Thursday, March 31, 2011

मेरे दो गीत

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
एक 
कब लौटोगी कथा सुनाने 

कब लौटोगी 
कथा सुनाने 
ओ सिंदूरी शाम |

रीत गयी है 
गन्ध संदली 
शोर हवाओं में ,
चुटकी भर 
चांदनी नहीं है 
रात दिशाओं में ,

टूट रहे 
आदमकद शीशे 
चीख और कोहराम |

माथे बिंदिया 
पांव महावर 
उबटन अंग लगाने ,
जूडे चम्पक 
फूल गूंथने 
क्वांरी मांग सजाने ,

हाथों में 
जादुई छड़ी ले 
आना मेरे धाम |

बंद हुई 
खिड़कियाँ ,झरोखे 
तुम्हें खोलना है ,
बिजली के 
तारों पर 
नंगे पांव डोलना है ,

प्यासे होठों पर 
लिखना है 
बौछारों का नाम |

दो 
सूरज कल भोर में जगाना 
नींद नहीं 
टूटे तो 
देह गुदगुदाना |
सूरज 
कल भोर में 
जगाना |

फूलों में 
रंग भरे 
खुशबू हो देह धरे ,
मौसम के 
होठों से 
रोज सगुन गीत झरे ,

फिर आना 
झील -ताल 
बांसुरी बजाना |

हल्दी की 
गाँठ बंधे 
रंग हों जवानी के ,
इन सूखे 
खेतों में 
मेघ घिरें पानी के ,

धरती की 
कोख हरी 
दूब को उगाना |

लुका -छिपी 
खेलेंगे 
जीतेंगे -हारेंगे 
मुंदरी के 
शीशे में 
हम तुम्हें निहारेंगे ,

मन की 
दीवारों पर
अल्पना सजाना |

चित्र -गूगल से साभार 


Friday, March 25, 2011

तीन कविताएँ -कवि -वीरेन्द्र कुमार सिंह

कवि -वीरेन्द्र कुमार सिंह
सम्पर्क -2/340 विशाल खंड ,गोमती नगर
लखनऊ  -226010
प्रशासनिक सेवा की व्यस्तताओं के बावजूद जिन कवियों /लेखकों ने निरंतर हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है ,उनमें वीरेंद्र कुमार सिंह का नाम भी प्रमुख है |वीरेंद्र कुमार सिंह का जन्म आज़मगढ़ शहर [उत्तर प्रदेश ]में 1 जून  1962 में  हुआ था |इलाहाबाद विश्व विद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल करने के बाद उत्तर प्रदेश की सिविल सेवा में चयनित हो गये |वीरेंद्र सिंह ;अप्रतिम ;पत्रिका के सम्पादक भी हैं,और इस पत्रिका के माध्यम से वीरेन्द्र सिंह जी हिन्दी साहित्य की अप्रतिम सेवा कर रहे हैं |इनकी कविताओं में गहरे भावार्थ छुपे रहते है |समकालीन बोध ,मानवीय संवेदना से इनकी कविताओं का सीधा सरोकार रहता है | अभी हाल ही में [2010]इस कवि का काव्य संग्रह :कोई शोर नहीं होता :शब्द सत्ता प्रकाशन लखनऊ से प्रकाशित हुआ है |अंतर्जाल के माध्यम से वीरेन्द्र  कुमार सिंह की तीन कविताएं हम आप तक पहुंचा रहे हैं -
चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
एक 

यह समय 
नहीं है 
रहने का तुमसे दूर 
वक्त है 
बैठकर सिरहाने 
निहारने का 
तुम्हारी तृप्त आँखें 
और बतियाने का 
तुमसे घंटों 
लेकिन 
ये दुनियादारी 
फ़िलहाल 
रोके हुए है मुझे 
पास आने से तुम्हारे 

दो 

इस शाम की 
उदासी चीरकर 
चाहता हूँ पहुंचना 
मैं तुम तक 
तुम एक 
जिसके न होने से 
हो जाती है बेजान 
पूरी जिंदगी ,
ठहर जाता है 
सब कुछ 
और छा जाती है 
एक ऐसी चुप्पी 
पूरे घर -आंगन में 
जिसे तोड़ सकती हो 
केवल तुम 

तीन
क्यों नहीं कौंधती 
कोई पंक्ति 
क्यों नहीं फूटती 
कोई कविता 
क्यों ठहर गयी है 
अभिव्यक्ति मेरी 
क्यों भूल गया हूँ 
बतियाना अपने आप से 
क्यों गायब हो गयी है 
मुट्ठियों की कसमसाहट 
जो भिंच जाती थी कभी 
देखकर जीवन की विसंगतियाँ 
क्यों जिए जा रहा हूँ 
एक घिसी -पिटी जिंदगी 
कब तक ढोता रहूँगा इसे 
जो डुबोती ही जा रही है 
एक गहरे भँवर में 
निष्क्रियता और बेबसी के 

