Sunday, September 25, 2011

मेरा एक गीत -सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर के लिए

सुर साम्राज्ञी भारत रत्न -लता मंगेशकर 
कल फेसबुक पर ब्लॉगर  अंजू शर्मा ने लता जी का कोई गाना टैग किया था |कमेंट्स में मैंने लिखा कि  लता को सुनना एक सदी को सुनना है |बस यहीं से मेरे जेहन में एक विचार आया की क्यों न इस महान गायिका के जन्म दि  पर एक  गीत लिखने की कोशिश की जाये |मित्रों लता जी का जन्म 28 सितम्बर 1929 को ब्रिटिश इंडिया में इंदौर में हुआ था |इनके पिता का नाम दीनानाथ मंगेशकर था जो कि गोमांतक मराठा समाज से थे |जब लता जी मात्र तेरह वर्ष की थीं तभी उनके सिर से पिता का साया उठ गया |लता जी के पिता के दोस्त थे नवयुग चित्र पट मूवी के मालिक विनायक दामोदर कर्नाटकी ,इन्होनें ही लता जी की देखभाल किया |सुप्रसिद्ध गायिका आशा भोसले ,हृदय नाथ मंगेशकर ,उषा मंगेशकर और मीना मंगेशकर, इन सब भाई बहनों में लता जी सबसे बड़ी हैं |लता जी के  प्रथम संगीत गुरू स्वयं इनके पिता थे |लता जी ने पांच वर्ष की उम्र से ही संगीत सीखना प्रारम्भ कर दिया |प्रारम्भ में फ़िल्मी दुनिया में लता जी की आवाज़ को पतली या [thin]कहा गया |लता जी के गायन का विधिवत सफ़र 1940-1942]से शुरू होता है |भारत की प्रादेशिक और विदेशी लगभग 36भाषाओँ में लता जी ने गाया |सन 1974-1991में गिनीज बुक में भी इनका नाम दर्ज़ हुआ |भारत के  सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से इनको सम्मानित किया गया |हम सदी की इस महान गायिका को अपना यह गीत समर्पित कर रहे हैं -
सदी की महान गायिका लता मंगेशकर जी को समर्पित
मेरा एक गीत [लता जी के जन्म दिन  28 सितम्बर पर विशेष  भेंट ]
सदी को सुन रहा हूँ मैं 
लता के 
गीत के कुछ फूल 
केवल चुन रहा हूँ मैं |
उन्हें सुनकर के 
लगता है 
सदी को सुन रहा हूँ मैं |

सुहागन 
चूड़ियों में भी 
उसी की धुन खनकती है ,
भरे फूलों से 
जंगल में कोई 
चिड़िया चहकती है ,

प्रशंसा में 
लिखूं तो क्या लिखूं  
सिर धुन रहा हूँ मैं |

उसी की धुन में 
मंदिर के पुजारी 
मन्त्र पढ़ते हैं ,
हम उसकी 
प्यास की खातिर 
सुनहरे शब्द गढ़ते हैं ,

सुरों के 
रेशमी धागों से 
खुद को  बुन रहा हूँ मैं |

सभी संगीत के 
सुर मिल के 
उसका सुर बनाते हैं ,
वतन के 
नाम पर भी हम 
उसी को गुनगुनाते हैं ,

वो सातो 
आसमानों में 
उसी को सुन रहा हूँ मैं |


तुम्हीं से 
जागतीं सुबहें ,
सुहानी शाम होती हैं ,
सुरों की 
हर कोई महफ़िल 
तुम्हारे नाम होती है ,


तुम्हें 
बचपन से सुनता हूँ 
मगर बे -धुन रहा हूँ मैं |

समन्दर 
भावनाओं का 
लता के दिल में बहता है ,
कि जैसे 
झील में कोई 
कमल का फूल रहता है ,

वो परियों 
की कहानी है 
उसी को गुन रहा हूँ मैं |
चित्र -गूगल से साभार 

Thursday, September 22, 2011

मेरी दो ग़ज़लें

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
 [दोनों ही ग़ज़लें पुरानी हैं लेकिन सन्दर्भ नहीं बदले हैं ]
एक 
मैं अपने दिल के आईने को धुँधलाने नहीं देता 
किसी का अक्स भी तेरे सिवा आने नहीं देता 

