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चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार |
होली में
आना जी आना
चाहे जो रंग लिए आना |
भींगेगी देह
मगर याद रहे
मन को भी रंग से सजाना |
वर्षों से
बर्फ जमी प्रीति को
मद्धम सी आंच पर उबालना ,
जाने क्या
चुभता है आँखों में
आना तो फूंककर निकालना ,
मैं नाचूँगी
राधा बनकर
तू कान्हा बांसुरी बजाना |
आग लगी
जंगल में या
पलाश दहके हैं ,
मेरे भी
आंगन में
कुछ गुलाब महके हैं ,
कब तक
हम रखेंगे बांधकर
खुशबू का है कहाँ ठिकाना |
लाल हरे
पीले रंगों भींगी
चूनर को धूप में सुखायेंगे ,
तुम मन के
पंख खोल उड़ना
हम मन के पंख को छुपायेंगे ,
मन की हर
बंधी गाँठ खोलना
उस दिन तो दरपन हो जाना |
हारेंगे हम ही
तुम जीतना
टॉस मगर जोर से उछालना ,
ओ मांझी
धार बहुत तेज है
मुझे और नाव को सम्हालना ,
नाव से
उतरना जब घाट पर
हाथ मेरी ओर भी बढ़ाना
दो -
आम कुतरते हुए सुए से
आम कुतरते हुए सुए से
मैना कहे मुंडेर की |
अबकी होली में ले आना
भुजिया बीकानेर की |
गोकुल ,वृन्दावन की हो
या होली हो बरसाने की ,
परदेशी की वही पुरानी
आदत है तरसाने की ,
उसकी आंखों को भाती है
कठपुतली आमेर की |
इस होली में हरे पेड़ की
शाख न कोई टूटे ,
मिलें गले से गले ,पकड़कर
हाथ न कोई छूटे ,
हर घर -आंगन महके खुशबू
गुड़हल और कनेर की |
चौपालों पर ढोल मजीरे
सुर गूंजे करताल के ,
रूमालों से छूट न पायें
रंग गुलाबी गाल के ,
फगुआ गाएं या फिर बांचेंगे
कविता शमशेर की |
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चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार |
[दूसरा गीत नरेंद्र व्यास जी के आग्रह पर लिखना पड़ा, इसलिए यह गीत उन्हीं को समर्पित कर रहा हूँ ]
लाल हरे
ReplyDeleteपीले रंगों भींगी
चूनर को धूप में सुखायेंगे ,
तुम मन के
पंख खोल उड़ना
हम मन के पंख को छुपायेंगे ,
यह रंग जीवन में हमेशा यूँ ही बने रहें और हम जीवन को जीने का आनंद लेते रहें ...आपका आभार
आम कुतरते हुए
ReplyDeleteसुआ से
मैना कहे मुंडेर की |
अबकी
होली में ले आना
भुजिया बीकानेर की |
...
o suaa kuch mere liye bhi
दोनों रचनाएँ बहुत सुंदर तुषार जी.... होली मुबारक हो आपको :)
ReplyDeleteमैं नाचूँगी
ReplyDeleteराधा बनकर
तू कान्हा बांसुरी बजाना |
wow...lovely poems....Happy Holi !
.
आप सभी को सपरिवार होली की इन्द्रधनुषी शुभकामनाएं |आप सभी का स्नेह मिलता है तो और अच्छा लिखने का मन करता है |यह स्नेह सदैव बनाये रखें |भाई केवल राम जी रश्मि प्रभा जी क्षितिजा जी और डॉ० दिव्या जी आप सभी का आभार \
ReplyDeleteचौपालों पर
ReplyDeleteढोल मजीरे
सुर गूंजे करताल के ,
रूमालों से
छूट न पायें रंग
गुलाबी गाल के ,
फगुआ गायें
या फिर बांचेंगे
कविता शमशेर की |
बढिया गीत हैं
वर्षों से
ReplyDeleteबर्फ जमी प्रीति को
मद्धम सी आंच पर उबालना ,
जाने क्या
चुभता है आँखों में
आना तो फूंककर निकालना ,
मैं नाचूँगी
राधा बनकर
तू कान्हा बांसुरी बजाना ...
वाह ... होली की उमंग में रंग गये आप तो तुषार जी ... लाजवाब रचना है ... राधा कृष्ण का प्रेम होली में हो तो मज़ा ही कुछ और है ...