Monday, March 14, 2011

होली के रंग -मेरे गीतों के संग

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
एक - होली में आना जी आना 

होली में 
आना जी  आना 
चाहे जो रंग लिए आना |
भींगेगी देह 
मगर याद रहे 
मन को भी रंग से सजाना |


वर्षों से 
बर्फ जमी प्रीति को 
मद्धम सी आंच पर उबालना ,
जाने क्या
चुभता है आँखों में 
आना तो फूंककर निकालना ,
मैं नाचूँगी 
राधा बनकर 
तू कान्हा बांसुरी बजाना |


आग लगी 
जंगल में या 
पलाश दहके हैं ,
मेरे भी 
आंगन में 
कुछ गुलाब महके हैं ,
कब तक 
हम रखेंगे बांधकर 
खुशबू का है कहाँ ठिकाना |


लाल हरे 
पीले रंगों भींगी
चूनर को धूप में सुखायेंगे ,
तुम मन के 
पंख खोल उड़ना 
हम मन के पंख को छुपायेंगे ,
मन की हर 
बंधी गाँठ खोलना 
उस दिन तो दरपन हो जाना |


हारेंगे हम ही 
तुम जीतना 
टॉस मगर जोर से उछालना ,
ओ मांझी 
धार बहुत तेज है 
मुझे और नाव को सम्हालना ,
नाव से 
उतरना जब घाट पर 
हाथ मेरी ओर भी बढ़ाना


दो -
आम  कुतरते हुए सुए से 


आम कुतरते हुए सुए से 
मैना कहे मुंडेर की |
अबकी होली में ले आना 
भुजिया बीकानेर की |


गोकुल ,वृन्दावन की हो 
या होली हो बरसाने की ,
परदेशी की वही पुरानी 
आदत है तरसाने की ,
उसकी आंखों को भाती है 
कठपुतली आमेर की |


इस होली में हरे पेड़ की 
शाख न कोई टूटे ,
मिलें गले से गले ,पकड़कर 
हाथ न कोई छूटे ,
हर घर -आंगन महके खुशबू 
गुड़हल और कनेर की |


चौपालों पर ढोल मजीरे 
सुर गूंजे करताल के ,
रूमालों से छूट न पायें 
रंग गुलाबी गाल के ,
फगुआ गाएं या फिर बांचेंगे 
कविता शमशेर की |
चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार
[मेरा दूसरा गीत अमर उजाला के २० मार्च २०११ के साप्ताहिक परिशिष्ट जिंदगी लाइव में प्रकाशित हो चुका है |इस गीत को प्रकाशित करने के लिए जाने माने कवि /उपन्यासकार एवं सम्पादक साहित्य अरुण आदित्य जी  का विशेष आभार]
[दूसरा  गीत   नरेंद्र व्यास जी के आग्रह पर  लिखना पड़ा, इसलिए यह गीत उन्हीं को समर्पित  कर रहा हूँ ]

Sunday, March 13, 2011

गज़ल -होली मनाइये

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
होली मनाइये 


यह वर्ष बेमिसाल है होली मनाइये 
हर शख्स तंग हाल है होली मनाइये

मनमोहनी हंसी ने रुलाकर के रख दिया 
सौ रूपये में दाल है होली मनाइये 


कुर्सी महल कलमाड़ी के हिस्से में दोस्तों 
अपने लिए पुआल है होली मनाइये 


रंगों में है  घोटाला मिलावट अबीर में 
महँगा भले गुलाल है होली मनाइये 


फागुन भी कटघरे में बसंती भी जेल में 
मौसम भी ये दलाल है होली मनाइये 


राहुल जी राज छोड़के घरवाली लाइए 
ये उम्र का सवाल है होली मनाइये 


भारी है पेट गडकरी गुझिया न खाइए 
पार्टी का खस्ता हाल है होली मनाइये

अबकी कैटरीना कैफ भी  होली के मूड में 
सादा बस एक गाल है होली मनाइये 


हाथों में ले अबीर अमर सिंह न बैठिये 
घर में भले बवाल है होली मनाइये

बहुमत में लौटकर के बहिन जी फिर आइये 
हाथी का सब कमाल है होली मनाइये 


राधा शहर में बस गयी कान्हा विदेश में 
बरसाने में अकाल है होली मनाइये


सत्ता का चेहरा हो गया पीला तो क्या हुआ 
जनता का चेहरा लाल है होली मनाइये 


पाले में नंगा जिस्म ले मरता रहे किसान 
मस्ती में लेखपाल है होली मनाइये 


जंगल का हाल उड़ते परिंदों से पूछिए 
गिरवीं हरेक डाल है होली मनाइये 


पी करके भाँग  सो रही संसद विधायिका 
अपना किसे खयाल है होली मनाइये 
चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
[बुरा न मानो   होली है|यह मेरी पुरानी गज़ल है ,इसे संशोधन के द्वारा समसामयिक बनाया गया है  ]

