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| चित्र -गूगल से साभार |
एक गीत -यह तो वही शहर है
यह तो
यह तो
वही शहर है
जिसमें गंगा बहती थी |
एक गुलाबी -
गंध हवा के
संग -संग बहती थी |
पन्त ,निराला
यहीं निराली
भाषा गढ़ते थे ,
इसकी
छाया में बच्चन
मधुशाला पढ़ते थे ,
एक महादेवी
कविता की
इसमें रहती थी |
अब इसमें
कुछ धूल भरे
मौसम ही आते हैं ,
छन्दहीन
विद्यापति
बनकर गीत सुनाते हैं ,
उर्वर थी
यह मिट्टी
इतनी कभी न परती थी |
संगम है
लेकिन धारा तो
मलिन हो गयी है ,
इसकी
लहरों की भाषा
कुछ कठिन हो गयी है ,
यही शहर है
जिसमें
शाम कहानी कहती थी |
मंच-
विदूषक अब
दरबारों के नवरत्न हुए ,
मंसबदारी
हासिल
करने के बस यत्न हुए ,
यही
शहर है जहाँ
कलम भी दुर्दिन सहती थी |
मंच-
विदूषक अब
दरबारों के नवरत्न हुए ,
मंसबदारी
हासिल
करने के बस यत्न हुए ,
यही
शहर है जहाँ
कलम भी दुर्दिन सहती थी |
