Thursday, January 11, 2018

आस्था का गीत -यह प्रयाग है




यह प्रयाग है यहाँ धर्म की ध्वजा निकलती है 
प्रयाग में [इलाहाबाद में धरती का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण अध्यात्मिक मेला लगता है चाहे वह नियमित माघ मेला हो अर्धकुम्भ या फिर बारह वर्षो बाद लगने वाला महाकुम्भ हो |इस गीत की रचना मैंने २००१ के महाकुम्भ में किया था और इसे जुना पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज को भेंट किया था |इसे आकाशवाणी इलाहाबाद द्वारा संगीत वद्ध किया गया है |आप सभी के लिए सादर 
यह प्रयाग है
यहां धर्म की ध्वजा निकलती है
यमुना आकर यहीं
बहन गंगा से मिलती है।

संगम की यह रेत
साधुओं, सिद्ध, फकीरों की
यह प्रयोग की भूमि,
नहीं ये महज लकीरों की
इसके पीछे राजा चलता
रानी चलती है।

महाकुम्भ का योग
यहां वर्षों पर बनता है
गंगा केवल नदी नहीं
यह सृष्टि नियंता है
यमुना जल में, सरस्वती
वाणी में मिलती है।

यहां कुमारिल भट्ट
हर्ष का वर्णन मिलता है
अक्षयवट में धर्म-मोक्ष का
दीपक जलता है
घोर पाप की यहीं
पुण्य में शक्ल बदलती है।

रचे-बसे हनुमान
यहां जन-जन के प्राणों में
नागवासुकी का भी वर्णन
मिले पुराणों में
यहां शंख को स्वर
संतों को ऊर्जा मिलती है।

यहां अलोपी, झूंसी,
भैरव, ललिता माता हैं
मां कल्याणी भी भक्तों की
भाग्य विधाता हैं
मनकामेश्वर मन की
सुप्त कमलिनी खिलती है।

स्वतंत्रता, साहित्य यहीं से
अलख, जगाते हैं
लौकिक प्राणी यही
अलौकिक दर्शन पाते हैं
कल्पवास में यहां
ब्रह्म की छाया मिलती है।
पीठाधीश्वर जूना अखाड़ा स्वामी श्री अवधेशानन्द गिरी जी महाराज के श्रीचरणों में सादर समर्पित
चित्र से article.wn.com  साभार

Thursday, December 21, 2017

नववर्ष -दो गीत



चित्र -गूगल से साभार 


दो गीत -नववर्ष 
नववर्ष की मंगलमय शुभकामनाओं सहित 

नये साल तुम 
आना अपना 
रंग -रूप ले प्यारा |
संगम में 
आये गोमुख से 
निर्मल जल की धारा |

मौसम 
मन को जीते 
बोले मृदु संतों की बानी ,
बच्चों के 
सपनों में आये 
फिर परियों की रानी ,
मन्दिर -मस्जिद 
चर्च -पगोडा 
गले मिले गुरुद्वारा |

हल्दी गांठ 
कलाई में हो 
बासंती दिन लौटे ,
मृगनयनी 
आँखों के सहचर 
बनें नये कजरौटे ,
फूलों के संग 
आंख मिचोली 
में दिन बीते सारा |

लोकरंग में 
मन रंग जाये 
उत्सव धूम मचाये ,
चैती ,सोहर 
फगुआ -विरहा 
भोर साँझ संग गाये ,
ढोल -मंजीरा 
सारंगी का 
साथी हो बंजारा |

दो 
बड़ों को 
प्रणाम कहे 
छोटों को प्यार मिले |
नये साल 
आना तो 
सबको उपहार मिले |

रिश्तों को 
धार मिले 
कहकहे दालान को ,
गहगहे 
गुलाब मिलें 
मुरझाते लॉन को ,
बच्चों को 
परीकथा 
तितली ,इतवार मिले |



चित्र -गूगल से साभार 

Wednesday, July 26, 2017

एक गीत -है वंदेमातरम् गीत मेरा

चित्र -गूगल से साभार 



एक गीत -है वन्देमातरम गीत मेरा 

यह दुनिया का स्वर्ग 
इसे हम भारत माता कहते हैं |
इसके पुत्र करोड़ों आपस में 
मिलजुल कर रहते हैं | |

हम सबकी इज्जत करते हैं 
हम सबको गले लगाते हैं ,
हम मानवता के रक्षक हैं 
हम गीत शांति के गाते हैं .
जो हमको आँख दिखाते हैं 
वो खण्डहरों सा ढहते हैं |

है वंदेमातरम् गीत मेरा 
जन गण मन मेरा गान रहे ,
इस मातृभूमि के कण -कण का 
दुनिया भर में सम्मान रहे ,
जिसके सिर छत्र हिमालय है 
चरणों में सागर बहते  हैं |

यह मिटटी कितनी प्यारी है 
अनगिन  रंगों के फूल यहाँ ,
बहुभाषा,संस्कृति बोली का 
ऐसा कोई स्कूल कहाँ ,
एकलव्य यहाँ बन जाते हैं 
जो झोपड़ियों में रहते हैं |
चित्र -गूगल से साभार 