Friday, March 11, 2011

साक्षात्कार -भाषा की सहजता ही रचना की सबसे बड़ी पूंजी है -कैलाश गौतम

कैलाश गौतम 
(08/01/1944 - 09/12/2006)


कैलाश गौतम से हिन्दी गीत-नवगीत पर जयकृष्ण राय 'तुषार'  की बातचीत

प्रश्न- कैलाश जी नवगीत  कब ,किन परिस्थितियों में तथा किन उद्देश्यों को लेकर अस्तित्व में आया ? नवगीत का प्रवर्तक आप किसे मानते हैं ?क्या नवगीत नामकरण उचित है?

उत्तर- नवगीत ,गीत कवियों की प्रयोगधर्मिता की ऐसी अवस्था है ,जो लगभग हर चार -पांच दशकों के अंतराल पर नया स्वरूप धारण करती है |अनुभूतियाँ और अभिव्यक्तियां नयी होती हैं और नयी होती हैं सम्वेदनाएँ |क्षण क्षण जिसमे नवीनता उत्पन्न हो वही सौंदर्य है ,कविता के साथ उसकी यही रमणीयता निरंतर बनी रहती है |आदि काल से लेकर आज तक हिन्दी कविता बराबर रमणीय होती रही है ,पुरानी पड़ती रही है ,नयी होती रही है |विकास का यह स्वाभाविक लक्षण है |बदलाव शाश्वत है |छायावाद ,रहस्यवाद,हालावाद ,प्रयोगवाद और प्रतीकवाद से छन छन कर आता हुआ रस वर्षों अपनी जमीन बनाता है फिर फूटता है पल्लव की तरह ,नए शक्ल की तरह ,नए छंद की तरह जहां निराला के गीत परम्पराएँ तोड़ते हुए नया आकार लेते हुए दिखाई देते हैं |वहीं हरिवंश राय बच्चन जी अंचल जी विद्यावती कोकिल पंडित नरेंद्र शर्मा माखनलाल चतुर्वेदी केदारनाथ अग्रवाल जैसे कुछ वाणी पुत्र गीत को अपने साथ ठहरने के लिए बाध्य भी करते हैं |गीत का यह ठहराव आज भी बड़े आदर के साथ देखा जाता है ,क्योंकि नवगीत का भाव प्रकाश इन्ही दिग्गजों की छाँह में आंख खोलता हुआ दिखाई देता है ,और धीरे धीरे वह भी समय आता है ,जब जानकी बल्लभ शास्त्री ,वीरेंद्र मिश्र ,डॉ० शम्भुनाथ सिंह ,केदारनाथ सिंह ,महेंद्र श्रीवास्तव और ठाकुर प्रसाद सिंह जैसे कवि नवगीत की पहचान बनाते हैं |नवगीत के प्रादुर्भाव में जीतना हाथ सम्वेदनशील कवियों का है उससे कहीं अधिक हाथ उन विषम और विपरीत परिस्थितियों का है ,जिनके बीच पलकर नवगीत अवतरित हुआ |पारम्परिक गीत विधा से हटकर अपनी एक और नयी  पहचान बनाने वाली नयी कविता के भाव प्रकाश का श्रेय भी प्रयाग [इलाहाबाद ]को जाता है |लेकिन गीत विधा में छंद परम्परा को जीते हुए नयेपन का हामी भरने वाले नवगीत को किसी एक स्थान और एक व्यक्ति को घेरना सचमुच अन्याय भी होगा और गलत भी |और शायद नयी कविता और गीत का बासीपन आम पाठक या श्रोता को स्वीकार नहीं था लिहाजा नवगीत जैसी विधा को जनमानस में स्वत:उतरने का अवसर मिला |रही बात इसके उदेश्य की तो जो उद्देश्य कविता का करुना से ,ममता से आदर्श से यथार्थ से और दायित्व बोध से है यही उद्देश्य नवगीत का भी इन शब्दों से है |अपने उद्देश्य में बहुत हद तक नवगीत सफल भी है |देखिये आज गीत की भाषा बदल गयी है ,गीत की चटना सार्वजनीन हो गयी है |आज गीत आम आदमी से बोलता बतियाता चलता है ,एक अच्छे मित्र की तरह एक कुलीन संस्कार की तरह ,आस्था और विश्वास से जुड़े संकल्प की तरह |असहज को  निरंतर सहज बनाये रखने वाले प्रयोग की तरह ,अगर उद्देश्य नही मरेगा तो यह नवगीत विधा भी बनी रहेगी |इसके अस्तित्व पर तुरंत कोई संकट आने वाला नहीं है |लेकिन कभी न कभी यह नयापन पुराना होगा |वैसे यह सच है आने वाले दिनों में गीत की शक्ल बदलेगी |नाम बदले या न बदले सम्भव हो तब भी लोग इसे नवगीत ही पुकारें|

प्रश्न- कविता  के फैशन में लगातार हो रहे परिवर्तन को देखकर क्या गीतकारों को भी गीतों के परिधान बदलने की जरूरत महसूस हुई?