शहर के रहबरों में जिसका ऊँचा नाम है यारों 
हमारे जख्म हमको ही वो सहलाने नहीं देता 

हजारों बार मैं दरिया में डूबा और बच निकला 
तलातुम में तुम्हारा प्यार घबराने नहीं देता 

कभी बारिस ,कभी आंधी कभी जंगल ही जलता है 
ये मौसम अब परिंदों को कभी गाने नहीं देता 

बिछड़ने पर तुम्हारे प्यार का एहसास बरसों से 
तसव्वुर में खिले फूलों को मुरझाने नहीं देता 
दो 
धूप में झुलसा हुआ सिर धान की बाली का है 
फिर भी तुम कहते हो मंजर ये भी हरियाली का है 

इस कदर हालात से मजबूर है कव्वाल भी 
गा रहा है मर्सिया उनवान कव्वाली का है 

स्याह चेहरे हो गए खुद लालटेनों के ,यहाँ 
फिर भी दीवारों पे लिक्खा पर्व दीवाली का है 

पार्कों में पा रहे सम्मान आयातित बबूल 
पांव से रौंदा हुआ हर फूल शेफ़ाली का है 

मौसम -ए -बारिश में गर पेड़ों से चिनगारी उठी 
कुछ न कुछ तो हाथ इसमें दोस्तों माली का है 

ये न पूछो पेड़ के साये कहाँ गुम हो गये 
जब आराकश ही  पासवां हर पेड़ की डाली का है 

इश्तहारों में ही तुमने रोटियां बांटी यहाँ 
वर्ना जर्रे -जर्रे पर तो जिक्र बदहाली का है 
चित्र -गूगल से साभार 

Saturday, September 17, 2011

तीन कविताएँ समन्दर पार से -युवा कवयित्री अपरा रंजन

कवयित्री -अपरा रंजन
e-mail-apara.ranjan@gmail.com
 PhD student,Department of Psychology
University of British Columbia, Okanagan Canada
नदी जब अपने उद्दाम वेग से प्रवाहित होना चाहती है तो कठोर से कठोर चट्टानों को तोड़कर अपना रास्ता बना ही लेती  है |हिन्दी के ख्यातनाम कवि दुष्यन्त भी तो यही कहते हैं -कौन कहता है आकाश में सुराख़ नहीं हो सकता /एक पत्थर तो तबीयत  से उछालो यारों |हमारे देश की बेटियाँ जब अपना हुनर दिखाना चाहती हैं तो कल्पना चावला ,बछेंद्री पाल और सुनीता लिन विलियम्स बनते उन्हें देर नहीं लगती बस उन्हें चाहिए तो थोड़ा सा सहयोग और माता -पिता का स्नेह और आशीर्वाद | अपरा रंजन भी उन्हीं होनहार भारतीय बेटियों में से एक है जो सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने हुनर के दम पर और माँ -पिता के प्यार और आशीर्वाद से आज कनाडा जैसे देश में रिसर्च कर रही है |RESEARCH: underlying mechanism of creativity, individual differences, creative style] अपरा भारत के  मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए एक उदाहरण बन सकती है |अपरा की माँ एक कवयित्री होने के साथ -साथ हिन्दुस्तानी एकेडमी में सहायक संपादक और पिता हिमांशु रंजन जी एक पत्रकार हैं |अपरा रंजन का जन्म 25मई  1984को  इलाहबाद में हुआ था |इलाहबाद के प्रतिष्ठित सेंट मेरी स्कूल से इंटरमीडिएट करने के बाद इलाहबाद यूनिवर्सिटी से कागनेटीव एण्ड विहेवियरल साइंस में स्नातकोत्तर किया |पुणे की एक कपंनी में युजिबेलिटी इंजीनियर के रूप में काम किया |ट्रिपलआईटी हैदराबाद में प्रोजेक्ट कोआर्डिनेटर के पद पर रहते हुए पी० एच० डी० के लिए आवेदन किया |नीदरलैंड और कनाडा दोनों स्थान से फेलोशिप मिली, लेकिन रिसर्च के लिए अपरा ने चुना कनाडा की प्रतिष्ठित ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी को |अपरा बहुमुखी प्रतिभा की धनी लड़की है |बचपन से ही थियेटर का शौक था |इलाहबाद में  रहते हुए हिंदी अंग्रेजी दोनों नाटकों में अभिनय किया| सचिन तिवारी के साथ एन० एस० डी० सहित देश के महत्वपूर्ण स्थानों पर अभिनय किया |अपरा रंजन कनाडा में रहते हुए भी थियेटर से जुड़ी है और एकाध फिल्मों में भी काम किया है |हिंदी और अंग्रेजी में कवितायें भी लिखना अपरा का शौक है |ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी में इंस्ट्रक्टर और शोध छात्र अपरा रंजन की तीन कविताएँ  हम अंतर्जाल के माध्यम से आप तक पहुँचा रहे हैं |मित्र हिमांशु रंजन जी और भारत की इस लाडली बेटी को मेरी शुभकामनाएं |

