Wednesday, August 18, 2010

नये शिल्प और नयी वस्तु-चेतना का वाहक नवगीत

हिंदी के वरिष्ठ नवगीतकार -माहेश्वर तिवारी 

परिचय -
हिन्दी साहित्य में जब भी गीत/नवगीत के कवियों का जिक्र होगा, उनमें माहेश्वर तिवारी का नाम बड़े अदब से लिया जायेगा। कागज पर प्रकृति और मानवीय सम्बन्धों का अद्‌भुत चित्रण करने वाला यह कवि हिन्दी कविता मंच पर भी कभी हल्का नहीं हुआ। माहेश्वर तिवारी का जिस कवि सम्मेलन में कविता का सुमधुर पाठ हो उस मंच की गरिमा बढ  जाना स्वाभाविक है। भवानी प्रसाद मिश्र, महादेवी वर्मा, आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री, दिनकर, पंत, बच्चन, नरेश मेहता, ठाकुर प्रसाद सिंह, वीरेन्द्र मिश्र और उमाकान्त मालवीय के साथ मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज करने वाले माहेश्वर के साथ कविता करने वाले नयी पीढ़ी के नईम, ओम प्रभाकर, कैलाश गौतम, रमेश रंजक, शांति सुमन, स्नेहलता स्नेह, भारत-भूषण, रमानाथ अवस्थी, नीरज, रामावतार त्यागी, देवराज दिनेश, डॉ० बुद्धिनाथ मिश्र और सोम ठाकुर प्रमुख रहे। आज की पीढ़ी के साथ भी माहेश्वर जी उतनी ही मुस्तैदी से कविता पाठ कर रहे हैं। २२ जुलाई १९३९ को बस्ती के (अब सन्तकबीर नगर) मलौली गांव में जन्मे माहेश्वर तिवारी महापंडित राहुल सांकृत्यायन की तरह गोरखपुर, बनारस, होशंगाबाद, विदिशा आदि शहरों में यायावरी करते हुए वर्तमान में पीतलों के शहर मुरादाबाद में साहित्य की मशाल जलाये हुए हैं। ''हरसिंगार कोई तो हो', 'सच की कोई शर्त नहीं', 'नदी का अकेलापन' और 'फूल आये हैं कनेरों में' (सद्यः प्रकाशित) नवगीत संग्रह हैं। नवगीत के इस महान उद्‌गाता से गीत/नवगीत के अनछुए पहलुओं पर बातचीत की है जयकृष्ण राय तुषार ने-

प्रश्न- तिवारी जी! आपके विचार में नवगीत क्या है? गीत मूलतः गीत होता है। फिर इसे नवगीत क्यों कहा गया? जबकि काल परिवर्तन के साथ यह नाम पुराना पड़ जायेगा। 

उत्तर - नवगीत आधुनिक काव्यबोध, जिसमें काव्यमूल्यों के साथ-साथ ज्ञानात्मक संवेदन भी है का छांदसिक अनुगायन है। यह बड़बोलेपन से मुक्त आत्मीय संवाद है। इसमें जनपक्षधरता आमजन के संघर्ष, उसके सौन्दर्यबोध आदि जीवन के विविध पक्षों को अभिव्यक्ति का विषय बनाया गया है कविता की अपनी शर्तों के साथ। नवगीत नामकरण के पीछे किसी आन्दोलन का भाव नहीं था। बल्कि ऐतिहासिक और समकालीन रचनात्मकता के दबाव महत्वपूर्ण रहे हैं। परम्परावादी गीत जब नितान्त व्यक्तिगत आत्मरुदन की क्षयशीलता से ग्रस्त होकर असफल प्रेमी की एकान्तिक प्रलाप बना हुआ था, तब आने वाले गीत कवियों के लिए एक चुनौती थी कि वे गीत को इस एकान्तिकता की खोह से निकाल कर उसे अपने समय के मनुष्य एवं उसकी दैनन्दिनी से जोड़े। दूसरी ओर प्रयोगवाद तथा नई कविता के कुछ पुरोधा न केवल गीत बल्कि पूरी छान्दसिकता को दोयम दर्जे की कविता सिद्ध करने पर तुले हुए थे। नये गीत कवियों को दो मोर्चों पर एक साथ जूझना पड  रहा था। एक तरफ था 'बेडरूम' या 'सहेट स्थलों' की ओर ले जाने वाला गीत-

