Saturday, 18 January 2020

एक गीत-बँधी हुई पोथी सा मैं

चित्र-साभार गूगल

एक गीत-बँधी हुई पोथी सा में

बँधी हुई
पोथी सा मैं,
तुमने खोल दिया ।
नारंगी
होठों से
वेद मन्त्र बोल दिया ।

मौसम
प्रतिकूल और
नाव,नदी, धारा है,
मद्धम
अँगीठी की
आँच में ओसारा है,
बन्दीगृह,
रातों को
किसने पेरोल दिया ।

मौसम का
हर गुनाह
फूलों ने माफ़ किया,
धूल जमी
वंशी को
फिर किसने साफ किया,
गहरे
सन्नाटे में
पंचम सुर घोल दिया ।

Wednesday, 8 January 2020

एक देशगीत-दुनिया भर में सबसे अच्छा अपना हिंदुस्तान


एक देशगान-
दुनियाभर में सबसे अच्छा अपना हिंदुस्तान

नेताओं,अख़बार नवीसों,
सुधरो फिल्मिस्तान ।
दुनिया भर में सबसे अच्छा
अपना हिन्दुस्तान ।

मातृभूमि को गाली देते
मन में भरी हताशा,
सत्ता के ख़ातिर आये दिन
होता एक तमाशा,
आज़ादी के माने समझो
जाकर पाकिस्तान ।

शिक्षालय कुछ भ्रष्ट हो गए
कैसे हैं आचार्य,
दुर्योधन के साथ खड़े हैं
अब भी द्रोणाचार्य,
सेनाओं की निन्दा करते
भेदी को सम्मान ।

एक आँख से अनुच्छेद
ये संविधान का पढ़ते,
षडयन्त्रों की नई कहानी
देश विरोधी गढ़ते,
भारत माँ अब खोल
तीसरा नेत्र इन्हें पहचान।

बन्ध्या रहना ,जन्म न देना
कोख़ से अब गद्दारों को,
भारत माता खत्म करो
अब देश विरोधी नारों को,
इसे हिमालय कभी न
बनने देना नखलिस्तान।

जन्म नहीं लेते क्यों फिर से
वीर शिवाजी ,राना?
छत्रसाल,वन्दा वैरागी,
लक्ष्मीबाई, नाना,
गुरुगोविंद,कब पैदा होंगे
पृथ्वीराज महान ?

Saturday, 4 January 2020

डॉ ० सदानन्दप्रसाद गुप्त कार्यकारी अध्यक्ष उ ० प्र ० हिंदी संस्थान -व्यक्तित्व एवं कृतित्व

डॉ ० सदानन्दप्रसाद गुप्त कार्यकारी अध्यक्ष उ०प्र०हिन्दी संस्थान ,लखनऊ 

सबसे दायें माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ
सबसे बाएं श्री शिशिर सिंह निदेशक हिंदी संस्थान
 सबसे मध्य में डॉ ० सदानन्दप्रसाद गुप्त जी 

साहित्य मनीषी डॉ ० सदानन्दप्रसाद गुप्त 

बिहार से अलग हुआ राज्य झारखण्ड केवल बेशकीमती खनिजों की खान नहीं है अपितु यह देश की मेधा और साहित्यिक मनीषियों और बुद्धिजीवियों की भी खान है |उसी पवित्र मिटटी में जन्म लेकर उत्तर प्रदेश को अपना कर्मक्षेत्र बनाया आदरणीय डॉ ० सदानन्दप्रसाद गुप्त जी ने |कर्मण्येवाधिकारस्ते माँ फलेषु कदाचन में विश्वास रखने वाले साहित्य मनीषी डॉ ०  गुप्तजी को माननीय मुख्यमन्त्री उत्तर प्रदेश ने 15 सितम्बर 2017 को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान  के कार्यकारी अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया | सन्त साहित्य के मर्मग्य ,स्वभाव से मृदुभाषी डॉ ० सदानन्द जी ने हिंदी संस्थान को स्तरीय कार्यकमों से जोड़ा ही नहीं अपितु साहित्य भूषण पुरष्कारों की संख्या 10 से 20 कर दिया | पुरस्कार में शामिल विधाओं की कुल संख्या 34 से 38 कर दी गयी | संस्थान में तमाम उच्च स्तरीय साहित्यिक सेमिनार आयोजित हुए और गम्भीर प्रकाशन हुए |वैदिक वांग्मय का परिशीलन ,भारतीय संस्कृति की अविराम यात्रा और भोजपुरी के संस्कार गीत | स्मृति संरक्षण योजना के अंतर्गत नवगीत कवि देवेन्द्र कुमार बंगाली पर पुस्तक प्रकशित |