उत्तर- तुषार जी देखिये परिवर्तन भी सार्थक तभी साबित होता है ,जब वह भीतर से होता है और अनायास होता है ,सहज होता है  और अनिवार्य भी होता है |आज के गीत की भाषा यथार्थ जिंदगी की भाषा है |उसमे खास आदमी की भी तस्वीर उभरती है और आम आदमी की भी |आम आदमी का दर्द गीतकार का दर्द है और वही दर्द उसका गीत है |गीतों के ही चलते आदमी तिथियों ,पर्वों .उत्सवों और अनेकानेक रंगारंग समारोहों में रचा बसा दिखाई दे रहा है |गीत गरीबी में साथ है ,गीत परेशानियों में साथ है ,गीत अकेले में साथ है |आंगन से खेतों तक ,बागों से पहाड़ों तक ,नहरों से कछारों तक रची बसी समूची प्रकृति का साक्षात्कार आकर्षक ढंग से यह गीत ही तो करता है |जैसा समाज होता है वैसा इसका नामकरण होता है -कहीं गीत ,कहीं नवगीत और कहीं जनवादी गीत के रूप में |राग रंग है ,मन मनुहार है ,वास्तविक पारिवारिक संघर्ष भी है सामाजिकता से प्रभावित चेतना भी है,गीत आज भी इन्कलाब पैदा करता है|

प्रश्न- क्या आंचलिकता को आप गीत की अनिवार्य शर्त मानते हैं ?गुलाब सिंह माहेश्वर  तिवारी,ठाकुर प्रसाद सिंह, अनूप अशेष और आपने अपने गीतों में आंचलिकता का भरपूर प्रयोग किया है |

उत्तर -देखिये गीत में वहाँ चार चांद लग जाते हैं ,जहां वह आंचलिकता की मिठास और सुगंध में नहाया हुआ मिलता है |आंचलिकता का वास्तविक और अनिवार्य प्रतिशत बोझिल गीत को भी सहज और स्वीकार्य बना देता है |इसका श्रेय जाता है हमारे लोकजीवन को ,हमारी लोक संस्कृति को और हमारे लोकगीतों को ||अगर ये नहीं होते तो नवगीत क्या गीत ही नहीं पैदा हुए होते |अधिकतर गीतकार पहले भी लोक संस्कृति की ही गोंद से आये थे |आज भी वही प्रतिशत सुरक्षित है ,और आगे भी रहे यही मंगल कामना है |

प्रश्न- काफी समृद्ध होते हुए भी नवगीत साहित्य में अभी स्थापित नहीं हो पाया है |क्या इसे भी साहित्य में स्थापित होने के लिए किसी नामवर सिंह की आवश्यकता है ?पाठकों की संख्या में कमी क्यों आती जा रही है?

उत्तर- अब आता हूँ आपके इस पॉइंट पर की इतने के बावजूद गीत अपनी जगह साहित्य में क्यों नहीं बना सका |इसके कुछ खास कारण हैं जिन्हें मैं गिना रहा हूँ |पहला है पत्नी बदल पर अपनी सोच मत बदल जैसे संस्कार वाले और गुट विशेष बनाकर कोल्हू के बैल की तरह बस बंधी जिंदगी जीने वाले दकियानूस और अपने समय के असफल गीतकारों ,रचनाकारों ने गुट बनाया और परस्पर एक दूसरे को प्रतिष्ठित करने कराने का बीड़ा उठाया और देश भर के प्रकाशन संस्थानों को ऐसा ख्वाब दिखाया कि सब के सब चौधिया गये और इनके कहे में आ गये और परिणाम स्वरूप गीत विरोधी गुट चारो तरफ हावी हो गया पत्र -पत्रिकाओं से लेकर प्रकाशन संस्थानों तक |ऐसे में गीत को बड़ा कड़ा संघर्ष करना पड़ा |आज का गीत इस बात का साक्षी है |लाख रुकावटें आयीं लेकिन गीत टूटा नहीं  भगा नहीं डटा रहा और संघर्ष करता रहा |पानी होकर पहाड़ तोड़ना केवल झरना जानता है | गीत पानी होकर पहाड़ में अपनी जगह बनाता रहा और बनाता रहेगा |आज आप खुद देख रहे हैं कि आज के पचास साल पहले गीत कहाँ था और आज कहाँ है ,बिना किसी खलीफा के बिना किसी मसीहा के |हाँ इतना जरूर है कि गीत कि अगर खुले मन से समीक्षा हुई होती तो गीत को और प्रोत्साहन मिला होता ,जन जन तक इसकी पहुंच और जल्दी हुई होती |गीतों के पाठक भी हैं और श्रोता भी हैं |हाँ प्रकाशक उतने उदार नहीं हैं जितना होना चाहिए |वैसे इनका व्यवहार पूरे हिन्दी साहित्य के लिए सही नहीं है |जहां कविता बड़ी सिफारिश और भारी मन से छापी जा रही हो वहाँ गीत का रोना कौन रोये |फिर भी ऐसा देखा गया है कि गीत कि किताबें छप भी रही हैं और खप भी रही हैं |लेकिन महंगी इतनी हैं कि आम आदमी जो अखबार भी चौराहे पर खड़े खड़े पढ़ने को विवश है उससे उम्मीद करें कि सौ रूपये कि हिन्दी गीत की किताब खरीदकर पढेगा ,तो ऐसा नहीं होगा |यदि सस्ते गीत संकलन निकाले जायें तो मुझे विश्वास है कि प्रतियाँ लाखों में बिकेंगी |लेकिन भाई बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे ?जो प्रकाशन से जुड़े लोग हैं ,वे लोग अपने पेट पर किसी को लात मरने देंगे ?कभी नहीं |बहुत महंगा पड़ेगा उनका बिरोध |पानी में रहकर मगर से बैर अच्छा नहीं मन जाता |लकिन यह भी तो है देर सबेर गीत या नवगीत जो भी कहिये इन कुचक्रों को तोडेगा और अपनी पहचान नए सिरे से बनाएगा |इसके लिए सिंह बंधुओं [नामवर सिंह और डॉ० केदार नाथ सिंह] का झोला ढोने कि जरूरत नहीं है |

