Thursday, November 24, 2011

एक गीत -प्रकृति का हर रंग माँ पहचानती है

चित्र -गूगल से साभार 
प्रकृति का हर रंग माँ पहचानती है 
शीत का मौसम 
ठिठुरती काँपती है |
बड़े होने तक -
हमें माँ ढांपती  है |

हरा है स्वेटर मगर 
मैरून  बुनती है ,
नज़र धुँधली है मगर 
माँ  कहाँ सुनती है ,
कभी कंधे तो  -
कभी कद नापती है |

रात -दिन बिखरा हुआ 
माँ घर सजाती है ,
बाद्य यंत्रों के बिना 
निर्गुण सुनाती है ,
पढ़ नहीं सकती 
कथाएं बाँचती है |

जानती रस्में -
प्रथाएं जानती है ,
प्रकृति का हर रंग 
माँ पहचानती है ,
सीढियाँ चढ़ते -
उतरते हाँफती है |


पिता कम्बल और 
हम हैं शाल ओढ़े ,
भाग्य में उसके 
अँगीठी और मोढ़े ,
माँ हमारा मन 
परखती -जाँचती है |

एक चिड़िया की तरह 
माँ घोंसला बुनती ,
वह हमारा सुर सुगम -
संगीत सा सुनती ,
उत्सवों में संग 
बहू के नाचती है |
चित्र -गूगल से साभार 

14 comments:

  1. तुषार जी नमस्कार, सही लिखा आपने मां तो सब कुछ जानती है अपने बच्चे के बारे में।

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  2. बिलकुल ताज़ा बिम्बों और नए प्रतीकों के साथ माँ के अंतर्मन को अक्षर अक्षर बाचता गीत
    धन्यवाद तुषार जी

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  3. स्म सारी और
    प्रथाएं जानती है ,
    प्रकृति का हर रंग
    माँ पहचानती है ,
    सीढियाँ चढ़ते -
    उतरते हाँफती है |

    बहुत सुंदर पंक्तियाँ ...

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  4. रस्म सारी और
    प्रथाएं जानती है ,
    प्रकृति का हर रंग
    माँ पहचानती है ,
    सीढियाँ चढ़ते -
    उतरते हाँफती है |...maa to jadu hoti hai

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  5. मां और उनकी भावनाओं को समेटती यह अभिव्‍यक्ति ...बेहतरीन ।

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  6. पिता कम्बल और
    हम हैं शाल ओढ़े ,
    भाग्य में उसके
    अँगीठी और मोढ़े ,
    माँ हमारा मन
    परखती -जाँचती है |

    ....माँ सचमुच सब जानती है...बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति...

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  7. ये जाफरानी पुलोवर उसी का हिस्सा है
    कोई जो दूसरा पहने तो दूसरा ही लगे

    बेजोड़ रचना

    बधाई

    नीरज

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  8. माँ तो सब कुछ समझती और जानती है ...बेहतरीन रचना

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  9. भारत की माँ ६ ऋतुओं से बच्चों को बचाती हैं।

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  10. शीत का मौसम
    ठिठुरती काँपती है |
    बड़े होने तक -
    हमें माँ ढांपती है |

    _______________________


    अच्छा प्रयोग है

    गीत बिल्कुल नयापन लिये हुए है

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  11. बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना! हर पंक्तियाँ दिल को छू गई! माँ के बारे में जितना भी कहा जाये कम है!

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