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| चित्र -गूगल से साभार |
एक गीत -
झीलों की भाप से निकलते हैं
गाद भरी
झीलों की
भाप से निकलते हैं |
ऐसे ही
मेघ हमें
बारिश में छलते हैं |
खेतों को
प्यास लगी
शहरों में पानी है ,
सिंहासन
पर बेसुध
राजा या रानी है ,
फूलों के
मौसम में
फूल नहीं खिलते हैं |
बांसों के
झुरमुट में
चिड़ियों के गीत नहीं ,
कोहबर
की छाप लिए
मिटटी की भीत नहीं ,
मुश्किल में
हम अपनी
खुद -ब -खुद उबलते हैं |
उत्सव के
रंगों में
लोकरंग फीका है ,
गुड़िया के
माथ नहीं
काजल का टीका है ,
कोई
संवाद नहीं
साथ हम टहलते हैं |
बार -बार
एक नदी
धारा को मोड़ रही ,
हिरणों की
टोली फिर
जंगल को छोड़ रही ,
मंजिल का
पता नहीं
राह सब बदलते हैं |