Saturday, June 24, 2017

गंगा की वेदना -एक गीत -जन -जन का पाप हरे स्वयं बुरे हाल में



चित्र -गूगल से साभार 



गंगा की वेदना -एक गीत 

गंगा से प्रेम महज 
पूजा की थाल में |
शहरों में पांव फंसे 
गाद भरे जाल में |

आंख डबडबायी है 
धार धार रोती है ,
नींद में कराह रही 
मैया कब सोती है ,
जाने कब सीता सी 
गुम हो पाताल में |

शंकर के माथे से 
धवल धार आयी थी ,
फूलों की खुशबू से 
सृष्टि महमहायी थी ,
देखता भागीरथ चुप 
माँ को इस हाल में |

वसन हुए मैले सब 
चेहरे पर तेज नहीं ,
काँटों से राह भरी 
फूलों की सेज नहीं ,
एक महासागर थी 
समा गयी ताल में |

शक्तिहीन धारा में 
पर्व हम मनाते हैं ,
टूटते कगारों पर 
स्वस्ति -मन्त्र गाते हैं ,
जन -जन का पाप हरे 
स्वयं बुरे हाल में |
चित्र -गूगल से साभार 

Thursday, March 9, 2017

एक गीत -होली -आम कुतरते हुए सुए से



चित्र -गूगल से साभार 

आप सभी को होली की बधाई एवं शुभकामनाएँ 
एक गीत -होली 

आम कुतरते हुए सूए से 
मैना कहे मुंडेर की |
अबकी होली में ले आना 
भुजिया बीकानेर की |

गोकुल ,वृन्दावन की हो 
या होली हो बरसाने की ,
परदेसी की वही पुरानी
 आदत है तरसाने की ,
उसकी आँखों को भाती है 
कठपुतली आमेर की |

इस होली में हरे पेड़ की 
शाख न कोई टूटे ,
मिलें गले से गले 
पकड़कर हाथ न कोई छूटे ,
हर घर -आंगन महके खुशबू 
गुड़हल और कनेर की |

चौपालों पर ढोल मजीरे 
सुर गूंजे करताल के ,
रुमालों से छुट न पायें 
रंग गुलाबी गाल के ,
फगुआ गाएं या फिर 
बांचेंगे कविता शमशेर की |
[मेरे इस गीत को आदरणीय अरुण आदित्य द्वारा अमर उजाला में प्रकाशित किया गया था मेरे संग्रह में भी है |व्यस्ततावश नया लिखना नहीं हो पा रहा है |

चित्र -गूगल से साभार 

Tuesday, November 15, 2016

एक गीत -बुन रही होगी शरद की चांदनी


चित्र -गूगल से साभार 


एक गीत -बुन रही होगी शरद की चांदनी 

बुन रही होगी 
शरद की 
चांदनी स्वेटर गुलाबी |

दबे पांवों 
सीढ़ियाँ चढ़ 
हम छतों पर टहल आयें ,
कनखियों 
से देखकर फिर 
होठ काटें मुस्कुरायें ,
चलो ढूंढें 
फिर दराजों में 
पुराने ख़त जबाबी |

बांसुरी से 
कहाँ मुमकिन 
कठिन ऋतुओं को रिझाना ,
शाल ओढ़े 
कहीं देवानंद 
बनकर गुनगुनाना ,
नहीं होते हैं 
कहीं संगीत 
चिड़ियों के किताबी |

शून्य में 
अपलक निहारे 
टिमटिमाते हुए तारे ,
अब दिशाओं में 
नहीं माँ बोल 
मीठे हैं तुम्हारे !
कहीं अपनापन 
नहीं है 
ढूंढ आया किचन ,लाबी |


Wednesday, November 9, 2016

एक गीत -ये बनारस है



काशी /बनारस 


एक गीत -ये बनारस है 

ये बनारस है 
यहाँ रेशम न खादी है |
अष्टकमलों से 
महकती हुई वादी है |

वस्त्र तो इसके 
विचारों और मन्त्रों से बुने हैं 
इसे अपना घर स्वयं 
भगवान शंकर भी चुने हैं ,
यहाँ का कण -कण 
अघोरी या नमाजी है |

यहीं पर रैदास की वाणी 
पिघलती है 
गोद में लेकर इसे 
गंगा मचलती है 
यहाँ पूजा ,अर्चना 
प्रातः मुनादी है |

यहाँ घाटों पर 
चिलम के धुंए सजते हैं 
यहीं जीवन -मोक्ष के 
भी छंद रचते हैं 
यहाँ की हर एक सीढ़ी 
सरल -सादी है |

यह समय को रंग 
कितने रूप देता है 
यहाँ तुलसी छाँव 
कबिरा धूप देता है 
सभ्यताओं की 
यही माँ यही दादी है |

आरती गंगा जी की /सभी चित्र गूगल से साभार