Monday, May 30, 2016

दो ग़ज़लें -कवि -प्रताप सोमवंशी

कवि /शायर -प्रताप सोमवंशी 

नाज़िश प्रताप गढ़ी के शहर प्रताप गढ़ में पैदा होकर इलाहाबाद से पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले भाई प्रताप सोमवंशी पेशे से एक चर्चित पत्रकार हैं और हिंदुस्तान दिल्ली संस्करण के सम्पादक हैं |लेकिन मन से गज़लकार |देश की नामचीन पत्रिकाओं में उनकी ग़ज़लें प्रकाशित होती रहती हैं |उनका ग़ज़ल संग्रह -इतवार छोटा पड़ गया शीघ्र हमारे बीच होगा अभी प्रकाशनाधीन है |प्रताप जी की दो गजलें आपके लिए -सादर 


दो ग़ज़लें -कवि -प्रताप सोमवंशी 

एक 
आ जाए कौन कब कहाँ कैसी ख़बर के साथ 
अपने ही घर में बैठा हुआ हूँ मैं डर के साथ 

गर्मी की तेज धूप में कुछ फूल खिले हैं 
बच्चे गली के खेल रहे दोपहर के साथ 

आँखों में ख़्वाब दिल में उम्मीदों के कुछ दीये 
अम्मा ने क्या ये बांध दिया है सफ़र के साथ 

कड़वाहटों ने शख्स को कब्जे में ले लिया 
अमृत अगर वो देगा तो देगा जहर के साथ 

सूफी हैं अपने दौर के सुल्तान भी वही 
अपने उसूल पालते हैं वो भी घर के साथ 

कुछ सच थे जिनको जनता था मानता न था 
अब सब समझ में आने लगा है उमर के साथ 

दो 
हर मौसम का गुस्सा सहना ,धूप -पसीना सीख रहा हूँ 
फुटपाथों के बच्चों जैसा मैं भी जीना सीख रहा हूँ 

एक तजुर्बा दर्जी जैसा कितना कुछ दे जाता है 
ज़ख्मों की तुरपाई करना ,सुख -दुःख जीना सीख रहा हूँ 

वक्त तो एक समुंदर जैसा कोख से सब कुछ उगलेगा 
अमृत पीना सीख रहा हूँ विष भी पीना सीख रहा हूँ 

अपने परों से ढाक के बच्चे बारिश से वो जूझ रही है 
पेड़ पे बैठी एक चिड़िया से रिश्ते जीना सीख रहा हूँ 

महफ़िल में चुपचाप खड़े लोगों को देखा करता हूँ 
एक सलीका सीख रहा हूँ एक करीना सीख रहा हूँ 
चित्र -गूगल से साभार 


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