Thursday, 10 September 2015

एक गीत -गाद भरी झीलों की भाप से निकलते हैं

चित्र -गूगल से साभार 



एक गीत -
झीलों की भाप से निकलते हैं 

गाद भरी 
झीलों की 
भाप से निकलते हैं |
ऐसे ही 
मेघ हमें 
बारिश में छलते हैं |

खेतों को 
प्यास लगी 
शहरों में  पानी है ,
सिंहासन 
पर बेसुध 
राजा या रानी है ,
फूलों के 
मौसम में 
फूल नहीं खिलते हैं |

बांसों के 
झुरमुट में 
चिड़ियों के गीत नहीं ,
कोहबर 
की छाप लिए 
मिटटी की भीत नहीं ,
मुश्किल में 
हम अपनी 
खुद -ब -खुद उबलते हैं |

उत्सव के 
रंगों में 
लोकरंग फीका है ,
गुड़िया के 
माथ नहीं 
काजल का टीका है ,
कोई 
संवाद नहीं 
साथ हम टहलते हैं |

बार -बार 
एक नदी 
धारा को मोड़ रही ,
हिरणों की 
टोली फिर 
जंगल को छोड़ रही ,
मंजिल का 
पता नहीं 
राह सब बदलते हैं |

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