माननीय प्रधानमन्त्री भारत सरकार श्री नरेंद्र मोदी जी
 के साथ  डॉ ० सदानन्दप्रसाद गुप्त जी  
पुरस्कार /सम्मान -
पुरस्कारों और सम्मानों की राजनीति से दूर इस साहित्य मनीषी को मात्र दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी का सम्मान /पुरस्कार  मिला है |

साहित्यिक विदेश यात्रा - वर्ष 2018में पोर्ट लुई मारीशस में हुए विश्व हिंदी सम्मेलन में शामिल हुए 



डॉ ० सदानन्दप्रसाद गुप्त जी का जन्म गिरिडीह [ झारखण्ड ] के मकडीहा ग्राम में 19 फरवरी 1952 को हुआ था | शिक्षा एम० ए० हिंदी और पी ० एच ० डी ० | गोरखपुर विश्व विद्यालय में अध्यापन करते हुए 30 जून  2013 को डॉ ० सदानन्दप्रसाद गुप्त जी हिंदी विभाग से सेवानिवृत्त हुए | विभाग में रहते हुए लगभग २८ शोधार्थियों को पि० एच ० डी ० की उपाधि प्रदान किये |लगभग 60-65 शोध पत्र प्रकाशित हुए | डॉ ० सदानन्द प्रसाद जी की हिंदी सेवा अतुलनीय है |राष्ट्र प्रेम और राष्ट्रीय विचारधारा इनके आचरण और रक्त में प्रवाहित होती है | मैं ईश्वर से डॉ ० सदानन्द प्रसाद जी के  उत्तम स्वास्थ्य के साथ यश -कीर्ति की मंगलकामनाएं करता हूँ | हिंदी संस्थान में और राष्ट्र भाषा हिंदी के लिए कुछ और बड़ा स्मरणीय कार्य आपके द्वारा सम्पन्न हो |

प्रमुख कृतियाँ / सम्पादन 

हिन्दी साहित्य :विविध परिदृश्य [2001]
राष्ट्रीय अस्मिता और हिंदी साहित्य [2008]
संस्कृति का कल्पतरु :कल्याण [सम्पादन 2004 ]
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल [सम्पादन 2005 ]
निर्मल वर्मा का रचना संसार [सम्पादन 2007 ]
सुमित्रानंदन पन्त [सम्पादन 2007 ]
अज्ञेय :सृजन के आयाम [सम्पादन 2012 ]
राष्ट्रीयता के अनन्य साधक :महंत अवैद्यनाथ [सम्पादन 2012 ]
संस्कृति -सम्वाद [सम्पादन 2015 ]
राष्ट्रसंत महंत अवैद्यनाथ [सम्पादन 2016 ]
समन्वय [अनियतकालीन ]पत्रिका का सम्पादन 2000 -2012 ]
वैचारिक स्वराज और हिंदी साहित्य [2017 ]
हिंदी साहित्य :विविध आयाम 

