Saturday, February 26, 2011

साक्षात्कार: हिन्दी गज़ल पर एहतराम इस्लाम से जयकृष्ण राय तुषार की बातचीत

कवि /शायर -एहतराम इस्लाम
सम्पर्क -09839814279

सुप्रसिद्ध कवि /शायर एहतराम इस्लाम से हिन्दी गज़ल पर जयकृष्ण राय तुषार की लम्बी  बातचीत 



प्रश्न -भाई एहतराम इस्लाम जी आप मूलतः ग़ज़लकार हैं ,लेकिन आपके लेखन की शुरुआत कहानी से हुई थी यह कहाँ तक सच है ?

उत्तर -हुआ यों तुषार जी की वर्ष १९६५ की गर्मी की छुट्टियों के दौरान सरिता तथा मुक्ता पत्रिकाओं द्वारा आयोजित ;नये अंकुर कहानी प्रतियोगिता ;का विज्ञापन मेरी नजर से गुजरा |मैं एक कहानी लिखने के क्रम में था मेरे लेखन की शुरुआत हो चुकी थी |मैंने कहानी लिखकर रवाना कर दिया और भूल गया |यह सोचकर की रद्दी की टोकरी में चली गयी होगी |लेकिन छह सात महीने बाद वापसी शीर्षक से लिखी मेरी वह कहानी पुरस्कृत हो गयी |यह सूचना मुझे डाक से मिली और मुझे इससे बल मिला की मैं भी लेखक बन सकता हूँ |

प्रश्न -फिर एहतराम भाई ऐसा क्या हुआ की आप गज़लों और नज्मों की तरफ मुड गये |गज़ल से इतर आपकी पहचान लोगों को चौकाने लगी |

भाई मैं गज़लों और नज्मों की ओर अचानक नहीं मुड आया बल्कि इसके बर अक्स सच्चाई यह है की मैंने अपनी पहली कहानी जरूर अचानक लिख डाली |और फिर उससे दामन बचाता फिरा |वास्तव में कथा लेखन एक श्रमसाध्य काम है ,यह बात न मेरे वश में है न स्वभाव में |इसके विपरीत कविता एक कवि के हृदय से उसी प्रकार फूटती है जिस तरह कोई पौधा चट्टान तोड़कर उग आता है |काव्य रचना और शिशु जन्म में ठीक ही किसी ने साम्य तलाश किया है |गर्भस्थ शिशु जिस तरह धीरे -धीरे विकसित होकर एक परिपक्व शिशु बनता है और जन्म लेता है उसी प्रकार अनुभूतियाँ कवि के हृदय में धीरे -धीरे आकार ग्रहण करती हैं और अन्ततोगत्वा कविता के रूप में जन्म लेती हैं |कहने का आशय यह है की ग़ज़लें नज्में तो मुझसे प्रकृति के दबाव में एक प्रकार से मजबूरीवश हो जाती है |

प्रश्न -एहतराम भाई इलाहबाद गंगा जमुना के संगम और गंगा जमुनी तहजीब दोनों के लिए जाना जाता है और इसी तहजीब के आप प्रतिनिधि रचनाकार हैं |आपकी हिन्दी गज़लों का संग्रह [है तो है ]मील का पत्थर है |आखिर उर्दू में आपकी कोई किताब अभी तक क्यों प्रकाशित नहीं हुई ?

