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कवयित्री -अपरा रंजन
e-mail-apara.ranjan@gmail.com
PhD student,Department of Psychology
University of British Columbia, Okanagan Canada |
नदी जब अपने उद्दाम वेग से प्रवाहित होना चाहती है तो कठोर से कठोर चट्टानों को तोड़कर अपना रास्ता बना ही लेती है |हिन्दी के ख्यातनाम कवि दुष्यन्त भी तो यही कहते हैं -कौन कहता है आकाश में सुराख़ नहीं हो सकता /एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों |हमारे देश की बेटियाँ जब अपना हुनर दिखाना चाहती हैं तो कल्पना चावला ,बछेंद्री पाल और सुनीता लिन विलियम्स बनते उन्हें देर नहीं लगती बस उन्हें चाहिए तो थोड़ा सा सहयोग और माता -पिता का स्नेह और आशीर्वाद | अपरा रंजन भी उन्हीं होनहार भारतीय बेटियों में से एक है जो सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने हुनर के दम पर और माँ -पिता के प्यार और आशीर्वाद से आज कनाडा जैसे देश में रिसर्च कर रही है |[ RESEARCH: underlying mechanism of creativity, individual differences, creative style] अपरा भारत के मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए एक उदाहरण बन सकती है |अपरा की माँ एक कवयित्री होने के साथ -साथ हिन्दुस्तानी एकेडमी में सहायक संपादक और पिता हिमांशु रंजन जी एक पत्रकार हैं |अपरा रंजन का जन्म 25मई 1984को इलाहबाद में हुआ था |इलाहबाद के प्रतिष्ठित सेंट मेरी स्कूल से इंटरमीडिएट करने के बाद इलाहबाद यूनिवर्सिटी से कागनेटीव एण्ड विहेवियरल साइंस में स्नातकोत्तर किया |पुणे की एक कपंनी में युजिबेलिटी इंजीनियर के रूप में काम किया |ट्रिपलआईटी हैदराबाद में प्रोजेक्ट कोआर्डिनेटर के पद पर रहते हुए पी० एच० डी० के लिए आवेदन किया |नीदरलैंड और कनाडा दोनों स्थान से फेलोशिप मिली, लेकिन रिसर्च के लिए अपरा ने चुना कनाडा की प्रतिष्ठित ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी को |अपरा बहुमुखी प्रतिभा की धनी लड़की है |बचपन से ही थियेटर का शौक था |इलाहबाद में रहते हुए हिंदी अंग्रेजी दोनों नाटकों में अभिनय किया| सचिन तिवारी के साथ एन० एस० डी० सहित देश के महत्वपूर्ण स्थानों पर अभिनय किया |अपरा रंजन कनाडा में रहते हुए भी थियेटर से जुड़ी है और एकाध फिल्मों में भी काम किया है |हिंदी और अंग्रेजी में कवितायें भी लिखना अपरा का शौक है |ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी में इंस्ट्रक्टर और शोध छात्र अपरा रंजन की तीन कविताएँ हम अंतर्जाल के माध्यम से आप तक पहुँचा रहे हैं |मित्र हिमांशु रंजन जी और भारत की इस लाडली बेटी को मेरी शुभकामनाएं |
तीन कविताएँ सात समन्दर पार से -युवा कवयित्री अपरा रंजन
एक -बारिश
देखो मेरे आँगन में
बादल समेट लाये हैं
दशकों ढोये वो आँसू
एक बार फिर .....
पिछली बारिश के बाद
भींगा रहा था सब कुछ
कितने दिनों तक .....
वो गीली मिट्टी की खुशबू
याद है ....!
मिट्टी से सने
तुम्हारे पैरों के निशां
भीतर तक बने थे
यादों का आँचल निचोड़ा था ....
जैसे ,अरसे लगे हों उन्हें मिटाने में
एक टक खिड़की से
मैं देख रही थी इन्द्रधनुष
उसके पार था बादल ,
उसके पार थे तुम
क्या तुम भी वापस आ जाओगे ?
इस बारिस के संग |
दो -इंतज़ार
टुकड़े -टुकड़े समंदर बचा के रखे हैं
उन तस्वीरों के हिस्से
किताबों में दबा के रखे हैं
वो फूल भी मुरझा के रखे हैं
ये रोज की कशमकश में
न जाने कितने कल छुपा के रखे हैं
उड़ते थे जिस आकाश में
उस उड़ान के पर कटा के रखे हैं
वो शाम का जो गीत था
उसके सुर गुनगुना के रखे हैं
जो चाय के प्याले रखे थे तुमने डायरी पर
उसके निशां बचा के रखे हैं
वो जो लिखी थी अधूरी कविता
वो पन्ने अब भी कुचमुचा के रखे हैं
कभी आके मिलो तो हमसे
हमने सारे झगड़े सुलझा के रखे हैं |
तीन -एक ख्वाहिश मेरी भी
बिस्तर की सिलवटों में
तलाशती हूँ खुद को
कहीं शायद मिल जाऊं
सिकुड़ी ,कुचली ,बिखरी सी पूरी 'मैं '
कुछ टुकड़े बिछे हैं मेरे
इस घर के फर्श ,दीवार ,रसोई ,बारजे पर
और कुछ टंगे हैं इन परदों की तरह
जो हवा के छूते ही लहराते हैं
मैंने खो दिया खुद को -
जिस दिन तुमने मुझे यूँ ही पाया था
न सहेजा ,न सँवारा ,न ही फेंका मुझको
बेतरतीबी से दबाया तह -दर -तह
तुम्हारी बेवजह ,बेहिसाब ख्वाहिशें
हमारे दिल के आईने को करती जा रही हैं
धुंधला और भी धुँधला ..
तुम मुझे पाकर भूल चुके हो
और मैं हैरान हूँ अपने अस्तित्व को खोकर
शायद ये हाथों की लकीरें नहीं
सख्त लोहे की जंजीरे हैं
एक ख्वाहिश मेरी भी है
ऐ सूरज गला दे इन्हें
ऐ हवा उड़ा ले चल मुझे दूर कहीं ..बहुत दूर
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| अपरा रंजन बाएं साथ में उसकी प्रवासी सहेलियां |