Sunday, December 13, 2015

कुछ सामयिक दोहे -कवि कैलाश गौतम

स्मृतिशेष कवि -कैलाश गौतम 

कुछ सामयिक दोहे -कवि कैलाश गौतम 

चाँद शरद का मुंह लगा ,भगा चिकोटी काट |
घण्टों सहलाती रही ,नदी महेवा घाट |

नदी किनारे इस तरह ,खुली पीठ से धूप |
जैसे नाइन गोद में ,लिए सगुन का सूप |

तितली जैसे उड़ रही ,घसियारिन रंगीन |
गेहूं कहता दो -नली ,जौ कहता संगीन |

सुअना पंखी गीत के ,खुले हल्दिया बन्द |
जैसे कत्थक नृत्य में ,ताल -ताल में छंद |

काटे से कटती नहीं ,जाड़े की ये रात  |
शाल ,रजाई ,कोयले ,वही ढाक के पात |

शाम हुई फिर जम गये ,सुर्ती ,चिलम ,अलाव |
खेत ,कचहरी ,नौकरी ,गौना ,ब्याह ,चुनाव |

बिन आंगन का घर मिला ,बसे पिया भी दूर |
आग लगे इस पूस में ,खलता है सिंदूर |

धूप भरी ऑंखें मिली,गलियारे की ओट |
जैसे गोरी गाँव की ,मन में लिए कचोट |

शोख सयानी घाटियाँ ,छैल छबीले ताल |
खजुराहो है आइना ,ताजमहल रूमाल |

देख रहा सब -कुछ मगर ,पूछ रहा है कौन |
अभी ठहाका था जहाँ ,वहीं खड़ा है मौन |

ओस नहायी चांदनी ,रंग नहाये फूल |
आते -जाते हो गयी ,वही दुबारा भूल |

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