उत्तर -बेशक गंगा और जमुना का संगम और गंगा जमुनी तहजीब दोनों ही इलाहबाद की पहचान हैं ,दोनों ही इलाहबाद की आन बान और  शान हैं |गंगा -जमुनी तहजीब के हवाले से आपने जो मेरी इज्जत आफजाई की है |उसके लिए मैं आपको दिल की गहराइयों से दुआएं और धन्यवाद देता हूँ |निःसंदेह जब कभी मेरा ध्यान इस तथ्य की ओर जाता है की आप जैसे मेरे अनेक हितैषी मुझे गंगा जमुनी तहजीब के प्रतिनिधि के रूप में देखते हैं तो मेरी छाती गर्व से चौड़ी हो जाती है |
मेरे हिन्दी गज़लों के संग्रह को आपने मील का पत्थर कहा यह आपकी सहृदयता और उदारता है तथापि इतना तो मैं भी कह सकता हूँ कि उसे पाठकों का भरपूर प्यार मिला है और सौभाग्य से उसे स्नेहशिक्त करने वालों में भीष्म साहनी ,शिवमंगल सिंह सुमन ,डॉ० जगदीश गुप्त ,अक्षय कुमार जैन सरीखे अनेक लेखक और कवि शामिल हैं |यह भी बताता चलूँ कि है तो है रदीफ वाली बहुचर्चित गज़ल कि जमीन में कई कवियों ने गजलें कहीं और वाहवाही बटोरी लेकिन किसी ने मेरा हवाला देने कि जहमत ही नहीं उठाई |एक कवियत्री ने तो यहाँ तक दिलेरी दिखाई कि उक्त जमीन में गज़ल कहने के साथ ही गज़ल संग्रह भी है तो है नाम से प्रकाशित करवा लिया |अब मैं आपके इस प्रश्न पर आता हूँ कि उर्दू में कोई किताब क्यों नहीं आयी ,इसका उत्तर बड़ा संक्षिप्त और सीधा है नगरी लिपि में है तो है का प्रकाशन इसलिए संभव हो पाया कि उसके लिए यश मालवीय ,सुरेश कुमार शेष हरीश चन्द्र पाण्डे मरहूम नैयर आकिल तथा अन्य मित्रों सहित डॉ० जगदीश गुप्त जी जैसे शिखरस्थ कवि आलोचक ने भरपूर रूचि दिखाई |उर्दू में मेरे पुस्तक के प्रकाशन कि चिंता करने वाला एक भी व्यक्ति आज तक नजर नहीं आया |

प्रश्न -साये में धूप ...के बहुत से अशआर आज भी लोगों कि जुबान पर हैं |हिन्दी गज़ल कि विकास यात्रा में आप दुष्यन्त कुमार का क्या योगदान मानते हैं |हिन्दी गज़ल को आज आप किस मुकाम पर पाते हैं ?

दुष्यंतकुमार के कुछ अशआर निःसंदेह जुबान पर चढ जाने वाले हैं |वो हमेशा ही लोगों कि जुबान पर चढ़े रहेंगे |भाई हिन्दी गज़ल के सन्दर्भ में दुष्यन्त मील के नहीं बल्कि बुनियाद के पत्थर हैं |उनके आगमन के पूर्व हिन्दी गज़ल कि कल्पना ही असंभव थी |ये जो आप हिन्दी में गज़ल का बोलबाला देखते हैं सो यह किसका योगदान है |सूर्यभानु गुप्त से लेकर जयकृष्ण राय तुषार तक लगभग २०० हिन्दी के कवियों को गज़ल का दीवाना बनाने में किसका हाथ है |गज़ल के संदर्भ में दुष्यन्त कुमार का योगदान दर अस्ल हिन्दी कविता पर एहसान के रूप में देखना चाहिए |आज हिन्दी कविता के पास भी गज़ल जैसी सशक्त विधा मौजूद है ,तो इसका सेहरा भी दुष्यन्त के सर ही है |हिन्दी गज़ल वर्तमान परिदृश्य में अपने सही मुकाम पर है |वह हिन्दी कविता कि अन्य विधाओं से आँख मिलाकर बात करती नजर आती है 

प्रश्न -मीर ग़ालिब से लेकर वर्तमान उर्दू कवियों तक गज़लगोई   कि एक समृद्ध परम्परा रही है जो उर्दू पाठकों के साथ हिन्दी पाठकों की भी प्यास बुझाती  आयी है |फिर दुष्यन्त को हिन्दी में  गज़ल कहने की क्या जरूरत पड़ गयी?

उत्तर -पहली बात तो यह है कि कोई भी मौलिक रचनाकार किसी जरूरत के तहत रचना क्रम कम ही करता है |दुष्यन्त ने भी ग़ज़लें इसीलिए कही कि वो गज़ल कहने के लिए मजबूर थे |ध्यान देने कि बात है कि उन्होंने हिन्दी गज़ल जैसी किसी विधा का अविष्कार करने का दावा कभी नहीं किया |दुष्यन्त कुमार कि गज़लों कि शब्दावली बहर और वज्न पर गौर करें तो यह हकीकत सामने आती है कि ये ग़ज़लें उर्दू गज़लगोई   कि शानदार परम्परा कि विस्तार मात्र हैं |दुष्यन्त कि गज़लें दरअसल हिन्दी कविता प्रेमियों के लिए विशेष रूप सेकही गयी उर्दू ग़ज़लें ही हैं और इसीलिए वो गज़ल विधा को हिन्दी काव्य में स्वीकृत करवाने का हेतु बन गयीं |

