सलीका बांस को बजने का जीवन भर नहीं होता
बिना होठों के वंशी का भी मीठा स्वर नहीं होता
किचन में माँ बहुत रोती है पकवानों की खुशबू में
किसी त्यौहार पर बेटा जब उसका घर नहीं होता
ये सावन गर नहीं लिखता हंसी मौसम के अफसाने
कोई भी रंग मेंहदी का हथेली पर नहीं होता
किसी बच्चे से उसकी माँ को वो क्यों छीन लेता है
अगर वो देवता होता तो फिर पत्थर नहीं होता
परिंदे वो ही जा पाते हैं ऊँचे आसमानों तक
जिन्हें सूरज से जलने का तनिक भी डर नहीं होता
दो
गर ये रहबर ही निठारी के हलाकू देंगे
हम भी बच्चों को खिलौना नहीं चाकू देंगे
धूप दे या घना कोहरा दे ये मौसम जाने
हम तो एक फूल हैं हर हाल में खुशबू देंगे
आप गुलमोहरों का साथ निभाते रहिये
इस इमारत को बुलंदी तो ये साखू देंगे
आप आलिम हैं तो बच्चों को पढ़ाते रहिये
अब सियासत को हरेक मशवरा उल्लू देंगे
घर हो मिट्टी का या पत्थर का वहीं पर चलिए
तेज आंधी में सहारा कहाँ तम्बू देंगे
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चित्र -गूगल से साभार |
[मेरी प्रथम गज़ल आजकल और आधारशिला के गज़ल विशेषांक में प्रकाशित हो चुकी है ]
किचन में माँ बहुत रोती है पकवानों की खुशबू में
ReplyDeleteकिसी त्यौहार पर बेटा जब उसका घर नहीं होता
bahut khoob. badhaee sweekaren
ये सावन गर नहीं लिखता हंसी मौसम के अफसाने
ReplyDeleteकोई भी रंग मेंहदी का हथेली पर नहीं होता
किसी बच्चे से उसकी माँ को वो क्यों छीन लेता है
अगर वो देवता होता तो फिर पत्थर नहीं होता
Wah! Behad khoobsoorat!
गर ये रहबर ही निठारी के हलाकू देंगे
ReplyDeleteहम भी बच्चों को खिलौना नहीं चाकू देंगे
Kamaal kaa likha hai!
किचन में माँ बहुत रोती है पकवानों की खुशबू में
ReplyDeleteकिसी त्यौहार पर बेटा जब उसका घर नहीं होता
निशब्द करते शब्द .... बेहतरीन ग़ज़लें हैं दोनों .....
'
ReplyDeleteपरिंदे वो ही जा पाते हैं ऊँचे आसमानों तक
जिन्हें सूरज से जलने का तनिक भी डर नहीं होता '
sunder sher hai
अब किसकी तरी करूँ एक की करूँगा तो दूसरी नाराज और दोनों की नहीं करूँगा तो आप नाराज .....अब इतना कहूँगा ....आप इसी तरह हमें भाव विभोर करते रहें ...और अपनी रचनात्मकता से ब्लॉग जगत को समृद्ध करते रहें ....आपका आभार
ReplyDeleteये सावन गर नहीं लिखता हंसी मौसम के अफसाने
ReplyDeleteकोई भी रंग मेंहदी का हथेली पर नहीं होता
तुषार जी ... दोनों ही जबरदस्त ... एक से बढ़ कर एक ग़ज़लें हैं ...
बहुत कमाल का लिखते हैं आप ....
परिंदे वो ही जा पाते हैं ऊँचे आसमानों तक
ReplyDeleteजिन्हें सूरज से जलने का तनिक भी डर नहीं होता।
तुषार जी, बहुत प्रभावशाली हैं दोनों ग़ज़लें।