सम्पर्क -ईमेल 
guptasadanand52@gmail.com


डॉ ० सदानन्द प्रसाद गुप्त जी की पारिवारिक तस्वीर 



डॉ ० सदानन्दप्रसाद गुप्त जी की पारिवारिक तस्वीर 

Sunday, 29 December 2019

एक गीत - नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ -


चित्र -साभार गूगल 


एक गीत नववर्ष -बाग़ को चन्दन करे 

धुन्ध को 
फिर से पराजित 
सूर्य का स्यन्दन करे |
अब अयोध्या 
और सरयू 
राम का वन्दन करे |

वर्ष नूतन 
आ रहा तो 
आचरण भी नव्य हो ,
देश के 
उत्थान का 
वातावरण भी भव्य हो ,
बेटियों को 
हर पिता दे 
मान -अभिनन्दन करे |

संस्कारित हो 
नई पीढ़ी 
सुशासन में पले ,
राह में सबकी 
अकम्पित 
ज्योति दीपक की जले ,
एक वासंती 
परी हर 
बाग़ को चन्दन करे |

बाँसुरी के 
होंठ 
वन्देमातरम का गीत हो ,
राष्ट्र का 
वैभव बढ़े दुश्मन ,
हमारा  मीत हो ,
हर असैनिक 
और सैनिक 
राष्ट्र का वन्दन करे |

माघ -मेला 
और संगम 
संत -जन का आगमन हो ,
विश्व मंगल 
यज्ञ -आहुति 
और सबका पुण्य -मन हो ,
शुभ्र गंगा 
की लहर में 
विहग स्पन्दन करे |

चित्र -साभार गूगल 

Tuesday, 24 December 2019

एक गीत -राष्ट्रधर्म से बड़ा नहीं कुछ



चित्र -साभार गूगल 

एक गीत -राष्ट्रधर्म से बड़ा नहीं कुछ 

राष्ट्रधर्म से 
बड़ा नहीं कुछ 
मत बेचो ईमान को |

जाति -धर्म से 
उपर उठकर 
बदलो हिन्दुस्तान को |

गंगा की 
अमृत धारा में 
विष का अर्क न घोलो ,
सिंह गर्जना 
करके भारत-
माता  की जय बोलो ,

तोड़ न 
पाये सारी दुनिया 
भारत के अभिमान को |

दुश्मन के 
नापाक इरादे 
खतरनाक हैं संभलो ,
जयचंदों 
के षड्यन्त्रों को 
"पृथ्वी " बनकर कुचलो ,

कभी न पहुंचे 
ठेस तिरंगे -
जन गण के सम्मान को |
चित्र -साभार गूगल 



Sunday, 22 December 2019

एक गीत -राम- कृष्ण -गंगा की धरती भारत ! इसे प्रणाम करो




एक गीत -राम -कृष्ण -गंगा की धरती भारत !
इसे प्रणाम करो 

राम-कृष्ण 
गंगा की धरती भारत !
इसे प्रणाम करो |
जिस मिटटी में 
जन्म लिए 
यह जीवन उसके नाम करो |

हमें प्रज्ज्वलित 
करना है फिर 
बुझती हुई मशालों को ,
दन्तहीन 
करना होगा 
अब सारे विषधर व्यालों को ,
इसे द्वारिका पुरी 
बना दो 
या सरयू का धाम करो |

खतरे में है 
देश हमारा 
पढ़े -लिखे गद्दारों से ,
षड्यन्त्रों की 
बू आती है 
मजहब की दीवारों से ,
देश विरोधी 
गतिविधियों से 
इसको मत बदनाम करो |

भारत सबका 
आश्रयदाता 
सबसे साथ निभाता है ,
एक साथ सूफ़ी 
गुरुवाणी 
कीर्तन मौसम गाता है ,
संविधान का 
आदर करना 
सीखो मत संग्राम करो |

सभी चित्र -साभार गूगल 

Saturday, 7 December 2019

एक गीत -स्वर्णमृग की लालसा


चित्र -साभार गूगल 

एक गीत -स्वर्णमृग की लालसा 

स्वर्ण मृग की 
लालसा 
मत पालना हे राम !
दोष 
मढ़ना अब नहीं 
यह जानकी के नाम |

आज भी 
मारीच ,रावण 
घूमते वन -वन ,
पंचवटियों 
में लगाये 
माथ पर चन्दन ,
सभ्यता 
को नष्ट करना 
रहा इनका काम |