प्रश्न -एहतराम भाई आपकी एक गज़ल के अशआर हैं 
हाथ में मेहँदी रचाती  है न काजल आँख में 
मांग में अफशां नहीं अब धूल भरती है गज़ल 
जामो पैमाना लिए फिरती रही होगी कभी 
अब तो हाथों में लिए दर्पण गुजरती है गज़ल ......क्या उर्दू गज़ल में रुमानियत कि बातें ज्यादा हो रही थीं और हिन्दी में लोगों का दुःख दर्द गज़ल का विषय बना |क्या कंटेंट से गज़ल अलग होती है ?

उत्तर -सवाल आपने अशआर के माध्यम से उठाया है तो जबाब भी अशआर के माध्यम से सुन लीजिए |
मुहं को हथेलियों में छिपाने कि बात है 
हमने किसी अंगार को होठों से छू लिया या चांदनी छत पे चल रही होगी /अब अकेले टहल रही होगी या वो घर में मेज़ पे कोहनी टिकाये बैठी है /थमी हुई है वहीं उम्र आजकल लोगों या तमाम रात तेरे मयकदे में मय पी है /तमाम रात नशे में निकल न जाए कहीं या हुजूर आरिजो रुखसार क्या तमाम बदन /मेरी सुनो तो मुजस्सिम गुलाब हो जाए |या फिर एक जंगल है तेरी आँखों में ........क्या इन अशआर में लोगों का दुःख दर्द विषय बना है |क्या इन अशआर में आप द्वारा इंगित रुमानियत से भिन्न कोई चीज है |और मुझे यह बताने कि जरूरत नहीं के ये शेर दुष्यन्त के हैं और साये में धूप जैसे लोकप्रिय गज़ल संग्रह में हैं |और यह गज़ल संग्रह हिन्दी गज़ल कि इमारत कि बुनियाद का पत्थर है |आशय यह कि महज कंटेंट के आधार पर हिन्दी और उर्दू कि गज़लों में फर्क नहीं किया जा सकता है |आज उर्दू गज़लों में भी वही कंटेंट है जो हिन्दी गज़लों में है |और यह हालात के दबाव में हो रहा है |एक बात कहूँ  गज़ल को सिर्फ गज़ल कहने में किसी को क्या आपत्ति है |

प्रश्न -गज़ल कि सर्वोत्तम परिभाषा आपकी नजर में क्या हो सकती है ?बेहतरीन गज़ल में क्या खूबी होनी चाहिए?

उत्तर -बड़ा कठिन प्रश्न कर दिया आपने मेरे जैसे एक साधारण गज़लकार से |फिर भी अपने तौर पर मैं गज़ल को यों परिभाषित कर सकता हूँ |'चुनी हुई बहर में दो समान वज्न के मिसरों को पूर्ण स्वतंत्र कविताओं का संकलन गज़ल कहलाता है यदि उन कविताओं में से प्रत्येक का दूसरा मिसरा रदीफ युक्त या रदीफ मुक्त उचित काफिये के साथ पूर्ण होता हो '|एक अच्छी गज़ल दिल में चुभ जाने वाली अशआर की वाहक होती है 

प्रश्न -एहतराम भाई हिन्दी और उर्दू गज़ल में कहन के स्तर पर व्याकरण के स्तर पर क्या फर्क है ?क्या अब गज़ल सिर्फ गज़ल रह गयी है |अब न वह हिन्दी गज़ल है न उर्दू गज़ल ,बस लिपि का फर्क रह गया है |

