एक गीत-पारदर्शी जल नदी का
पारदर्शी जल
नदी का और
जल में मछलियाँ हैं ।
गा रहा सावन
फिरोज़ी होंठ
वाली कजलियाँ हैं ।
उड़ रहे बादल
हवा में
खेत-जंगल सब हरे हैं,
खिड़कियों में
आ रही बौछार
बादल सिरफ़िरे हैं
सूर्य को
बन्धक बनाये
खिलखिलाती बिजलियाँ हैं ।
झील में
नीले-गुलाबी
कमल फिर खिलने लगे हैं,
सांध्य बेला से
तनिक पहले
दिए जलने लगे हैं,
खुशबुओं के
पँख फैलाये
हवा में तितलियाँ हैं ।
कवि -जयकृष्ण राय तुषार
![]() |
| चित्र साभार गूगल |