देखती ही न दर्पण
रहो प्राण तुम
प्यार का यह मुहूरत 
निकल जायेगा                    (नीरज)

अथवा

कुछ अंधेरा, कुछ उजाला
क्या शमा है
चांदनी में जो करो
सब कुछ क्षमा है

और दूसरी ओर प्रयोगवादी कविता अथवा नई कविता से जुड़े तथाकथित आधुनिक हिन्दी कवि जो कविता में प्रयोगशीलता के नाम पर विदेशी कविताओं का छायानुवाद प्रस्तुत कर हिन्दी कविता के जातीय पहचान को ही निरस्त करने पर तुले हुए थे। यह अलग बात है कि बिम्बों तथा प्रतीकों आदि का कौशल उनमें था। और यह भी सच है कि शताब्दियों से घिसे-पिटे उपकरणों को लेकर आज की कविता नहीं लिखी जा सकती थी। लेकिन उसके लिए इस मिट्‌टी में भी पर्याप्त सम्भावनायें थीं। उसे नवगती ने पहचाना।

निराला के बाद प्रगतिशील कविता के कुछ कवियों में आने वाले गीतों के प्रस्थान के संकेत मिले, जो उसे नई भूमिका और नई चेतना के साथ ले आने में सफल सिद्ध हुए-

मुझे जगत जीवन का प्रेमी
बना रहा है प्यार तुम्हारा
या
आज मैं अकेला हूं
अकेला रहा नहीं जाता                 (त्रिलोचन)

बाद में वीरेन्द्र मिश्र का पीड़ा वाला गीत आया-

पीर मेरी कर रही
गमगीन मुझको
और उससे भी अधिक
तेरे नयन का 
नीर रानी
और उससे भी अधिक
हर पांव की जंजीर रानी

नवगीत नये शिल्प नयी वस्तु चेतना का वहन करता हुआ आया। इसलिए गीत का नया नामकरण करना आवश्यक हो गया। इसमें निजत्व, पारिवारिकता तथा समाज सब एक साथ उपस्थित हैं। ऐसा परम्परावादी गीत में नहीं था। परम्परावादी गीत सब्जेक्टिव ज्यादा रहा है। जबकि नवगीत में सब्जेक्टिव और आब्जेक्टिव दोनों का प्राधान्य है-

आसमान बाहों में
भर लो
एक और अनहोनी
कर लो

जैसी बातें परम्परावादी गीतों में कहां थी। नवगीत नाम पुराना पड़ जायेगा काल परिवर्तन के साथ यह सोचकर यदि नये समय की रचनाशीलता को कोई नाम न दिया जाय तो किसी हद तक उसे समझने में कठिनाई ही उत्पन्न होगी। दोहा, चौपाई, सोरठा, पद, गीत, नई कविता को क्या केवल कविता मान लेने से उसे समझा जा सकता है जबकि ये सब कविता के ही छान्दसिक विकास क्रम की पहचान हैं। आने वाला समय अपने गीत को र्को नया नाम देगा ही। लेकिन आज के गीत को समझने के लिए 'नवगीत' की संज्ञा उस समय भी महत्वपूर्ण होगी।

प्रश्न- क्या उत्कृष्ट कविता / गीत की सर्जना प्रकृति के रूप-रंग उसकी विविधता से साक्षात्कार के बिना सम्भव नहीं है?

उत्तर - मैंने अपने व्यक्ति को तलाशने के लिए यायावरी की है और गीत के लिए भी। आप अपने समय के मनुष्य का अपनी जातीयता की चेतना से जुड़कर गीत लिखना चाहते हैं तो उसके रंग-गंध को पहचानने तथा चुनने के लिए यायावर बनना पड़ेगा। जीवन के ये रंग और गंध जगह-जगह बिखरे पड़े हैं, उनको चुनने के लिए कवि को ही उन तक जाना ठीक रहेगा। मिठास की अपनी गंध होती है लेकिन चीनी और गुड  की गन्ध में अंतर है। इस गन्ध के अन्तर को ठीक-ठीक समझना एक तरह से जीवन और कविता को ही ठीक तरह से समझना है यदि रचनाकार सिर्फ सजावटी ही नहीं है। वह अपने समय के जीवन से जुड़ा है तो कविता की तलाश में उसे बाहर निकलना ही पड़ेगा।

