![]() |
लोकप्रिय कवि -कैलाश गौतम समय -[08-01-1944से 09-12-2006] |
आ गए
उस पार से इस पार
बादल आ गए |
लो पढ़ो
यह आज का अखबार
बादल आ गए |
पर्वतों को लाँघते
झकझोरते जंगल
हवा से खेलते बादल ,
घाटियों को गुदगुदाते
छेड़ते झरने
शिलाएँ ठेलते बादल ,
लिख गई
चारो तरफ जलधार
बादल आ गए |
केवड़े फूले
पकी जामुन ,नदी लौटी
पसीना खेत में महका ,
घाट पर फूटे घड़े
पनिहारिनें बिछ्लीं
कछारों में हिरन बहका
भीड़ में
खुलकर मिले त्यौहार
बादल आ गए |
भीड़ के हाथों लगी
झूले चढ़ीं
मीठी फुदकती कजलियाँ भोली
घर चलो
मेरी पहाड़ी नगीनों अब
गुनगुनाती तितलियाँ बोलीं
पटरियों से
उठ गए बाज़ार
वाह...
ReplyDeleteबहुत सुन्दर..
सादर
अनु
बहुत मनभावन प्रस्तुति...
ReplyDeleteसच कहा, अब तो बादलों का आना भी खबर बन गयी है।
ReplyDeleteलोकप्रिय कवि -कैलाश गौतम की रचना पढवाने के लिए,,,,आभार
ReplyDeleteRECENT POST काव्यान्जलि ...: रक्षा का बंधन,,,,
पर्वतों को लाँघते
ReplyDeleteझकझोरते जंगल
हवा से खेलते बादल ,
घाटियों को गुदगुदाते
छेड़ते झरने
शिलाएँ ठेलते बादल ,
लिख गई
चारो तरफ जलधार
बादल आ गए |
______________________________
अब बादलों का आना अखबार में कभी क्भार छपने वाली किसी सुखद खबर सा लगता है।
भाव प्रधान रचना के लिए शुक्रिया ...
ReplyDeleteपूरा श्रावण परिदृश्य खींच दिया...धन्यवाद...रचना साझा करने के लिए...
ReplyDelete