाबान है |
शब्द-शब्द संवेदना भरा है...सहज प्रवाहमय सुन्दर रचना.
इच्छाओं के
ReplyDeleteपांव थक गये
पथरीली राहों में चलते ,
हमको बस
जुगनू दिखलाकर
मौसम के हरकारे छलते ,
झोपड़ियों में
स्याह रात है
महलों में बस दीपदान है |
बहुत बढ़िया ...संवेदनशील और हृदयस्पर्शी पंक्तियाँ
बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने लाजवाब रचना लिखा है जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!
ReplyDeletemadhur geet!
ReplyDeleteबहुत ही सुंदर नवगीत है, एक एक पंक्ति साँचे में ढली हुई लगती है। हार्दिक बधाई स्वीकार करें जय कृष्ण राय जी।
ReplyDeleteजुगनू दिखलाकर
ReplyDeleteमौसम के हरकारे छलते
बहुत सुन्दर लिखा है .जो बिम्ब उभर रहा है बहा ले जा रहा है.
बहुत ही सुंदर नवगीत है तुषार जी लेकिन पलाश पर भी एक गीत लिख ही दें... हम प्रतीक्षा में हैं...
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