Wednesday, May 9, 2012

एक गीत -एक पत्ता हरा जाने किस तरह है पेड़ पर

चित्र -गूगल से साभार 
एक पत्ता हरा जाने किस तरह है पेड़ पर 
चोंच में 
दाना नहीं है 
पंख चिड़िया नोचती है |
भागते 
खरगोश सी पीढ़ी 
कहाँ कुछ सोचती है |

उगलती है 
झाग मुँह से 
गाय सूखी मेंड़ पर ,
एक पत्ता 
हरा जाने -
किस तरह है पेड़ पर ,
डूबते ही 
सूर्य के माँ 
दिया -बाती खोजती है |

पेड़ की 
शाखों पे 
बंजारे अभी -भी झूलते हैं ,
आज भी 
हम सुपरिचित 
पगडंडियों को  भूलते हैं ,
सास अब भी 
बहू पर 
इल्जाम सारा थोपती है |

धुले आँगन में 
महावर पाँव के 
छापे पड़े हैं ,
दांत में 
ऊँगली दबाये 
नैन फोटो पर गड़े हैं ,
बड़ी भाभी 
ननद को 
खुपिया नज़र से टोकती है |
चित्र -गूगल से साभार 

25 comments:

  1. बहुत बढ़िया तुषार जी...
    बेहतरीन!!!!


    सादर.

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  2. ्सुन्दर प्रस्तुति

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  3. वाह ...बहुत बढिया।

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  4. परिवर्तन तो बहुत हुआ है पर ये किस दिशा की ओर जा रहा है? नवगीत के बिम्ब हमे यह सोचने पर विवश करते हैं।

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  5. संग्रहणीय नवगीत।

    प्रथम बिंब ही ह्रदय चीर देता है...

    चोंच में
    दाना नहीं है
    पाँख चिड़िया नोचती है |
    भागते
    खरगोश सी पीढ़ी
    कहाँ कुछ सोचती है |
    ...गज़ब!

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  6. अद्भुत गीत है...भाव और भाषा कमाल की है...बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  7. चार दृश्यों में सिमटी एक सुन्दर शाम..

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  8. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 10 -05-2012 को यहाँ भी है

    .... आज की नयी पुरानी हलचल में ....इस नगर में और कोई परेशान नहीं है .

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  9. वाह तुषार जी अदभुत गीत है
    अपनी नव्यता के चरमोत्कर्ष को छूता हुआ

    भागते
    खरगोश सी पीढ़ी
    कहाँ कुछ सोचती है |

    कैसा निर्मम सच है मगर आपके अंदाज़ से दिल से आह भी निकलती है और वाह भी

    बधाई स्वीकारें

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  10. बहुत अभिव्यक्ति पूर्ण -

    अंत में खुपिया होगा या खुफिया ?

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  11. बहुत सुन्दर

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  12. बुरे वक़्त के बारे में एक अच्छी कविता!

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  13. भाषा के अनुपम प्रयोग के साथ सुन्दर रचना !

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  14. चोंच में
    दाना नहीं है
    पाँख चिड़िया नोचती है |
    भागते
    खरगोश सी पीढ़ी
    कहाँ कुछ सोचती है |
    ..वाह बहुत ही प्रभावशाली बिम्ब ..बहुत सुन्दर रचना

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  15. आज भी हम सुपरिचित पगडंडियों को भूलते हैं ,
    सास अब भी बहू पर इल्जाम सारा थोपती है |

    सोचने पर विवश करती रचना.....
    आपभी समर्थक बने तो मुझे हार्दिक खुशी होगी,

    MY RECENT POST.... काव्यान्जलि ...: कभी कभी.....

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  16. बहुत सुंदर रचना .....

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  17. दृश्य पर दृश्य ..बहुत सुन्दर.

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  18. आप सभी का दिल से आभार |

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  19. ''भागते खरगोश सी पीढ़ी यहाँ कुछ सोचती है ,'' एक अन्तराल के बाद फिर एक अच्छा गीत पढने को मिला .बधाई हो . तुषारजी !

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  20. वाह||||||
    बहुत खूब....
    सुन्दर रचना....

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  21. आपकी रचनाओं में शैलेन्द्र जी जैसी सादगी और मिटटी की महक मिलती है...

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  22. धुले आँगन में
    महावर पाँव के
    छापे पड़े हैं ,
    दांत में
    ऊँगली दबाये
    नैन फोटो पर गड़े हैं ,
    बड़ी भाभी
    ननद को
    खुपिया नजर से टोकती है द्य

    नवीन बिम्बों से सजा सुंदर गीत।

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