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| काशी /बनारस |
एक गीत -ये बनारस है
ये बनारस है
यहाँ रेशम न खादी है |
अष्टकमलों से
महकती हुई वादी है |
वस्त्र तो इसके
विचारों और मन्त्रों से बुने हैं
इसे अपना घर स्वयं
भगवान शंकर भी चुने हैं ,
यहाँ का कण -कण
अघोरी या नमाजी है |
यहीं पर रैदास की वाणी
पिघलती है
गोद में लेकर इसे
गंगा मचलती है
यहाँ पूजा ,अर्चना
प्रातः मुनादी है |
यहाँ घाटों पर
चिलम के धुंए सजते हैं
यहीं जीवन -मोक्ष के
भी छंद रचते हैं
यहाँ की हर एक सीढ़ी
सरल -सादी है |
यह समय को रंग
कितने रूप देता है
यहाँ तुलसी छाँव
कबिरा धूप देता है
सभ्यताओं की
यही माँ यही दादी है |
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| आरती गंगा जी की /सभी चित्र गूगल से साभार |