तीन कविताएँ सात समन्दर पार से -युवा कवयित्री अपरा रंजन 
एक -बारिश 
देखो मेरे आँगन में 
बादल समेट लाये हैं 
दशकों ढोये वो आँसू 
एक बार फिर .....

पिछली बारिश के बाद 
भींगा रहा था सब कुछ 
कितने दिनों तक .....
वो गीली मिट्टी की खुशबू 
याद है ....!

मिट्टी से सने 
तुम्हारे पैरों के निशां 
भीतर तक बने थे 
यादों का आँचल निचोड़ा था ....
जैसे ,अरसे लगे हों उन्हें मिटाने में 

एक टक खिड़की से 
मैं देख रही थी इन्द्रधनुष 
उसके पार था बादल ,
उसके पार थे तुम 
क्या तुम भी वापस आ जाओगे ?
इस बारिस के संग |
दो -इंतज़ार 
टुकड़े -टुकड़े समंदर बचा के रखे हैं 
उन तस्वीरों के हिस्से 
किताबों में दबा के रखे हैं 
वो फूल भी मुरझा के रखे हैं 
ये रोज की कशमकश में 
न जाने कितने कल छुपा के रखे हैं 
उड़ते थे जिस आकाश में 
उस उड़ान के पर कटा के रखे हैं 
वो शाम का जो गीत था 
उसके सुर गुनगुना के रखे हैं 
जो चाय के प्याले रखे थे तुमने डायरी पर 
उसके निशां बचा के रखे हैं 
वो जो लिखी थी अधूरी कविता 
वो पन्ने अब भी कुचमुचा के रखे हैं 
कभी आके मिलो तो हमसे 
हमने सारे झगड़े सुलझा के रखे हैं |
तीन -एक ख्वाहिश मेरी भी 
बिस्तर की सिलवटों में 
तलाशती हूँ खुद को 
कहीं शायद मिल जाऊं 
सिकुड़ी ,कुचली ,बिखरी सी पूरी 'मैं '
कुछ टुकड़े बिछे हैं मेरे 
इस घर के फर्श ,दीवार ,रसोई ,बारजे पर 
और कुछ टंगे हैं इन परदों की तरह 
जो हवा के छूते ही लहराते हैं 
मैंने खो दिया खुद को -
जिस दिन तुमने मुझे यूँ ही पाया था 
न सहेजा ,न सँवारा ,न ही फेंका मुझको 
बेतरतीबी से दबाया तह -दर -तह 
तुम्हारी बेवजह ,बेहिसाब ख्वाहिशें 
हमारे दिल के आईने को करती जा रही हैं 
धुंधला और भी धुँधला ..
तुम मुझे पाकर भूल चुके हो 
और मैं हैरान हूँ अपने अस्तित्व को खोकर 
शायद ये हाथों की लकीरें नहीं 
सख्त लोहे की जंजीरे हैं 
एक ख्वाहिश मेरी भी है 
ऐ सूरज गला दे इन्हें 
ऐ हवा उड़ा ले चल मुझे दूर कहीं ..बहुत दूर 
अपरा रंजन बाएं साथ में उसकी प्रवासी सहेलियां 

