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| चित्र -गूगल से साभार |
एक गीत -शहर के एकांत में
शहर के
एकांत में
हमको सभी छलते |
ढूंढने से
भी यहाँ
परिचित नहीं मिलते |
बांसुरी के
स्वर कहीं
वन -प्रान्त में खोए ,
माँ तुम्हीं को
याद कर
हम देर तक रोए ,
धूप में
हम बर्फ़ के
मानिन्द हैं गलते |
रेलगाड़ी
शोरगुल
सिगरेट के धूँए ,
प्यास
अपनी ओढ़कर
बैठे सभी कूँए ,
यहाँ
टहनी पर
कंटीले फूल बस खिलते |
गाँव से
लेकर चले जो
गुम हुए सपने ,
गांठ में
दम हो तभी
ये शहर हैं अपने ,
यहाँ
सांचे में सभी
बाज़ार के ढलते |
भीड़ में
यह शहर
पाकेटमार जैसा है ,
यहाँ पर
मेहमान
सिर पर भार जैसा है ,
भीड़ में
तनहा हमेशा
हम सभी चलते |
[नवगीत की पाठशाला से साभार -मेरे इस गीत को आदरणीय पूर्णिमा जी ने नवगीत की पाठशाला में प्रकाशित किया था ]