लक्ष्मण रेखा 
विफल 
सौमित्र मत जाना ,
शत्रु का 
तो काम है 
हर तरफ़ उलझाना ,
चूक मत करना 
सुबह हो ,
दिवस हो या शाम |

Friday, 6 December 2019

एक गीत -कैक्टस का युग



चित्र -साभार -गूगल 

एक गीत - कैक्टस का युग 

कैक्टस का
युग कहाँ 
अब बात शतदल की ?
हो गयी 
कैसे विषैली 
हवा जंगल की |

फेफड़ों में
दर्द भरकर 
डूबता सूरज ,
हो गया 
वातावरण का 
रंग कुछ असहज ,
अब नहीं 
लगती सुरीली 
थाप मादल की |

भैंस के 
आगे बजाते 
सभी अपनी बीन ,
आज के 
चाणक्य ,न्यूटन 
और आइन्स्टीन ,
कोयले की 
साख बढ़ती 
घटी काजल की |

रुग्ण सारी 
टहनियों के 
पात मुरझाये ,
इस तुषारापात में
चिड़िया 
कहाँ गाये ,
मत बनो 
चातक बुझाओ 
प्यास बादल की |

भोर का 
कलरव 
लपेटे धुन्ध सोता है ,
एक लोकल 
ट्रेन जैसा 
दिवस होता है ,
किसे 
चिन्ता है 
हमारे कुशल -मंगल की |

सभी चित्र साभार गूगल 

Thursday, 28 November 2019

एक ताजा गीत-नदी में जल नहीं है


एक गीत-नदी में जल नहीं है

धुन्ध में आकाश,
पीले वन,
नदी में जल नहीं है ।
इस सदी में
सभ्यता के साथ
क्या यह छल नहीं है ?

गीत-लोरी
कहकहे
दालान के गुम हो गये,
ये वनैले
फूल-तितली,
भ्रमर कैसे खो गये,
यन्त्रवत
होना किसी
संवेदना का हल नहीं है ।

कहाँ तुलसी
और कबिरा का
पढ़े यह मंत्र काशी,
लहरतारा
और अस्सी
मुँह दबाये पान बासी,
यहाँ
संगम है मगर
जलधार में कल-कल नहीं है ।

कला-संस्कृति
गीत-कविता
इस समय के हाशिये हैं,
आपसी
सम्वाद-निजता
लिख रहे दुभाषिये हैं,
हो गए
अनुवाद हम पर
कहीं कुछ हलचल नहीं है ।

सभी चित्र साभार गूगल


Wednesday, 23 October 2019

एक गीत-बापू ! रहे हिमालय


एक गीत -बापू ! रहे हिमालय
बापू रहे
हिमालय ,उनका
दर्शन गोमुख धारा है ।
यह जलती
मशाल जैसा है
जहाँ-जहाँ अँधियारा है ।

रंगभेद के
प्रबल विरोधी
गिरमिटिया कहलाते थे,
चरखा-खादी
लिए साथ में
रघुपति राघव गाते थे,
सत्य अहिंसा
मन्त्र उन्ही का
मानवता का नारा है ।

छुआछूत
अभिशाप बताते
रहे स्वदेशी को अपनाते,
हिन्दू-मुस्लिम
सिक्ख-ईसाई
सादर सबको गले लगाते,
आज़ादी के
अनगिन तारों में
गाँधी ध्रुवतारा है ।

लड़े गुलामी
और दासता की
अभेद्य प्राचीरों से,
एक लुकाठी
लड़ी हजारों
बन्दूकों-शमशीरों से,
चम्पारण
दांडी का नायक
विजयी था,कब हारा है?

सभी चित्र -साभार गूगल