Tuesday, September 13, 2011

मेरी एक गज़ल-हमीं से रंज


हमीं से रंज ,ज़माने से उसको प्यार तो है 
चलो कि  रस्मे मोहब्बत पे एतबार तो है 

मेरी विजय पे न थीं  तालियाँ न दोस्त रहे 
मेरी शिकस्त का इन सबको इंतजार तो है 

हजार नींद में एक फूल छू गया था हमें 
हजार ख़्वाब था लेकिन वो यादगार तो है 

गुजरती ट्रेनें रुकीं खिड़कियों से बात हुई 
उस अजनबी का हमें अब भी इंतजार तो है 

तुम्हारे दौर में ग़ालिब ,नज़ीर ,मीर सही 
हमारे दौर में भी एक शहरयार तो है 

अब अपने मुल्क की सूरत जरा बदल तो सही 
तेरा निज़ाम है कुछ तेरा अख्तियार तो है 

हमारा शहर तो बारूद के धुंए से भरा 
तुम्हारे शहर का मौसम ये खुशगवार तो है 
[सभी चित्र गूगल से साभार ]

Sunday, September 11, 2011

साक्षात्कार -दीवार के उस पार-प्रोफ़ेसर बी० आर० दीपक से अरुण आदित्य की बातचीत

चीन के सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित जे० एन० यू० के चीनी भाषा के विद्वान
 प्रोफेसर बी० आर० दीपक 
चीन के सर्वोच्च सम्मान स्पेशल बुक प्राइज से सम्मानित चीनी भाषा के   प्रोफ़ेसर  बी० आर० दीपक से अरुण आदित्य की बातचीत 
जे० एन० यू० में चीनी भाषा के विद्वान बी० आर० दीपक एक ऐसी सीढ़ी तैयार कर रहे हैं ,जिस पर चढकर चीन की लौह दीवार के उस पार देखा जा सकता है कि वहां साहित्य और संस्कृति का क्या हाल है |यह सीढ़ी है भाषा की ,अनुवाद की और मैत्री की |हाल ही में चीन ने उन्हें विदेशी मूल के लेखकों के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान -स्पेशल बुक प्राइज़-से सम्मानित किया है |
अरुण आदित्य [-जाने -माने कवि ,उपन्यासकार और अमर उजाला के संपादक साहित्य ]
भारत और चीन के बीच द ग्रेट वाल ऑफ चाइना  भले ही  न हो ,संशय और संवादहीनता की दीवार जरूर है |यही वजह है कि दोनों देशों के लोग एक दूसरे के साहित्य -संस्कृति के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं रखते हैं |बी० आर० दीपक एक ऐसे शख्स हैं ,जिन्होंने इस संवादहीनता को को कम करने के लिए काफ़ी प्रयास किया है |उन्होंने भारत चीन के रिश्तों पर कई महत्वपूर्ण किताबें लिखीं है |हाल ही में उन्होंने भारत चीन की 88क्लासिक कविताओं का अनुवाद किया है ,जिसे चीन के सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित किया गया है |प्रोफेसर बी० आर० दीपक से की गयी यह महत्वपूर्ण बातचीत आज अमर उजाला के शब्दिता पेज पर प्रकाशित है |हम साभार अमर उजाला इसे आप तक पहुंचा रहे हैं -
अरुण आदित्य -जिस मिटटी से यह दीपक बना है ,कुछ उसके बारे में बताएं |