पाब्लो नेरूदा ने अपने समय के एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कवि की चर्चा करते हुए कहा था कि -' उसने चिड़ियों पर असंखय कविताएं लिखी हैं। लेकिन उसकी रचनाओं में जीवन्तता नहीं है, जीवन का प्रवाह नहीं है, हलचल नहीं है क्योंकि वह अपने उस कमरे में बैठकर कविताएं लिखता था, जिसकी दीवारों पर चिड़ियों के चित्र वाले कैलेण्डर टंगे होते थे।

फूल हंसो, गंध हंसो, प्यार हंसो तुम
हंसिया की धार! बार-बार हंसो तुम            (कैलाश गौतम)

जैसे गीत बन्द कमरे में बैठकर नहीं लिखे जा सकते हैं।

प्रश्न - औद्योगीकरण के इस व्यस्ततम दौर में भी आंचलिकता की मिठास से ओत-प्रोस गीत व्यक्ति को मंत्र-मुग्ध कर देता है। रमेश रंजक शिवबहादुर सिंह भदौरिया, कैलाश गौतम, गुलाब सिंह, डॉ० बुद्धिनाथ मिश्र, नईम, दिनेश सिंह, अमरनाथ श्रीवास्तव, उमाशंकर तिवारी, अनूप अशेष तथा आपके गीतों में आंचलिकता का दर्शन सहज रूप से होता है। क्या आंचलिकता गीत की अनिवार्य शर्त है?

उत्तर - कविता जब मुरझाने लगती है जब वह अंचलों की ओर लौटती है। कविता ही क्या सारी कलाओं के लिए यह सच है। वानगाग ने क्या किया? फ्रांसीसी कला जगत की जड़ता से निकलकर ताजगी के लिए ताहिती चला गया। कुमार गन्धर्व ने भी वही किया। मालवी लोक स्वरों को शास्त्रीयता में पिरोकर गायन को नया अस्वाद प्रदान किया। पाठक और श्रोता के मन में आंचलिकता का एक कोना लगातार उपस्थित रहता है। रचनाकार सिर्फ उस कोने को छू देता है। और वह अपनी महानता का लबादा उतारकर सीधा-साधा संवेदनशील मनुष्य बन जाता है। यह अनिवार्य शर्त तो नहीं है लेकिन सोने में सुहागा अवश्य है।

प्रश्न- छन्दमुक्त कवितायेंआज गद्य के काफी निकट आ गयी हें। वे कौन से तत्व हैं? जो कविता को गद्य से अलग करते हैं?

उत्तर - छान्दसिकता, लयात्मकता और गहरी संवेदनात्मकता कविता और गद्य में अलगाव करती हैं। कविता और गद्य कावाक्य विन्यास भी उन्हें अलगाता है। इसके साथ ही गद्य में एक सपाट पारदर्शिता होती है। उसमें अर्थ की तहें नहीं होती हैं। कविता अगर अपनी शर्तों के साथ है तो वह दो पंक्तियों की भी हो सकती है। गद्य उसी बात को विस्तार से सामने लाता है इस तरह से हम कह सकते हैं कि कविता में भावना का घनत्व होता है, और गद्य में घटना या विस्तार का विस्तार।

प्रश्न- गीत लिखते समय कवि तुकान्त से बंधा होता है, और एक निश्चित खांचे में उसको अपनी बात कहनी होती है। क्या इससे अभिव्यक्ति में कोई संकट उत्पन्न होता है। या तुकान्त सोच को नयी दिशा प्रदान करते हैं?

