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| कवि /शायर -एहतराम इस्लाम सम्पर्क -09839814279 |
Saturday, February 26, 2011
साक्षात्कार: हिन्दी गज़ल पर एहतराम इस्लाम से जयकृष्ण राय तुषार की बातचीत
Posted by जयकृष्ण राय तुषार at 1:47 AM 6 comments Links to this post
Thursday, February 24, 2011
ग़ज़ल: तितलियाँ अच्छी लगीं
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| चित्र गूगल से साभार |
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| चित्र -गूगल से साभार |
Posted by जयकृष्ण राय तुषार at 11:33 AM 10 comments Links to this post
Labels: ग़ज़ल/तितलियाँ अच्छी लगीं
Wednesday, February 23, 2011
दो कविताएं: कवयित्री डॉ० अलका प्रकाश
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| कवयित्री डॉ० अलका प्रकाश |
उसने ऐसा क्यों किया
दुखी होगी
सोचो
अब तुम कहोगी
देखो प्रश्नों की श्रृंखला का
कोई अंत नहीं
कोई कारण
सफर करते
कभी घूरती निगाहों से
बचने के लिए
उसने सुने हैं
उनके कहकहे
बहुत सी बातों को
जब सारे काम निपटा कर
वह दफ्तर पहुंचती है
अब काफी की
कोई जरूरत नहीं है
कोल्ड ड्रिंक लाओ
दुखी क्यों हो जाती है
अनवरत
शल्य क्रियाएँ करा रहीं हैं
कहा जाता है कि
किसने कहा था
घर से बाहर निकलने के लिए
किन्तु क्या वहाँ खतरे कम हैं
रहते हैं
इंसान के भेष में भेडिये
गूंजते हैं रहीम के दोहे ..
.रहिमन निज मन कि व्यथा ......
साइलेंस इज वोयलेंस
इसी उधेड़ बुन में
जो कुर्सी पर टांग फैलाये
अश्लील फिल्मे देखकर
नौकरी जाने का डर
नारीवाद तो सिखा रहा है
उसका प्रश्न है किसके लिए
भंगिमा में कह रहा है
देखो
तुम्हारे पास देह है
तो
खरीद सकती हो
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| चित्र -गूगल से साभार |
Posted by जयकृष्ण राय तुषार at 4:23 PM 6 comments Links to this post
हिन्दी ग़ज़ल पर काव्य गोष्ठी
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Wednesday, February 16, 2011
कुछ दोहे -समय संदर्भ ,कवि :यश मालवीय
जब से आया गांव में यह मौसम अवधूत
बादल भी मलने लगे रंगों भरा भभूत
दर्पण धीरे से छुएं रंगों भींगे हाथ
मगर बिम्ब की हंसी से खुल जाए हर बात
करे गुदगुदी भोर से अंजुरी भरा गुलाल
आँखों -आँखों हल हुए सारे कठिन सवाल
टेसू से भींगी हंसी उड़ता रंग -अबीर
इन्द्रधनुष खुद हो गया रंग नहाया वेश
किरणों का कंघा लिए धूप काढती केश
धीरे धीरे खिल गयी यह फागुन की धूप
याद तुम्हारी हो गयी साँची का स्तूप
समय -संदर्भ
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Sunday, February 13, 2011
फोन पर बातें न करना चिट्ठियाँ लिखना
बातें न करना
चिट्ठियाँ लिखना |
हो गया
मुश्किल शहर में
डाकिया दिखना |
चिट्ठियों में
लिखे अक्षर
मुश्किलों में काम आते हैं ,
हम कभी
रखते किताबों में इन्हें
कभी सीने से लगाते हैं ,
चिट्ठियाँ
होतीं
सुनहरे वक्त का सपना |
इन चिट्ठियों से भी
महकते फूल
झरते हैं ,
शब्द
होठों की तरह ही
बात करते हैं ,
ये हाल
सबका पूछतीं
हो गैर या अपना |
चिट्ठियाँ
जब फेंकता है डाकिया
चूडियों सी खनखनाती हैं ,
तोडतीं हैं
कठिन सूनापन
स्वप्न आँखों में सजातीं हैं ,
याद करके
इन्हें रोना
या कभी हंसना |
वक्त पर
ये चिट्ठियाँ हर रंग के
चश्में लगातीं हैं ,
दिल मिले
तो ये समंदर
सरहदों के पार जातीं हैं ,
चिट्ठियां हों
इन्द्रधनुषी
रंग भर इतना |
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Labels: गीत/चिट्ठियां लिखना
Thursday, February 10, 2011
सुहाना हो भले मौसम
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Labels: ग़ज़ल/सुहाना हो भले मौसम
Tuesday, February 8, 2011
दो ग़ज़लें : कवि सुरेन्द्र सिंघल
| सुरेन्द्र सिंघल |
| से साभार |
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Labels: ग़ज़ल
Sunday, February 6, 2011
इस मौसम की बात न पूछो

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Labels: गीत/इस मौसम की बात न पूछो