बी० आर० दीपक --14 अक्टूबर 1966 को टील गांव ,तहसील बंजार जिला कुल्लू [हिमांचल प्रदेश ]में मेरा जन्म हुआ |बचपन भी वहीँ बीता |पिता जी किसान थे |काफी बड़ा परिवार था |हम पांच भाई चार बहनें हैं |प्राथमिक शिक्षा वहीं से हुई ,टील स्कूल से ,जो कि काफी पुराना प्राइमरी स्कूल है |ऐसा कहा जाता है कि 1927 में अंग्रेजों ने उसे बनवाया था |आजकल वह  मिडल स्कूल हो गया है ,लेकिन हाई स्कूल नहीं है इतने सालों के बाद भी |हाई स्कूल मैंने मंडी जिले के गडा गुसांई हाई स्कूल से पास किया |हमारे गांव से वह चार -पांच किलोमीटर दूर है |हम लोग पैदल ही पढ़ने जाते थे |जाने -आने में करीब एक घंटा लग जाता था |हाई स्कूल के बाद आगे की पढ़ाई कुल्लू कालेज से की |ग्यारहवीं और बारहवीं में  टॉपर था |
अरुण आदित्य -अक्सर टॉपर स्टूडेंट्स मेडिकल ,इंजीनियरिंग या आई० ए० एस० आदि में जाने का ख्वाब देखते हैं ,आप चीनी भाषा  के चक्कर में कैसे पड़ गए ?
बी० आर० दीपक -जब मैं बारहवीं में था ,उसी दौरान चीन में मेरी रूचि पैदा हो गई |चीन के इतिहास और और संस्कृति के बारे में किताबें पढ़नी शुरू की ,उसी समय हमारी मुलाकात प्रोफेसर बरियाम सिंह से हुई ,जो जवाहरलाल नेहरु विश्व विद्यालय में रुसी भाषा के प्रोफेसर हैं |वे मेरे बड़े भैया के मित्र भी हैं |उन्होंने भाई साहब से कहा कि अगर तुम्हारे भाई को विदेशी भाषाओँ में रूचि है तो इसे जे० एन० यू० भेज दो |फिर हमने जे०एन० यू० की प्रवेश परीक्षा दी |उसमें पास हो गए और 1986 में चीनी भाषा विभाग में आ गए |
अरुण आदित्य --आपकी जो पुरस्कृत कृति "चीनी कविता :ईसा पूर्व ग्यारहवीं सदी से ईसा पश्चात 14 वीं सदी तक है ,उसमें आपने 88कविताओं का अनुवाद किया है |इन कविताओं का चयन कैसे किया ?
बी० आर० दीपक ---मेरी पढ़ाई जे० एन० यू० में खत्म हो गई तो तो मैं भारत सरकार की छात्रवृत्ति पर चीन गया था |आने के बाद मैंने शोध कार्य शुरू किया और 1993 में जब मैंने जे० एन० यू० में पढ़ाना शुरू किया ,तो उसमें एक सब्जेक्ट था क्लासिकल चाईनीज लिटरेचर |उसमें 11सदी ईसा पूर्व से लेकर बाद का सारा पुराना क्लासिकल साहित्य पढ़ाना था |इस तरह उस साहित्य में मेरी रूचि बढ़ती गयी और मैंने इस पर एक किताब भी लिखी :हिस्ट्री ऑफ चाइनीज लिटरेचर :|यह किताब जे० एन० यू० में एम० ए० में पढ़ाईं जाती है |इस किताब के लिए शोध करते हुए चीनी कविताओं से भी मेरा गहरा परिचय हुआ |इस किताब के लिए कविताओं का चयन करते समय यह परिचय बहुत काम आया |कविताओं का चयन करते समय मैंने कालक्रम का तो ख्याल रखा  ही इस बात का भी ध्यान रखा कि हर काल की चर्चित और श्रेष्ठ कृतियों को ही शामिल करूँ |
अरुण आदित्य -आपने जिन कवियों का चयन किया है ,उनमें और प्राचीन भारतीय कवियों जैसे सूर ,तुलसी ,कबीर आदि की रचनाओं में क्या कुछ विषय साम्य मिलता है ?
बी० आर० दीपक --चीनी कविता भारतीय कविता से काफी  कुछ मिलती है |लेकिन जैसा हमारे यहाँ भक्ति काल है ,वैसा वहाँ की कविता में कुछ दीखता नहीं है लेकिन दूसरी तमाम शैलियाँ ,जैसे वीरगाथा काल है ,उस तरह की शैली में वहाँ काफी सृजन हुआ है |जैसे ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के कवि हैं छी य्वान उन्होंने वीर रस में काफी कविताएँ लिखी हैं |थांग वंश में कई कवियों ने वीर रस में कविताएँ लिखी हैं |वहाँ वीरगाथा काल का कोई एक निश्चित काल खण्ड नहीं है |हर राजवंश के काल में कुछ -कुछ कवियों ने वीर रस में  कविताएँ लिखी हैं |इसी तरह जैसे हमारे यहाँ रीतिकाल है ,वहाँ भी श्रृंगार रस की कविताएँ काफी लिखी गयी हैं |ली पाए बड़े ही रूमानी कवि हैं |वहाँ तू फू एक मशहूर कवि हैं |थांग काल कविता के लिए सुनहरा काल रहा है |जिसमें दो हजार से ज्यादा कवि सक्रिय थे |
