Tuesday, October 21, 2014

एक नवगीत -बासीपन हवाओं में

चित्र -गूगल से साभार 



एक नवगीत -बासीपन हवाओं में 
फूल तो 
हैं किन्तु 
बासीपन हवाओं में |
लिख रहे 
मौसम 
सुहाना हम कथाओं में |

यंत्रवत 
होने लगे 
संवेदना के स्वर ,
मौन सा 
रहने लगा है 
कहकहों का घर ,
क़ैद हैं 
हम आधुनिकता के 
प्रभावों में |

जहाँ जलसा है 
वहीं पर 
त्रासदी है ,
रोज 
आदमखोर 
होती यह सदी है ,
लिख रहा 
गोधूलि बेला 
दिन ,दिशाओं में |

रोशनी है 
मगर गुम 
होते दिया -बाती ,
अब मुंडेरों पर 
सुबह 
चिड़िया नहीं गाती ,
अब नहीं 
सम्वाद 
है सखियों -सखाओं में |

5 comments:

  1. सुन्दर गीत।
    कड़वे यथार्थ की ओर ध्यान दिलाते भाव।

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  2. भाई अरुण चन्द्र राय जी आदरनीय सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी आप दोनों का बहुत बहुत आभार

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  3. मर्मस्पर्शी गीत

    सच को उकेरती अभिव्यक्ति

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