Wednesday, 15 August 2012

बापू तेरे सपनों वाली वह आज़ादी कहाँ गयी ?

चित्र -गूगल से साभार 
बापू तेरे सपनोंवाली वह आज़ादी कहाँ गयी ?
बापू तेरे सपनों वाली
वह आज़ादी कहाँ गयी |
तुम जिसको चरखे में 
बुनते थे वह खादी कहाँ गयी |

नेता ,मंत्री खुलेआम 
अब सिर्फ़ तिजोरी भरते हैं .
सत्यमेवजयते को 
हर दिन झूठा साबित करते हैं ,
राजनीति वह पहलेवाली 
सीधी -सादी कहाँ गयी |

ठेकेदार व्यवस्था वाले 
राजमार्ग सब टूटे हैं ,
जन को पूछे कहाँ सियासत 
करम हमारे फूटे हैं ,
और अधिक पाने में 
अपनी रोटी आधी कहाँ गयी |

राजा जितना गूंगा -बहरा 
उतने ही हरकारे हैं ,
बंजर धरती ,कर्ज किसानी 
हम कितने बेचारे हैं ,
रामराज के सपनों वाली 
वह शहजादी कहाँ गयी |

जो भी सूर्य उगाते हैं हम 
उसको राहु निगल जाता है ,
सत्ता पाकर धर्मराज भी 
अक्सर यहाँ फिसल जाता है ,
जो सबका सुख दुःख सुनती थी 
वह आबादी कहाँ गयी |

13 comments:

  1. स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएँ!


    सादर

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  2. बहुत खूब...

    स्वतंत्रता दिवस की बहुत बधाई।

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  3. सलाम बंधुवर...सीधे और सपाट शब्दों में जो प्रश्न उठाये हैं...वो लाजवाब हैं...हम होंगे कामयाब...पर कब होंगे कामयाब...आधे से ज्यादा जीवन तो निकल गया...

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  4. जाने कहाँ चली गयी ..वो आज़ादी...वो रोटी...
    बेहतरीन रचना.
    स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएँ!

    सादर
    अनु

    ReplyDelete
  5. बापू तेरे सपनों वाली
    वह आज़ादी कहाँ गयी |
    तुम जिसको चरखे में
    बुनते थे वह खादी कहाँ गयी |
    Waqayee...

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  6. इन ज्वलंत प्रश्नों का उत्तर पाने का हक हर भारतीय को है।

    बहुत सुंदर गीत।

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  7. स्वप्न है अभी कहीं, स्वप्न की जो आस थी,
    बाँध टूटता रहा, रिक्तता की प्यास थी।

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  8. बहुत सुंदर रचना.

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  9. जो भी सूर्य उगाते हैं हम
    उसको राहु निगल जाता है ,
    सत्ता पाकर धर्मराज भी
    अक्सर यहाँ फिसल जाता है ,
    जो सबका सुख दुःख सुनती थी
    वह आबादी कहाँ गयी |

    ...बहुत ही सटीक और सुंदर अभिव्यक्ति...

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  10. शानदार प्रस्तुति .......राय साहब ....बहुत -२ शुभकामनाएं ...

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  11. सराहनीय ,शानदार रचना सर।
    सादर।
    -----
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार ३० जनवरी २०२४ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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