Thursday, 17 May 2012

एक नवगीत -हन्टर बरसाते दिन मई और जून के

चित्र -गूगल से साभार 
एक नवगीत -हन्टर बरसाते दिन मई और जून के
हन्टर 
बरसाते दिन 
मई और जून के |
खुजलाती 
पीठों पर 
कब्जे नाख़ून के |

जेठ की 
दुपहरी में 
सोचते आषाढ़ की ,
सूखे की 
चिन्ता में 
कभी रहे बाढ़ की ,
किससे 
हम दर्द कहें 
हाकिम ये दून के |

हाँफ  रही 
गौरय्या
चोंच नहीं दाना  है ,
इस पर भी 
मौसम का 
गीत इसे  गाना है  ,
भिक्षुक को 
आते हैं 
सपने परचून के |

आचरण 
नहीं बदले 
बस हुए तबादले ,
जनता के 
उत्पीड़क 
राजा के लाडले ,
कटे हुए 
बाल हुए 
हम सब सैलून के |

मूर्ति के 
उपासक ही 
मूरत के चोर हुए ,
बापू के 
चित्र टांग 
दफ़्तर घूसखोर हुए ,
नेता के 
दौरे हैं रोज 
हनीमून के |

पैमाइस के 
झगड़े 
फर्जी बैनामे हैं ,
सरपंचों की -
लाठी और 
सुलहनामे हैं ,
अख़बारों 
पर छींटे 
रोज सुबह खून के |
चित्र -गूगल से साभार 

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