प्रश्न- स्थापित  व्यंग्यकार होने के साथ -साथ आप एक प्रतिनिधि नवगीतकार हैं | आपकी अपनी निजी शैली है |क्या कारण है आप नवगीत दशक और नवगीत अर्धशती दोनों में अनुपस्थित हैं?

उत्तर- देखिये डॉ० शम्भुनाथ सिंह जैसा गीत कवि जल्दी पैदा नहीं होगा |वह जन्मजात गीतकार थे और गीत को सचमुच डॉ० साहब ने जिया है ,स्थापित किया है | इसमें कोई दो राय नहीं |लेकिन शम्भुनाथ सिंह के भीतर गीतकार के साथ -साथ एक खलीफा भी निवास करता था, और कभी कभी उनका यह खलीफा उनके गीतकार पर हावी हो जाता था तब शम्भुनाथ सिंह एकोहं द्वितीयो नास्ति कि भावना से रस बिभोर हो जाते थे और चाहते थे कि जो आसपास हैं वो इसी रस का गुणगान  करें |करने वाले करते भी थे |एक तो मैं ऐसा करने से भागता भी था दूसरे गलत संशोधन कि बुरी आदत से तंग आकर मैं अपना गीत उनसे बचाए फिरता था |इसलिए मैं जानबूझकर उनसे नहीं जुड सका |हलांकि भाई उमाशंकर तिवारी ,माहेश्वर तिवारी ,डॉ० बुद्धिनाथ मिश्र और श्रीकृष्ण तिवारी ने बहुत कहा लेकिन भाई जो बात मुझे स्वीकार नहीं उससे इस लेबल पर क्या जुड़ना |अब इसका क्या जबाब दिया जाय कि जो ड्रिंक करता है ,वह गीत नहीं लिख सकता |बाद में अपनी इस कूपमंडूकता से डॉ० साहब उबर भी आये और मेरे अग्रज कि भांति साधिकार उलाहना भी दिये |लेकिन पता नहीं क्यों जितना मुझे प्रभावित शम्भुनाथ सिंह के गीतों ने किया उसका एक बटा सौ प्रतिशत भी डॉ० साहब ने नहीं किया |हलांकि इसका मुझे मलाल भी है और खुशी भी|

प्रश्न- नयी पीढ़ी के नवगीतकारों में क्या कुछ सम्भावनाएं हैं?

उत्तर -हलांकि नए हस्ताक्षर और पैने ,पानीदार और धारदार दिखाई दे रहे हैं ,बशर्ते वे भटकें न बहकें न गीत को नारा न होने दें |उद्देश्य विशेष से जुड़ा आन्दोलन न होने दें |गीत अपना रास्ता स्वयं तय करेगा |इसके लिए गीतकार को जुलूस लेकर चलने और हटो बढ़ो मैं आ रहा हूँ कहने कि जरूरत नहीं है |कवि तो बहुत पहले से कहता आ रहा है कि हम न बोलेंगे हमारी बात बोलेगी |

प्रश्न- आप आकाशवाणी में रहते हुए कमलेश्वर, डॉ० धर्मवीर भारती, नरेश मेहता विष्णुकांत शास्त्री, रविन्द्रनाथ त्यागी दुष्यन्त, डॉ० जगदीश गुप्त, उमाकांत जी, माहेश्वर तिवारी सरीखे रचनाकारों से जुड़े रहे, और नयी पीढ़ी के रचनाकारों से भी जुड़े हैं | तब और अब में क्या फर्क  महसूस करते हैं?