उत्तर - तुकान्त किसी प्रकार बाधक नहीं होते यह कवि के सामर्थ्य पर निर्भर करता है अन्था कई कवि तुकों का सिर्फ चमत्कारी प्रयोग कर कविता को ही नष्ट कर देते हैं। निराला ने छन्द को तोड़ा अवश्य लेकिन उसकी लयात्मकता को बनाये रखा अपनी अभिव्यक्ति के लिए नया छन्द गढ़ा।

प्रश्न - तारसप्तक की तर्ज पर नवगीत दशक में भी रचनाकारों के वक्तव्य हैं जिससे नवगीत आन्दोलन के बारे में पता चलता है। किन्तु नवगीत स्थापित नहीं हो सकता। क्या इसकी सही व्याखया नहीं हो सकी या आलोचकों की उपेक्षा प्रमुख रही। डॉ० शम्भुनाथ सिंह के बाद ऐसा प्रयास क्यों नहीं हुआ?

उत्तर- तारसत्पक वाली योजना में सम्पादक ने कविताओं के साथ-साथ कवियों का आत्मवक्तव्य भी प्रकाशित किया था। वही सब कुछ नवगीत दशक में भी है। हुआ यह कि प्रयोगवादी तथा नयी कविता के कवियों ने कविता के साथ-साथ एक दूसरे पर गद्य में भी काफी कुछ लिखा। यह बात नवगीत के कवियों के साथ नहीं विकसित हुई। इसके विपरीत नवगीतकार खानों में विभाजित होते गये। और उन्होंने नवगीत को स्थापित करने की अपेक्षा एक दूसरे के विरूद्ध नकारात्मक रुख ज्यादा अपनाया। गीत के प्रति आलोचकों में भी एक उदासीनता रहीं। नये समर्थ आलोचक पैदा नहीं हुए। गीत, नवगीत आलोचना जगत में एक अन्त्यज की भांति त्याज्य बना रहा। नवगीत आन्दोलन में डॉ० शम्भुनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह तथा वीरेन्द्र मिश्र के बाद ऐसा प्रयास यातो नहीं हुआ या ऐसे लोग सामने नहीं आये जो नवगीत की स्थापना का व्यापक प्रयास करते रहे।

नयी कविता के शोर में नवगीत की बांसुरी के स्वर को आलोचकों ने लगातार अनसुना किया उन्होंने आलोचना का जो भद्रलोक बनाया उसमें गीत को कहां जगह थी कविता औरआलोचना दोनों आधुनिकता के नाम पर आश्चात्य विचारों के इतने आतंकपूर्ण प्रभाव में रहे कि अपनी जमीन की ओर देखने के लिए उनके पास अवकाश ही नहीं था। गीत/नवगीत के विरुद्ध एक ऐसी दुरभिसंधि रची गयी, जिसमें उनकी उपेक्षा ही प्रमुख रही।

प्रश्न- समकालीन गद्य पिछड़ रहा है। वर्तमान समय में रचनाकार सीधे कविता से जुड ता है। इलेक्ट्रानिक मीडिया से साहित्य कहां तक प्रभावित है?

उत्तर - ऐसा होना स्वाभाविक है। एक समय में एक ही निराला एक ही रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी या डॉ० रामविलास शर्मा हो सकते है। बड़े व्यक्तियों के लिए फिर लम्बे समय तक प्रतीक्षा करनी पड ती है। संचार माध्यमों में दूरदर्शन के प्रवेश के साथ शब्द से लोगों का अपरिचय बढ़ा है। दृश्य चकाचौंध पैदा करता है। शब्द के प्रभाव की प्रक्रिया धीमी होती है। मेरे एक गीत की पंक्ति है-

डूब गये हैं
हम सब इतने
दृश्य कथाओं में
स्वर कोई भी
शेष नहीं है
बचा हवाओं में
भीतर के
मन की आहट
हम लगता भूल गये

रचना अन्ततः एक संवाद होती है, अपने आप से अपने समय से। अतः यह संवाद ही स्थगित कर दिया गया है तो शेष सारी प्रक्रियायें भी ठप हो जानी हैं। समकालीन गद्य भी इसका शिकार हुआ है। आलोचना विहीन है यह समय और कहानियों से कहानीपन गायब होता जा रहा है। शिल्पगत निखार है लेकिन कथा रस नहीं मिलता है।

प्रश्न - वर्तमान समय में राष्ट्र अभूतपूर्व संकट से गुजर रहा है। दिशाहीनता की स्थिति आ गयी है। साहित्यकार राष्ट्र का सबसे बड़ा सचेतक होता है। वर्तमान समय के साहित्यकार क्या अपने दायित्व का निर्वाह कर रहे हैं जैसा कि स्वतंत्रता आन्दोलन में साहित्यकारों ने अपने दायित्व का निर्वाह किया।