सर्वप्रथम तो आपको मेरा प्रणाम जयकृष्ण राय तुषार भाई साहब और दिल से नतमस्तक अभिवादन ! आपने मुझ खाकसार को इतनी इज्ज़त देकर ऊंचाइयों पर बिठा दिया.
ReplyDeleteजहां से अब में देखता हूँ तो सिर्फ और सिर्फ ब्रह्माण्ड में घुले प्रीत के रंग ही नज़र आते हैं. आकाश का नीला रंग, सूरज से लाल और पीला सरसों की बालियों से लहराते हुए दुपट्टे पर गुलाल छिड़क गया है. अब कोई कितना भी धोये ये स्नेह में भीगा चटक रंग नहीं धुल पाएगा क्योंकि ये देह के साथ मन को भी रंग गया और अपने स्नेह की रंग-बिरंगी अटूट डोर से सदा-सदा के लिए बांध गया. .
दोनों ही गीत बहुत भाए इस मन पाखी को. आपके प्रीत रस से सरोबार ये प्रीतफल इतने मीठे हैं कि जितना खाऊँगा, क्षुधा उतनी ही बढ़ेगी. अब ये क्षुधा कभी शांत नहीं होगी..!
आपको होली की ढेरों हार्दिक शुभकामनाएँ..! प्रणाम !
काश मुझे भी मिट्ठू मियां बीकानेरी भुजिया ला दें...
ReplyDeleteबहुत ही मीठी-सी रचनाएं है...
दोनों ही रचनाएँ लाज़वाब...
ReplyDeleteachchi kavita hai.
ReplyDeleteदोनों ही होली गीत बहुत सुंदर हैं.....
ReplyDeleteदोनों ही काव्य रचनाएं शब्द-शब्द फागुनमयी.... सुन्दर अभिव्यक्ति ....
ReplyDeleteहार्दिक बधाई..
Priy Tushar,
ReplyDeletePhaguni rang main doobe dono geeton ke liye badhai. Tumhare geet Bhavishy ki geet yatra ke prati bharpoor vishvas jagaate hain.
- Maheshwar Tiwari
पहली रचना अच्छी है तुषार जी, लेकिन दूसरी रचना तो कमाल है। जम गया रंग।
ReplyDeleteआप सभी का हृदय से आभारी हूँ |आप सबका प्यार मिलता है तो लेखनी और जिम्मेदार हो जाती है |आगे भी कुछ अच्छा लिखने की कोशिश होगी |
ReplyDeleteबहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है!
ReplyDeleteआपको एवं आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनायें!
आग लगी
ReplyDeleteजंगल में या
पलाश दहके हैं ,
मेरे भी
आंगन में
कुछ गुलाब महके हैं ,
कब तक
हम रखेंगे बांधकर
खुशबू का है कहाँ ठिकाना ......
लाजवाब रचना....
वाह..क्या खूब लिखा है आपने।
आप को भी सपरिवार होली की फागुनी शुभकामनाएं |
बहुत सुन्दर गीत हैं...
ReplyDeleteहोली में जान आ गयी अभी से...
मन को रंग से सजाना आसान तो नहीं, किन्तु यदि सजा दिया जाय, तो होली का आनंद पूरी तरह से लिया जा सकता है. बहुत सुन्दर गीत है आपका. इस सुन्दर होली गीत हेतु आपको हार्दिक बधाई. साथ ही आपको होली की शुभकामनाएं भी.
ReplyDeleteआग लगी
ReplyDeleteजंगल में या
पलाश दहके हैं ,
मेरे भी
आंगन में
कुछ गुलाब महके हैं ,
कब तक
हम रखेंगे बांधकर
खुशबू का है कहाँ ठिकाना |
वाह,क्या कहने हैं इन पंक्तियों के !
मन को फागुन फागुन कर गयीं ये पंक्तियाँ !
आभार !
होली की शुभकामनाएँ !
होली की हार्दिक शुभकामनायें .
ReplyDeleteजाने क्या
ReplyDeleteचुभता है आँखों में
आना तो फूंककर निकालना
मैं नाचूँगी
राधा बनकर
तू कान्हा बांसुरी बजाना
वाह, अति संदर...।
कविता ने मन को मोह लिया।
होली पर्व की अशेष हार्दिक शुभकामनाएं।
nice poem
ReplyDeletewah wah tushar ji. amit
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