Friday, August 3, 2018

दो गीत-कच्चे घर में हम और अज़नबी की तरह






कच्चे घर में हम


बादल 
फटते रहे नशे में
कच्चे घर में हम ।
इन्दर राजा 
इन्द्रलोक में 
पीते होंगे रम।

कर्जदार
सूरज पच्छिम में
बड़े ताल में डूबा,
सूदखोर के
नए लठैतों का
पढ़कर मंसूबा,
बस्ती में
बस कानाफूसी
नहीं किसी को ग़म।

जूते लिए
हाथ में कीचड़-
पानी में उतरे,
खड़ी फसल को
आवारा पशु 
चूहे सब कुतरे,
जितना
बोये बीज खेत में
पाए उससे कम।

दो-अज़नबी की तरह 

अज़नबी की
तरह घर के लोग
ये कैसा चलन है।
हम कहाँ पर
खड़े हैं ऐ
सभ्यता तुझको नमन है।

कहकहे
दालान के चुप
मौन हँसता, मौन गाता,
सभी हैं माँ-पिता
ताऊ,बहन,
भाभी और भ्राता,
महल है
वातानुकूलित
मगर रिश्तों में गलन है।

कई दरवाजे
खुले कुछ बन्द
कुछ ताले लगे हैं,
खिड़कियों पर
धूल ,रोशनदान
पर जाले लगे हैं,
हैं नहीं
सम्वाद घर मे
ट्विटर पर
सबका मिलन है।

अब रसोईघर 
नहीं उपले नहीं 
खपरैल कच्चे,
लॉन में
हिलते हवा से
फूल,भौरें नहीं बच्चे,
वक्त कितना
बेरहम है
या कहें कुछ बदचलन है।
चित्र -साभार गूगल

3 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, चैन पाने का तरीका - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (05-08-2018) को "धोखा अपने साथ न कर" (चर्चा अंक-3054) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. बहुत बढ़िया

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