अरुण आदित्य --चीन के साहित्यिक परिदृश्य के बारे में भारत के लोग बहुत कम जानते हैं |ऐसे में जिज्ञासा सहज है कि आपको जो ;स्पेशल बुक प्राइज ;मिला है ,उसका कितना महत्व है ?
बी० आर० दीपक -यह विदेशी मूल के अध्ययनकर्ताओं के लिए सर्वोच्च पुरस्कार है |इस बार का पुरस्कार मेरे आलावा कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर स्टीफन बार्न सहित पांच को मिला है |भारत और हिमांचल के लिए यह गर्व की बात है कि उनके यहाँ के एक व्यक्ति को पहचान [रिकग्नीसन ]मिली है |इसके अलावा एक और दृष्टि से इस किताब का पुरस्कृत होना महत्वपूर्ण है |जैसा आपने भी कहा ,दोनों ही देश एक दूसरे के साहित्य के बारे में बहुत कम जानते हैं |ऐसे में एक दूसरे देश की रचनाओं का अनुवाद होना दोनों देशों में सांस्कृतिक पुल बनाने की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है 
अरुण आदित्य -कहते हैं कि कविता का अनुवाद बहुत कठिन होता है और एक कवि ही सही अनुवाद कर सकता है |क्या आप भी कविताएँ लिखते हैं ?
बी० आर० दीपक -थोड़ी बहुत कविताएँ लिखता हूँ ,लेकिन मैं अपने को कवि नहीं मानता |चाईनीज क्लासिकल लिटरेचर की मुझे बहुत अच्छी समझ है और हिंदी का हमारा जो संस्कार है उससे मुझे लगा कि मैं अनुवाद कर सकता हूँ |अनुवाद जब मैंने लोगों को दिखाया तो लोगों ने कहा अनुवाद तो अच्छा है ,लेकिन इसमें थोड़ी और काव्यात्मकता होनी चाहिए |फिर मैंने जे० एन० यू० के प्रोफेसर और हिंदी के श्रेष्ठ कवि केदारनाथ सिंह और रुसी भाषा के प्रोफेसर वरयाम सिंह और गोविन्द प्रसाद की मदद ली |करीब एक साल का समय लगा इसे दुरुस्त करने में |
अरुण आदित्य --आपने भारत चीन संबंध पर एक किताब लिखी है -इंडो चाइना रिलेशंस इन फर्स्ट हाफ़ ऑफ द ट्वंटीएन्थ सेंचुरी |आपने फर्स्ट हाफ़ सेंचुरी पर ही फोकस क्यों किया ?
बी० आर० दीपक --दरअसल इसमें मैंने औपनिवेशिक काल में भारत और चीन के बीच जिस तरह के सहयोगात्मक संबंध थे ,उस पर फोकस किया है |किस तरह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लोग चीनी विद्रोहियों के साथ मिलकर काम किया करते थे |हथियार के बल पर अंग्रेजों का तख्ता पलट करने की योजनाएं भी वहाँ बनीं |1905 से 1947 तक हमारे क्रांतिकारी रासबिहारी बोस आदि ने चीनी नेताओं के साथ मिलकर अंग्रेजों को भारत से भगाने की योजना बनाई थी |जब जापान ने चीन पर आक्रमण किया ,तो भारत ने किस तरह चीन की मदद की |इंडियन नेशनल कांग्रेस ने डॉक्टर्स का  एक दस्ता भेजा ,जिसमें शोलापुर महाराष्ट्र के डॉक्टर कोटनीस भी थे |चीनी लोगों की सेवा करते -करते ही उनकी मृत्यु हो गयी थी |उन्होंने वहाँ एक चीनी नर्स से शादी की थी |वे अभी 97साल की हो गयी हैं |उन्होंने एक संस्मरण लिखा था 2004में |2006 में मैंने उसका अनुवाद किया था |चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ जब भारत आये थे तो उन्होंने मेरे द्वारा अनुवाद की गयी यह किताब डॉ० कोटनीस के परिजनों को भेंट की थी |
अरुण आदित्य -पिछले दिनों दिल्ली में हाईकोर्ट के गेट पर बम विस्फोट हुआ ,जिसमें कई लोग मारे  गए |आपने चीन और भारत पर काफी तुलनात्मक काम किया है |आतंकवाद से निपटने में भारत और चीन की नीतियों में आप क्या अंतर देखते हैं ?
बी० आर० दीपक --मुझे लगता है की हमें चीन से सबक लेने की जरूरत है |चीन की आबादी हमसे बहुत अधिक है ,किस तरह से वे अपनी पापुलेशन को मैनेज करते हैं |उनके जो भीड़ वाले इलाके हैं चाहे वो मार्केट्स हों रेलवे स्टेशन हों उनके सुरक्षा प्रबंधन को वे किस तरह मैनेज करते हैं वह काबिले तारीफ है |एंट्री और एक्जिट प्वाइंट्स डिफाइंड हैं और उन पर कैमरे लगे हुए हैं |हर हरकत पर नज़र रखी जाती है |हमारे यहाँ नई दिल्ली स्टेशन पर देखिये |एक दो जगह पर स्कैनर लगा रखे हैं लेकिन आसपास खुला एरिया है |कोई कहीं से भी घुस सकता है |
[अमर उजाला से साभार http://adityarun.blogspot.com/अरुण आदित्य का ब्लॉग है ]