उत्तर- तमाम नगरों महानगरों कि तुलना में इलाहाबाद अभी भी सम्बन्धों को जीने में बराबर आगे आगे रहता है |हलांकि यह शहर भी फ़ैल बढ़ रहा है |आँखों का पानी मरा नहीं है |व्यावसायिक दृष्टि से भले दिल्ली मुंबई ,कोलकाता महत्वपूर्ण माने जा रहे हों लेकिन यह सच है कि सार्थक प्रयोग और पहल आज भी इलाहाबाद में ही हो रहे हैं और हर स्तर पर हो रहे हैं ,कविता क्या ,कहानी क्या ,और रंगमंच क्या ?सबकी भूमिका आज दूर दूर रेखांकित हो रही है |इसका सही अंदाजा आपको पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे साहित्य से और प्रकाशित हो रही पुस्तकों से से आसानी से लग सकता है |इलाहाबाद कि मिट्टी बोलती है |उसकी खनक में एक तरह कि गमक समाई हुई है |नयी पीढ़ी बड़े सलीके से अपना रास्ता तय कर रही है और साहित्य कि हर विधा को समृद्ध करने में जी जान से जुटी है |लिखने पढ़ने के साथ -साथ जिंदगी को सही ढांचे में ढालने कि कला भी नयी पीढ़ी जानती है |उसकी उपलब्धियों को दशक दो दशक बाद तौलियेगा अभी नहीं |

प्रश्न- कैलाश जी आप लंबे समय तक आकाशवाणी इलाहाबाद से जुड़े रहे हैं |हिन्दी के विकास में आकाशवाणी का क्या योगदान रहा है ,जबकि आज आकाशवाणी में विज्ञापन बजते हैं और टी० वी० चैनलों में देह बोलती है?

उत्तर- हाँ आप सही कह रहे हैं |जब मैंने आकाशवाणी में काम करने कि शुरुआत कि थी तब बहुत अच्छा माहौल था और यही एक ऐसा माध्यम था जो सबके लिए था |सब कुछ प्रसारित होता था और सुना जाता था | आज वह बात नहीं है |इसके लिए सरकार भी जिम्मेदार है |उसी के सोच का नतीजा है आई हुई गिरावट ,जबकि अपने देश समाज के लिए इतना अच्छा दूसरा कोई माध्यम नहीं हो सकता |लेकिन अब क्या कहा जाय ?और टी० वी० चैनलों का तो कहना ही क्या ?कर्यक्रम आँख मूंदकर बना रहे हैं बनाने वाले केवल पैसा पीट रहे हैं और देखने वाले आंख फाड़कर देख रहे हैं |कार्यक्रम परोसने वालों के पास न कोई दृष्टि है न कोई सोच न ही मन |सिर्फ पैसा कमाने कि होड़ है सो वो कमा रहे हैं भुगतान तो पीढियां करेंगी तब सबकी ऑंखें खुलेंगी |अभी आंख बंद है लेकिन जब आंख खुलेगी तब तक तो बहुत कुछ स्वाहा हो चुका होगा |

प्रश्न-  आप हिन्दी भाषी क्षेत्रों से अहिन्दी भाषी क्षेत्रों तक कविता पाठ कर चुके हैं |कैसा अनुभव रहा और हिन्दी का वहाँ भविष्य क्या है?

उत्तर- अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में बड़े मन से लोग हिन्दी की रचनाएँ सुनते और सराहते हैं ,लेकिन वहाँ भी चुटकुलेबाज और घुसपैठिए धंधा करने लगे हैं ,और सही छवि को न केवल धूमिल कर रहे हैं बल्कि मटियामेट करने पर तुले हैं |क्योंकि इस तरह के आयोजन या तो किसी गणित के आधार पर कर रहे हैं या अपने सगे सम्बन्धियों की आड़ में कर रहे हैं |दूसरी भाषा बोली वाले ऐसी हरकतों पर मुस्कराते हैं और पूछते भी हैं कि क्या यही हिन्दी है ?यह सिलसिला देश में ही नहीं विदेशों में तक चल रहा है ,फिर भी हिन्दी को विस्तार मिल रहा है |खतरों के बीच सही समीकरण बनाने कि जरूरत है|

प्रश्न- गौतम  जी आप भोजपुरी के भी बड़े कवि हैं ,इधर भोजपुरी में भी लगातार फ़िल्में बन रही हैं |क्या कभी आपको फिल्मों में गीत लेखन का प्रस्ताव मिला?

