Saturday, 14 December 2024

ग़ज़ल -गगन का चाँद भी छत से

 

चित्र साभार गूगल 

एक ग़ज़ल -


कभी लहरों पे तिरते हैं कभी मिलते सफीनों पर 

परिंदे हैं ये संगम के नहीं रहते जमीनों पर 


ग़ज़ल के शेर अब मज़दूर की गलियों में मिलते हैं 

कभी शायर ग़ज़ल कहते थे शाहों और हसीनों पर 


किताबों को सजाने में कहाँ आराम मिलता है 

हर ऊँगली थक के सो जाती हैं टाइप की मशीनों पर 


ज़रा सी प्रूफ़ की गलती ग़ज़ल को बेबहर कर दे 

असर अच्छा नहीं होता सहज पाठक, ज़हीनों पर 


महकते फूल की खुशबू चमन तक खींच लाती है 

गगन का चाँद भी छत से उतर आता है जीनों पर 


चमक सोने या हीरे की नहीं कुछ और है शायद 

किसी का नाम लिक्खा है अंगूठी के नगीनों पर 


नमन करते हैं हम अपने वतन के उन शहीदों को 

जिन्होंने हॅसते हँसते गोलियाँ खाई थी सीनो पर 


(साहित्य की किताबों को टाइप करने वाले और उसे लेखक और पाठक तक जाने लायक बनाने वाले भाई संगमलाल श्रीवास्तव सहित देश भर के साहित्यिक किताबों के टाईपिस्टों एवं प्रूफ़ रीडर्स को समर्पित )

भाई संगमलाल श्रीवास्तव 


10 comments:

  1. बहुत अच्छी ग़ज़ल

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में सोमवार 16 दिसंबर 2024 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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    1. हार्दिक आभार आपका. सादर अभिवादन

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  3. Replies
    1. हार्दिक आभार. सादर प्रणाम

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  4. बेहद खूबसूरत रचना

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    1. हार्दिक आभार आपका. सादर अभिवादन

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