उत्तर -कहन यदि कथन और बचन है जैसा कि शब्द कोश बताता है तो हिन्दी और उर्दू गज़ल में कहन और व्याकरण दोनों ही स्तरों पर कोई फर्क नहीं है |हाँ अब गज़ल सिर्फ गज़ल हो गयी है |हिन्दी और उर्दू गज़ल में भेद लिपि भी पैदा नहीं कर पाती |अब राजेश रेड्डी और मुनव्वर राना कि ग़ज़लें दोनों ही लिपियों में पढ़ने को मिलती हैं |उनकी गज़ल हिन्दी गज़ल है या उर्दू बता पाएंगे आप |यों सोचिये कि उनकी गज़लों को मंच से प्रस्तुत किया जा रहा हो तो वहाँ कहाँ से लायेंगे लिपि आप |कहन के हवाले से एक बात स्पस्ट करता कहन से आपका आशय यदि लहजे से है तो लहजा तो हर शायर का जुदा जुदा होता है |होना भी चाहिए मीर का जो लहजा है वो ग़ालिब का नहीं है |ग़ालिब का जो लहजा है वह जिगर का नहीं है जिगर का जो लहजा है फ़िराक का नहीं है |सच तो यह है कि हर बड़ा शायर अपने लहजे से पहचाना जाता है |या उसका लहजा ही उसे बड़ा बनाता है |दुष्यन्त कि नकल में उनका लहजा अपनाते हुए दर्जनों हिन्दी कवियों ने गज़ल संग्रहों का अम्बार लगा दिया |लेकिन उनमे से क्या कोई भी दुष्यन्त कि बराबरी में ठहर सका |

प्रश्न -क्या तरन्नुम में पढ़ने वालों कि तुलना में तहद में पढ़ने वालों के शेर ज्यादा वजनदार होते हैं ?

उत्तर -ऐसा कोई नियम नहीं है |हाँ अच्छा शेर कहने वाला तरन्नुम कि आवश्यकता क्यों महसूस करेगा |

प्रश्न -वर्तमान में आप इलाहाबाद में प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष हैं जिसकी स्थापना सज्जाद जहीर और मुंशी प्रेमचंद जैसे नामचीन लोगों ने कि थी |तब और अब में इलाहाबाद के साहित्यिक परिदृश्य में क्या फर्क आया है ?

उत्तर -तब प्रगतिशील आंदोलन अपने शिखर पर था उस समय प्रगतिशील लेखक संघ में शामिल लेखक समाज में बदलाव लाने के लिए तन मन धन से समर्पित नजर आता था |आज मेरे जैसा कलमकार इसमें इसलिए शामिल होता है कि उसकी पहचान पुष्ट हो सके |

प्रश्न -आप लम्बे समय तक महालेखाकार कार्यालय इलाहाबाद कि कर्मचारी यूनियन में साहित्य मंत्री भी रहे हैं |तब की  यूनियन और आज की यूनियन में क्या फर्क है |

उत्तर -गिरावट हर क्षेत्र में आयी है यह एक सर्वमान्य सत्य है और ट्रेड यूनियन भी इसका अपवाद नहीं है |इतना जरूर जोड़ना चाहूँगा की जब मैं इस क्षेत्र में सक्रिय हुआ था तब मेरा संगठन ए ० जी० यू० पी० ब्रदरहुड प्रदेश ही नहीं वरन पूरे देश में जुझारू संगठन के रूप में विख्यात था |

[ एहतराम इस्लाम का परिचय इसी ब्लॉग में उपलब्ध है ]

Thursday, February 24, 2011

ग़ज़ल: तितलियाँ अच्छी लगीं

चित्र गूगल से साभार 
एक गज़ल -तितलियाँ अच्छी लगीं 
फूल, जंगल, झील, पर्वत घाटियाँ अच्छी लगीं 
दूर तक बच्चों को उड़ती तितलियाँ अच्छी लगीं |

जागती आँखों ने देखा इक मरुस्थल दूर तक 
स्वप्न में जल में उछ्लतीं मछलियाँ अच्छी लगीं |

मूंगे -माणिक से बदलते हैं कहाँ किस्मत के खेल 
हाँ मगर उनको पहनकर उँगलियाँ अच्छी लगीं |

देखकर मौसम का रुख तोतों के उड़ते झुंड को 
पके गेहूं की सुनहरी बालियाँ अच्छी लगीं |

दूर थे तो सबने मन के बीच सूनापन भरा 
तुम निकट आये तो बादल बिजलियाँ अच्छी लगीं |

उसके मिसरे पर मिली जब दाद तो मैं जल उठा 
अपनी ग़ज़लों पर हमेशा तालियाँ अच्छी लगीं |

जब जरूरत हो बदल जाते हैं शुभ के भी नियम 
घर में जब चूहे बढे तो बिल्लियाँ अच्छी लगीं |


चित्र -गूगल से साभार 

[मेरी यह ग़ज़ल आजकल फरवरी 2007 में प्रकाशित है ]

