Sunday, October 2, 2011

लोकभाषा में कविता -गान्ही जी- कवि कैलाश गौतम

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी 
यह गाँधी जी को संबोधित लोकभाषा [भोजपुरी ]में लोकप्रिय कवि कैलाश गौतम की पुरानी कविता है इसका पाठ वह कवि सम्मेलनों में भी किया करते थे |आज भी यह कविता उतनी ही प्रासंगिक है |
तोहरे घर के रामै मालिक सबै कहत हौ गान्ही जी 
सिर फूटत हो गला कटत हौ लहू बहत हौ गान्ही जी 
देश बटत हौ जैसे हरदी धान बटत हौ गान्ही जी 
वेर विसवतै ररुवा चिरई रोज ररत हौ गान्ही जी 
तोहरे घर के रामै मालिक सबै कहत हौ गान्ही जी


हिंसा राहजनी हौ बापू हौ गुंडई डकैती हउवै 
देसी खाली बम बनूक हौ कपड़ा ,घडी बिलैती हउवै 
छुआछूत हौ ऊँच -नीच हौ जात -पांत पंचइती हउवै
का बतलाई कहै सुनै में सरम लगत हौ गान्ही जी 
केहू क नाहीं चित्त ठेकाने बरम लगत हौ गान्ही जी 
अइसन तारू चटकल अबकी गरम लगत हौ गान्ही जी 
गाभिन हौ कि ठाँठ मरकही भरम लगत हौ गान्ही जी 

जे अलले बेईमान इहाँ ऊ डकरै किरिया खाला 
लम्बा टीका मधुरी बानी पंच बनावल जाला 
चाम ,सोहारी काम सरौता पेटै -पेट घोटाला 
एक्को करम न छूटल लेकिन चौचक कंठी -माला 
नोना लगल भीत हौ सगरौ गिरत -परत हौ गान्ही जी 
हाड़ परल हौ अंगनै -अंगना मार टरत हौ गान्ही जी 
झगरा कई जर अनखुन खोजै जहाँ लहत हौ गान्ही जी 
खसम मार के धूम -धाम से गया करत हौ गान्ही जी 

उहै अमीरी उहै गरीबी उहै जमाना अब्बौ  हौ 
कब्बो गयल न जाई जड़ से रोग पुराना अब्बौ हौ 
दुसरे के कब्जा में आपन दाना -पानी अब्बौ हौ 
जहाँ खजाना रहल हमेशा उहैं खजाना अब्बौ हौ 
कथा -कीर्तन बाहर ,भीतर जुआ चलत हौ गान्ही जी 
माल गलत हौ दुई नंबर क दाल गलत हौ गान्ही जी 
चाल गलत -चउपाल गलत हर फाल गलत हौ गान्ही जी 
ताल गलत ,हड़ताल गलत पड़ताल गलत हौ गान्ही जी 

घूस पैरवी जोर सिफ़ारिस झूठ नकल मक्कारी वाले 
देखतै -देखत चार दिना में भइलै महल अटारी वाले 
इनके आगे भकुआ जैसे फरसा अउर कुदारी वाले 
देहलै खून पसीना देहलै तब्बौ बहिन -मतारी वाले 
तोहरै नाम बिकत हौ सगरौ मांस बिकत हौ गान्ही जी 
ताली पीट रहल हौ दुनियां खूब हँसत हौ गान्ही जी 
केहू कान भरत हौ केहू मूंग दरत हौ गान्ही जी 
कहई के हौ सोर धोवाइल पाप फरत हौ गान्ही जी 

जनता बदे जयंती बाबू नेता बदे निशाना हउवै
पिछला साल हवाला वाला अगिला साल बहाना हउवै
आज़ादी के माने खाली राजघाट तक जाना हउवै 
साल भरे में एक बेर बस रघुपति राघव गाना हउवै
अइसन चढल भवानी सीरे ना उतरत हौ गान्ही जी 
आग लगल हौ धुवां उठत हौ नाक बजत हौ गान्ही जी 
करिया अच्छर भइंस बरोब्बर वेद लिखत हौ गान्ही जी 
एक समय क बागड़बिल्ला आज भगत हौ गान्ही जी 
कवि -कैलाश गौतम 
समय [08-01-1944से 09-12-2006]
[कवि -कैलाश गौतम का परिचय हमारे दोनों ही ब्लाग में दिया गया है -]

6 comments:

  1. करिया अच्छर भइंस बरोब्बर वेद लिखत हौ गान्ही जी
    एक समय क बागड़बिल्ला आज भगत हौ गान्ही जी

    कैलाश गौतम की यह पुरानी कविता वास्तव में आज भी प्रासंगिक है | इसे पढ़वाने के लिए हार्दिक आभार...

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  2. वाह! अद्भुत!!
    बोलो गान्ही महतमा की जै।

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  3. जय जय हमरे गान्हीजी।

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  4. सुन्दर ,सार्थक और प्रासंगिक रचना

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  5. वाह रे कैलाश गौतम अमर हुई गएँ हैं आप -अद्भुत रचना ..!

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