Sunday, August 5, 2018

एक प्रेमगीत-आखेटक चुप्पियाँ तोड़कर


एक प्रेमगीत-आखेटक चुप्पियाँ तोड़कर

आज हँसेंगे
सारा दिन हम
आखेटक चुप्पियाँ तोड़कर ।

इस नीरस
पठार की आंखों में
सपने आगत वसंत के,
कुछ तुम
कुछ हम गीत पढ़ेंगे
नीरज,बच्चन और पन्त के,
बिना पुरोहित
कथा सुनेंगे
आज बैठना गाँठ जोड़कर ।

प्यासी हिरणी
प्यासा जंगल
यहां नहीं चम्पई पवन है,
बंजारों की 
बस्ती में कुछ
अब भी बाकी प्रेम अगन है,
आओ सबकी
प्यास बुझा दें
इस हिमनद की धार मोड़कर।


Friday, August 3, 2018

दो गीत-कच्चे घर में हम और अज़नबी की तरह






कच्चे घर में हम


बादल 
फटते रहे नशे में
कच्चे घर में हम ।
इन्दर राजा 
इन्द्रलोक में 
पीते होंगे रम।

कर्जदार
सूरज पच्छिम में
बड़े ताल में डूबा,
सूदखोर के
नए लठैतों का
पढ़कर मंसूबा,
बस्ती में
बस कानाफूसी
नहीं किसी को ग़म।

जूते लिए
हाथ में कीचड़-
पानी में उतरे,
खड़ी फसल को
आवारा पशु 
चूहे सब कुतरे,
जितना
बोये बीज खेत में
पाए उससे कम।

दो-अज़नबी की तरह 

अज़नबी की
तरह घर के लोग
ये कैसा चलन है।
हम कहाँ पर
खड़े हैं ऐ
सभ्यता तुझको नमन है।

कहकहे
दालान के चुप
मौन हँसता, मौन गाता,
सभी हैं माँ-पिता
ताऊ,बहन,
भाभी और भ्राता,
महल है
वातानुकूलित
मगर रिश्तों में गलन है।

कई दरवाजे
खुले कुछ बन्द
कुछ ताले लगे हैं,
खिड़कियों पर
धूल ,रोशनदान
पर जाले लगे हैं,
हैं नहीं
सम्वाद घर मे
ट्विटर पर
सबका मिलन है।

अब रसोईघर 
नहीं उपले नहीं 
खपरैल कच्चे,
लॉन में
हिलते हवा से
फूल,भौरें नहीं बच्चे,
वक्त कितना
बेरहम है
या कहें कुछ बदचलन है।
चित्र -साभार गूगल

Tuesday, May 29, 2018

एक गीत -कास -वन जलता रहा


चित्र -साभार गूगल 

एक गीत -कास -वन जलता रहा 

भोर में 
उगता रहा और 
साँझ को ढ़लता रहा |
सूर्य का 
रथ देखने में 
कास -वन जलता रहा |

नदी विस्फारित 
नयन से 
हांफता सा जल निहारे ,
गोपियाँ 
पाषाणवत हैं  
अब किसे वंशी पुकारे ,
प्रेम से जादा 
विरह दे 
कृष्ण भी छलता रहा |

चांदनी के 
दौर में मैं 
धूप पर लिखता रहा ,
दरपनों  में 
एक पागल 
आदमी दिखता रहा ,
सारथी का 
रथ वही ,
पहिया वही, चलता रहा |
चित्र -गूगल से साभार 

Monday, May 7, 2018

आस्था का गीत -राम का पावन चरित





एक आस्था का गीत -राम का पावन चरित 

राम का 
पावन चरित 
इस देश का अभिमान है |

वेदपाठी 
दास  तुलसी 
राम को पहचानते हैं ,
शैव -वैष्णव 
नाथ इनको
जानते हैं मानते हैं ,
राम की 
उपमेय ,उपमा 
और नहीं उपमान है |

एक योगी ने 
जलाए दीप 
अगणित नभ प्रकाशित ,
धार सरयू 
की मलिन ,
होने लगी फिर से सुवासित ,
राम का 
कुल गोत्र इस 
ब्रह्माण्ड का दिनमान है |



Saturday, May 5, 2018

एक प्रेम गीत -कुछ फूलों के कुछ मौसम के

चित्र -गूगल से साभार 




एक पेमगीत -कुछ फूलों के  कुछ मौसम के 
कुछ फूलों के 
कुछ मौसम के 
रंग नहीं अनगिन |
तुम्हे देखकर 
बदला करतीं 
उपमाएं पल -छिन |

एक सुवासित 
गन्ध हवा में 
छूकर तुमको  आती ,
राग बदलकर 
रंग बदलकर 
प्रकृति सहचरी गाती ,
तुम हो तो 
मन्दिर की सुबहें 
संध्याएँ ,शुभ दिन |

स्वप्न कथाओं में 
हम कितने 
खजुराहो गढ़ते ,
अनपढ़ ही 
रह गए तुम्हारे 
शब्द भाव पढ़ते ,
तुम तो धवल 
कंवल सी जल में 
हम होते पुरइन |

लहरों पर 
जलते दीपों की 
लौ तेरी ऑंखें ,
तुम्हें देख 
शरमाती 
फूलों की कोमल शाखें ,
तुम्हें उर्वशी ,
रम्भा  लिख दूँ 
या लिख दूँ आसिन |
चित्र -साभार गूगल 

Monday, April 30, 2018

एक गीत -फूलों की आँखों में जल है

चित्र -साभार गू

इस बदले 
मौसम से जादा 
फूलों की आँखों में जल है |
हदें पार 
कर गयी सियासत 
राजनीति में छल ही छल है |

अहि जा लिपटे 
वन मयूर से 
घोरी से मिल गए अघोरी ,
नैतिकता 
ईमान खूटियों पर 
संध्याएँ गाती लोरी ,
गंगा में 
टेनरियों का जल 
पूजाघर में गंगा जल है |

जंगल के 
सीने पर आरी 
क्या होगा इस नंदन वन का ,
दूषित समिधा 
हवनकुंड में 
उँगलियों में नकली मनका .
ग्रह गोचर शुभ 
विजय भाव है 
फिर माथे पर कैसे बल है |

Sunday, April 29, 2018

एक गीत -सूर्य तो उगता रहा हर दिन




चित्र -गूगल से साभार 


एक गीत -सूर्य तो उगता रहा हर दिन 

सूर्य तो 
उगता रहा हर दिन |
मगर कुछ 
वन फूल 
अब भी हैं अँधेरे में |

साँझ ढलते 
रक्त में डूबा 
नदी का जल ,
शोर -चीखों 
का कभी 
निकला न कोई हल ,
कहीं कुछ 
तो चूक है 
उजले सवेरे में |

अन्नदाता 
आपदा की 
जंग में हारे ,
प्यास से 
व्याकुल रहे 
कुछ भूख के मारे ,
इन्द्र प्रमुदित 
बिना जल के 
मेघ घेरे में |

ढूंढ़ता है 
रोज आदमखोर 
मृगनयनी ,
नर्मदा की 
चीख कब 
सुनती है उज्जयिनी ,
डबडबायी 
आंख 
जंगल के बसेरे में |
चित्र -गूगल से साभार