Wednesday, February 23, 2011

दो कविताएं: कवयित्री डॉ० अलका प्रकाश

डॉ० अलका प्रकाश हिन्दी की एक युवा लेखिका और कवयित्री हैं |15 जुलाई 1977 को उत्तर प्रदेश के जनपद  म ऊ की घोसी तहसील में इस कवयित्री का जन्म हुआ | इलाहबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल करने के बाद इन्होंने डॉ० शैल पाण्डेय जी के निर्देशन में डी० फिल की उपाधि प्राप्त की | नारी चेतना के आयाम स्त्री-विमर्श पर इनकी महत्वपूर्ण पुस्तक है जिसे लोकभारती ने प्रकाशित किया है | तन्द्रा टूटने तक प्रकाशनाधीन है | अलका प्रकाश बड़ी संजीदगी से लेखन कर रही हैं | विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में इनकी कवितायेँ /लेख प्रकाशित होते रहते हैं | स्वभाव से विनम्र और मृदुभाषी इस कवयित्री की दो कविताएं हम आप तक पहुंचा रहे हैं:-

कवयित्री
डॉ० अलका प्रकाश 

१. आज किसी वजह से
आज किसी वजह से 
बहुत दुखी हो 
उदास है तुम्हारा मन 
उसने ऐसा क्यों किया 
कल किसी और वजह से 
दुखी होगी 

सोचो 
दुःख ओढ़े रहना कहीं 
तुम्हारा स्वाभाव तो नहीं 
कारण हमेशा रहेंगे 
खुशी तुम्हारे आस-पास ही है 
उसे ढूंढो पहचानो 

अब तुम कहोगी 
मैं ऐसी कहाँ हूँ 
यह दुःख तो प्राकृतिक है 
कैसे खुश रहूँ 
यही मेरी नियति है 
वगैरह-वगैरह 

देखो प्रश्नों की श्रृंखला का 
कोई अंत नहीं 
तुम ढूंड ही लोगी
कोई कारण 
हर उदास पल का 
एक बहाना जरा जीने का ढूढों |

२. लोकल बस में 

लोकल बस में 
सफर करते 
अक्सर उसकी देह 
मर्दों से रगड़ जाती है 

कभी घूरती निगाहों से
बचने के लिए 
दुपट्टा सर से बांध लेती है 
कभी उसके सहयोगी कहते हैं 
चलिए घर तक छोड़ दें 
वह मना कर देती है

उसने सुने हैं 
उनके कहकहे 
यार सीट गरम हो गयी 
ऐसी वैसी 
बहुत सी बातों को 
प्रायः वह अनसुना कर देती है 
सुबह की आपा-धापी में
जब सारे काम निपटा कर 
वह दफ्तर पहुंचती है 
खिस्स से एक स्वर उभरता है 
ऑफिस में गर्मी आ गयी यार
अब काफी की
कोई जरूरत नहीं है 
भोला जाओ
कोल्ड ड्रिंक लाओ 
वह आखिर
दुखी क्यों हो जाती है 
मध्यम वर्गीय मानसिकता की मारी 
जबकि उसे पता है 
इसी हॉट शब्द के चक्कर में 
सुंदरियां विज्ञापन के लिए 
अनवरत 
अपने वक्षों और नितंबों की 
शल्य क्रियाएँ करा रहीं हैं 
घर पर कुछ बोले तो 
कहा जाता है कि 
किसने कहा था 
घर से बाहर निकलने के लिए 
घर पर पड़ी रहो 
किन्तु क्या वहाँ खतरे कम हैं 
अगर रोकर दुख बाहर करे तो 
तो मौके कि तलाश में 
रहते हैं 
इंसान के भेष में भेडिये 
फिर उसके कानों में 
गूंजते हैं रहीम के दोहे ..
.रहिमन निज मन कि व्यथा ......
कहीं से एक और आवाज उठती है 
साइलेंस इज वोयलेंस 
इसी उधेड़ बुन में 
उसका सर चकरा जाता है
बॉस के चेम्बर में कैसे जाए 
जो कुर्सी पर टांग फैलाये
अश्लील फिल्मे देखकर 
ढू ढ ता है अपना शिकार 
कहाँ फरियाद करे 
नौकरी जाने का डर 