उत्तर- फिल्मों में लिखना रचनाकार होने का मानदण्ड नहीं है | भोजपुरी फिल्मों में और कैसेटों में जैसे गीत आ रहे हैं उससे भोजपुरी कि छवि खराब हो रही है |इस ओर सोचने और निर्णय लेने कि जरूरत है| क्योंकि भाषा और माँ दोनों एक सी हैं | मर्यादा पालन हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए जैसे एक भोजपुरी फिल्म; सांच भइल सपना हमार 'में मेरे पांच गीत हैं | लेकिन ये सब स्थितियों और घटनाओं पर आधारित हैं | फिल्म बनाने वाला केवल अपना धंधा देखता है | जैसी उसकी जरूरत होती है वही वह चाहता है ,करता है और उसे वैसा लिखने वाले मिल जाते हैं |फिल्म में साहित्यिक गीत सफल नहीं हो सकते | सस्ते द्विअर्थी शब्द वहाँ बहुत माने रखते हैं | आज बाज़ार में उन्हीं कि मांग भी है |

[यह साक्षात्कार कैलाश गौतम के निधन के छह माह पूर्व लिया गया था| अक्षर पर्व और आज में प्रकाशित हुआ था| निधन के बाद नए पुराने और हिन्दुस्तानी एकेडमी पत्रिका में प्रकाशित हुआ था | यह मेरे दो साक्षात्कारों का सम्पादित अंश है]

Tuesday, March 8, 2011

तीन ग़ज़लें -कवि /शायर डॉ० जमीर अहसन

शायर -डॉ० जमीर अहसन
सम्पर्क -09335981071
रामचरित मानस जैसे लोकप्रिय ग्रन्थ का उर्दू में काव्यानुवाद करने वाले डॉ० जमीर अहसन एक अप्रतिम कवि / शायर और भारतीय संस्कृति के महान उद्गाता हैं |यह शायर हिन्दी और उर्दू कविता के बीच रामेश्वरम के सेतु की तरह है |डॉ० जमीर अहसन कबीर ,रहीम ,जायसी और रसखान की परम्परा को आगे बढाने वाले महान शायर हैं |इनकी गज़लों में कंटेंट और कहन का अंदाज बिलकुल निराला है |दूरदर्शन और आकाशवाणी से इनके कार्यक्रम प्रसारित होते रहते हैं |मुशायरों में खूबसूरती से कलाम पेश करने वाले इस शायर का कहना है कि अब  -शायरी और गज़ल की  विषय वस्तु केवल स्त्री नहीं है वरन समाज में और भी ज्वलंत मुद्दे हैं|प्रगतिशील चेतना से लैस डॉ० जमीर अहसन का जन्म 21अगस्त 1938 को कर्नलगंज इलाहाबाद में हुआ था |डॉ० जमीर अहसन का 1953 में शायरी की दुनियां में प्रवेश हुआ |तुलसी सम्मान ,त्रिवेणी सम्मान ,सारस्वत सम्मान तथा उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के सौहार्द्र सम्मान सहित अनेकों अन्य पुरस्कारों से सम्मानित इस शायर को अभी हाल ही में भोपाल के भारत भवन में काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किया गया था |हम इस लोकप्रिय शायर की तीन गज़लें आप तक पहुंचा रहे हैं -
     
एक 


यूँ तो वो खोटे सिक्कों से मेरी मिसाल दे 
जब टॉस जीतना हो तो मुझको उछाल दे 

अबके बरस नुजूमी हैं खामोश इसलिए 
क्यों मुस्कराते चेहरों को रंगे मलाल दे 

कांटा चुभे तो काँटों पे फिर चलके देखिये 
मुमकिन है कोई कांटा ही कांटा निकाल दे 

कब तक हवा के कंधे पे उड़ते रहेंगे लोग 
यारब इन्हें  शउरे उरूजो जवाल दे 

खुद अपने खद्दोखाल पे कुछ तबसिरा न कर 
लब सी लिए हैं मैंने मुझे इश्तेआल दे 

दो 

जब से हमने हुंकारी भरना ठेका कहना छोड़ दिया 
बाबा ने राजा रानी का किस्सा कहना छोड़ दिया 

राधा कृष्ण को सबने देखा सूरदास की आँखों से 
फिर भी किसने सूरदास को अंधा कहना छोड़ दिया 

लगने लगा है जब से टिकट आनंद भवन में जाने का 
सब बच्चों ने नेहरूजी को चाचा कहना छोड़ दिया 

क्यों मेरे परिवार की हड्डी तोड़ी जाए मेरे बाद 
मैंने बस्ती के गुंडों को गुंडा कहना छोड़ दिया 

आओ बताऊँ क्यों आता है रोज -रोज भूचाल यहाँ 
हमने इस धरती को धरती माता कहना छोड़ दिया 