Thursday, September 8, 2011

एक गीत -आज़ादी है मगर

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
रातें होती 
कोसोवो सी ,दिन 
लगते हैं वियतनाम से |
डर लगता है 
अब प्रणाम से |

हवा बह रही 
अंगारे सी 
दैत्य सरीखे हँसते टापू ,
सड़कों पर 
जुलूस निकले हैं 
चौराहों पर खुलते चाकू ,
धमकी भरे पत्र 
आते हैं कुछ 
नामों से कुछ अनाम से |

फूल सरीखे बच्चे 
अपनी कालोनी में 
अब डरते हैं ,
गुर्दा ,धमनी 
जिगर ,आँख का 
अपराधी सौदा करते हैं ,
चश्मदीद की 
आँखों में भय 
इन्हें कहाँ डर है निज़ाम से |

महिलाएं 
अब कहाँ सुरक्षित 
घर में हों या हों दफ़्तर में ,
बम जब  चाहे 
फट जाते हैं कोर्ट -
कचहरी अप्पूघर में ,
हर घटना पर 
गिर जाता है 
तंत्र सुरक्षा का धड़ाम से |

पंडित बैठे 
सगुन बाँचते क्या
बाज़ार ,हाट क्या मेले ,
बंजर खेत 
डोलते करइत 
आम आदमी निपट अकेले ,
आज़ादी है 
मगर व्यवस्था की 
निगाह में हम गुलाम से |
चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 

[यह गीत जनवरी 2011में अमर उजाला के साहित्यिक परिशिष्ट में प्रकाशित हो चुका है ]

Saturday, September 3, 2011

मेरी एक गज़ल

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
समन्दर से उठे हैं या नहीं बादल ये रब जाने 
नजूमी  बाढ़ का मंजर लगे खेतों को दिखलाने 

नमक से अब भी सूखी  रोटियां मज़दूर खाते हैं 
भले ही कृश्न चंदर ने लिखे हों इनपे अफ़साने 

रईसी देखना है मुल्क की तो क्यों भटकते हो 
किसी रहबर का घर देखो या फिर मंदिर के तहखाने 

मुसाफ़िर छोड़ दो चलना ये रस्ते हैं तबाही के 
यहाँ हर मोड़ पे मिलते हैं साकी और मयखाने 

चलो जंगल से पूछें या पढ़ें मौसम की ख़ामोशी 
परिंदे उड़ तो सकते हैं मगर गाते नहीं गाने 

ये वो बस्ती है जिसमें सूर्य की किरणें नहीं पहुंचीं 
करेंगें जानकर भी क्या ये सूरज- चाँद के माने


खवातीनों के हिस्से कम नहीं दुश्वारियां अब भी 
पलंग पर बैठने का हक नहीं है इनको सिरहाने  

सफ़र में साथ चलकर हो गए हम और भी तन्हा 
न उनको हम कभी जाने न वो हमको ही पहचाने 
चित्र -गूगल से साभार