नारीवाद तो सिखा रहा है 
देह को मुक्त करो
उसका प्रश्न है किसके लिए 
इन ड्रेकुलाओं के लिए 
कोई दार्शनिक की 
भंगिमा में कह रहा है 
देखो 
औरत की देह हथियार है 
इस बाजारवाद के दौर में 
तुम्हारे पास देह है 
तो 
तुम कुछ भी 
खरीद सकती हो 
वह उत्तर देती है 
मेरी देह में एक आत्मा भी है  

चित्र -गूगल से साभार 

Thursday, February 10, 2011

सुहाना हो भले मौसम



 सुहाना हो भले मौसम मगर अच्छा नहीं लगता 
सफर में तुम नहीं हो तो सफर अच्छा नहीं लगता 

फिजां में रंग होली के हों या मंजर दिवाली के 
मगर जब तुम नहीं होते ये घर अच्छा नहीं लगता 

जहां बचपन की यादें हों कभी माँ से बिछुड़ने की 
भले ही खूबसूरत हो शहर अच्छा नहीं लगता 

परिंदे जिसकी शाखों पर कभी नग्मे नहीं गाते 
हरापन चाहे जितना हो शजर अच्छा नहीं लगता 

तुम्हारे हुस्न का ये रंग सादा खूबसूरत है 
हिना के रंग पर कोई कलर अच्छा नहीं लगता 

तुम्हारे हर हुनर के हो गए हम इस तरह कायल 
हमें अपना भी अब कोई हुनर अच्छा नहीं लगता 

निगाहें मुन्तजिर मेरी सभी रस्तों की हैं लेकिन 
जिधर से तुम नहीं आते उधर अच्छा नहीं लगता                                                                             

(चित्र गूगल से साभार )

Tuesday, February 8, 2011

दो ग़ज़लें : कवि सुरेन्द्र सिंघल

कवि -सुरेन्द्र सिंघल 
परिचय -
सुरेन्द्र सिंघल हिंदी गज़ल में एक जाना पहचाना नाम है | २५ मई १९४८ को बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश में जन्मे इस कवि की गजले देश की विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित होतीं रही हैं | डी .एच .लारेंस की कविताओं पर समीक्षा पुस्तक Where the Demon Speaks प्रकाशित हो चुकी है | सुरेन्द्र सिघल की इंग्लिश में लिखी कविताएँ अंग्रेजी की पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं हैं | जे .वी .जैन पी .जी .कालेज के अंग्रेजी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत सुरेन्द्र सिंघल रामधारी सिंह दिनकर सम्मान सहित कई सम्मानों से सम्मानित हो चुके |हिंदी गज़ल में सुरेन्द्र सिघल का अंदाज बिलकुल निराला है | सवाल ये है  गज़ल पर इनकी चर्चित पुस्तक है जो मेधा बुक्स, दिल्ली से प्रकाशित है : सुरेन्द्र सिंघल जी की दो ग़ज़लें आज हम आपके साथ साझा कर रहे हैं .......

से साभार

(१)

वो केवल हुक्म देता है सिपहसालार जो ठहरा
मैं उसकी जंग लड़ता हूँ ,मैं बस हथियार जो ठहरा |

दिखावे की ये हमदर्दी ,तसल्ली खोखले वादे
मुझे सब झेलने  पड़ते हैं ,मैं बेकार जो ठहरा |

घुटन लगती न जो कमरे में एक दो खिड़कियाँ होतीं
मैं केवल सोच सकता हूँ किरायेदार जो ठहरा |

तू भागमभाग में इस दौर की शामिल हुई ही क्यों ?
मैं कैसे साथ दूँ तेरा मैं कम रफ़्तार जो ठहरा |

मोहबत्त दोस्ती ,चाहत वफ़ा ,दिल और कविता से
मेरे इस दौर को परहेज है बीमार जो ठहरा |

उसे हर शख्स को अपना बनाना खूब आता है
मगर वो खुद किसी का भी नहीं, हुशियार जो ठहरा |
                     

(२)

जिक्र मत छेड़ तू यहाँ दिल का
कर न बर्बाद वक्त महफ़िल का |

उससे मिलने का वक्त आया है
गूंज जाये न सायरन मिल का |

रेस्तरां में हूँ उसके साथ मगर
खौफ मुझको है चाय के बिल का |

मैं ये समझूंगा जीत है मेरी
हाथ कापें तो मेरे कातिल का |

पांव मेरे हैं रास्ते उनके
खूब है ये सफर भी मंजिल का |