तीन 

फिर से गंगा को बनाओ गंगा 
खींच लो शिव की जटाओं गंगा 

अंधे ने प्यास बुझाकर ये कहा 
एक दिन मुझको दिखाओ गंगा 

मैं कहाँ कहता हूँ तुम पापी हो 
बस यूँ ही जाओ नहाओ गंगा 

पाप तो तुमने बहाये धोये 
पापियों को भी बहाओ गंगा 
आनंद भवन इलाहाबाद -चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार 


Saturday, March 5, 2011

मेरी दो ग़ज़लें


चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 


एक 

सलीका बांस को बजने का जीवन भर नहीं होता 
बिना होठों के वंशी का भी मीठा स्वर नहीं होता 

किचन में माँ बहुत रोती है पकवानों की खुशबू में 
किसी त्यौहार पर बेटा जब उसका घर नहीं होता 

ये सावन गर नहीं लिखता हंसी मौसम के अफसाने 
कोई भी रंग मेंहदी का हथेली पर नहीं होता 

किसी बच्चे से उसकी माँ को वो क्यों छीन लेता है 
अगर वो देवता होता तो फिर पत्थर नहीं होता 

परिंदे वो ही जा पाते हैं ऊँचे आसमानों तक 
जिन्हें सूरज से जलने का तनिक भी डर नहीं होता 

दो 

गर ये रहबर ही निठारी के हलाकू देंगे 
हम भी बच्चों को खिलौना नहीं चाकू देंगे 

धूप दे या घना कोहरा दे ये मौसम जाने 
हम तो एक फूल हैं हर हाल में खुशबू देंगे 

आप गुलमोहरों का साथ निभाते रहिये 
इस इमारत को बुलंदी तो ये साखू देंगे 

आप आलिम हैं तो बच्चों को पढ़ाते रहिये 
अब सियासत को हरेक मशवरा उल्लू देंगे 

घर हो मिट्टी का या पत्थर का वहीं पर चलिए 
तेज आंधी में सहारा कहाँ तम्बू देंगे 
चित्र -गूगल से साभार 
[मेरी प्रथम गज़ल आजकल और आधारशिला के गज़ल विशेषांक में प्रकाशित हो चुकी है ]


Friday, March 4, 2011

एक प्रेम गीत -फूलों से बात करें

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
एक प्रेम गीत -फूलों से बात करें

चलो कहीं 
झील -ताल 
कूलों से बात करें |
हाथ में 
किताब लिए 
फूलों से बात करें |

तुम्हें देख 
स्वप्न उगेंगे 
पठार, टीलों में ,
बातों की 
गंध महक 
जायेगी मीलों में ,

आओ फिर 
टूटते 
उसूलों से बात करें |

जी भर 
बतियायेंगे 
आज नहीं रोकना ,
होंठ पर 
उँगलियाँ धर 
मुझे नहीं टोकना ,

आओ इस 
उपवन के 
झूलों से बात करें |

थक कर भी 
हाथों में हाथ 
लिए चलना ,
छोर  से 
रूमालों के  
आँख भले मलना ,

पावों में 
लिपटी इन 
धूलों से बात करें |

भौरों को
फूलों के 
चटख रंग भायेंगे ,
ये उदास 
पंछी भी 
तुम्हें देख गायेंगे |

छूट गये 
रस्तों 
स्कूलों से  बात करें |
चित्र -गूगल से साभार 


Wednesday, March 2, 2011

आस्था के स्वर -संदर्भ -महाशिवरात्रि

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार
महाशिवरात्रि पर विशेष रचना 

भक्ति भाव से प्रेम भाव से 
हम करते गुणगान    |
तुम्हारा हे शकंर भगवान 
तुम्हारी जय शंकर भगवान |

तुम यह जग माया उपजाये 
तेरी महिमा सुर नर गाये ,
तू भक्तों का ताप मिटाये ,
नीलकंठ विष पी कहलाये 

तुम ही हो असीम भव सागर 
तुम नाविक जलयान  |

तेरी संगिनी सती भवानी 
तेरे वाहन नंदी ज्ञानी ,
तेरे डमरू की डिम डिम से 
निकलीं उमा ,रमा ,ब्रह्मानी ,

तू ही जग का अंधकार प्रभु 
तू ही उज्जवल ज्ञान |

तीन लोक में काशी न्यारी 
तुमको प्रिय भोले भंडारी ,
भूत प्रेत बेताल के संगी ,
हें भोले बाबा अड् भंगी ,

तेरी महिमा जान न पाये 
चारो वेद पुराण  |

तुम्ही प्रलय हो तुम्ही पवन हो 
तुम यह धरती नीलगगन हो ,
जड़ चेतन के भाग्य विधाता 
तुम्ही काल के असली ज्ञाता ,

तुम्ही पंचमुख महाकाल हो 
तुम्ही सूर्य हनुमान |


बनारस -चित्र गूगल से साभार