उत्तर - तुषार जी! जब शब्द को ही अनसुना कर दिया गया हो तो साहित्यकार क्या कर सकता है? सही रचनाकार आज भी लोगों को सचेत करने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन उनकी वाणी सुनने और गुनने का लाभ किसे है इसके साथ अब यह भी ध्यान में रखना है कि कभी मध्यकाल में एक सन्त कवि ने कहा था कि 'संतन कूं कहां सीकरी सो काम' आज तथाकथित सारे सन्त (साहित्यकार/कलमकार) सीकरी की गोद में बैठने को तैयार हैं। पदों उपाधियों पुरस्कारों की प्राप्ति के लिए कैसी जोड़-तोड  करते हैं लोग इसे आप भी जानते ही हैं। जब सृजन कर्ता में लालच लोभ के प्रति आसक्ति बढ  जाती है तो वह अविश्वसनीय हो जाता है। फिर समाज जिसका विश्वास ही नहीं करता उसको नेतृत्व कहां से मिलेगा। मुंशी प्रेमचन्द ने साहित्यकार को आगे-आगे चलने वाली मशाल कहा था। अब मशाल तो कोई और बन गया है। रचनाकार सिर्फ मशालची की भूमिका का निर्वाक करता है।

प्रश्न - कवि सम्मेलनों मंचों से कविता का जो स्वरूप सामने आता है वह आमजन को क्या सच्ची काव्यानुभूति से जोड़   पाता है?

उत्तर - मंच से कविता निरंतर अपदस्थ होती गयी और कवित्वविहीन कवियों की संखया निरंतर वहां बढ़ती जा रही है। कुछ अपवादों को छोड  दिया जाय तो मंच पर अब ऐसे अधिकांश कवि हैं, जिनके काव्य पाठ में शब्द और उनसे व्यंजित अर्थ कम बोलते हैं देह ज्यादा बोलती है कवि सम्मेलन अब कविता के मंच कम नाटक नौटंकी के मंच अधिक लगते हैं। जबकि यह भी सच है कि आज देशी-विदेशी प्रसारणों की चकाचौंध में यदि कविता को आमजन से जोड ने का कोई सार्थक बचा रह सकता है तो वह मंच ही है। पाठक कम हो रहे हैं और किसी हद तक श्रोता भी। यह संवादहीनता मंच को उसकी पुरानी गरिमा लौटाकर समाप्त की जा सकती है। मंच को अंततः कविता का मंच बनाकर ही बचा जा सकता है।

Thursday, August 5, 2010

मेरी दो ग़ज़लें

चित्र -गूगल सर्च इंजन  से साभार 
एक 
सलीका बांस को बजने का जीवन भर नहीं होता।
बिना होठों के वंशी का भी मीठा स्वर नहीं होता॥


ये सावन गर नहीं लिखता हसीं मौसम के अफसाने।
कोई भी रंग मेंहदी का हथेली पर नहीं होता॥


किचन में मां बहुत रोती है पकवानों की खुशबू में।
किसी त्यौहार पर बेटा जब उसका घर नहीं होता॥


किसी बच्चे से उसकी मां को वो क्यों छीन लेता है।
अगर वो देवता होता तो फिर पत्थर नहीं होता ॥


परिंदे वो ही जा पाते हैं ऊंचे आसमानों तक।
जिन्हें सूरज से जलने का तनिक भी डर नहीं होता॥




चित्र -गूगल से साभार 


दो 
नये घर में पुराने एक दो आले तो रहने दो,
दिया बनकर वहीं से मां हमेशा रोशनी देगी।


ये सूखी घास अपने लान की काटो न तुम भाई,
पिता की याद आयेगी तो ये फिर से नमी देगी।


फरक बेटे  औ बेटी  में है बस महसूस करने का,
वो तुमको रोशनी देगा ये तुमको चांदनी देगी।


ये मां से भी अधिक उजली इसे मलबा न होने दो,
ये गंगा है यही दुनिया को फिर से जिंदगी देगी॥