Sunday, March 24, 2013

एक गीत -इन्द्रधनुष लगता गोरी का गाल कि होली आई है

चित्र -गूगल से साभार 
मित्रों आप सभी को सपरिवार होली की शुभकामनाएँ -इस बार चाह कर भी कोई गीत नहीं लिख सका ,डायरी में एक बहुत पुराना गीत मिला ,वही पोस्ट कर रहा हूँ |गाँव जा रहा हूँ अब कुछ दिन अंतर्जाल से दूर रहूँगा |आशा है आप अपना स्नेह बनाए रक्खेंगे |आभार सहित -

एक गीत -होली आई है 
हवा उड़ाती 
घर -घर रंग -
गुलाल कि होली आई है |
लाज -शरम से 
हुई दिशाएं लाल 
कि होली   आई है |

साँस -साँस में 
गीत समाये ,
नैन इशारे 
हवा बुलाये ,
नदिया गाये फाग 
कबीरा ताल
कि   होली आई है |

मौसम में 
आवारापन है ,
खिली धूप में 
क्वारापन है ,
रंगी अबीरों से 
सूनी चौपाल 
कि होली आई है |

दरपन से भी 
हंसी -ठिठोली ,
शहद हो गयी 
सबकी बोली ,
इन्द्रधनुष लगता 
गोरी का गाल 
कि होली आई है |

गली -गली 
गोकुल -बरसाने ,
बच्चे -बूढ़े 
और सयाने ,
फेंक रहे 
मछली के ऊपर जाल 
कि   होली आई है |

Monday, March 11, 2013

भोपाल से प्रकाशित अन्तरा का गीत विशेषांक -एक अवलोकन

सम्पादक -नरेन्द्र दीपक 
अन्तरा का गीत विशेषांक -एक समीक्षा 

भोपाल मध्य प्रदेश की राजनैतिक राजधानी ही नहीं वरन साहित्यिक और सांस्कृतिक राजधानी भी है | इस शहर की साहित्यिक गतिविधिया समूचे देश को प्रभावित करती हैं | कुछ दिन पूर्व ही जाने -माने कवि भाई नरेन्द्र दीपक ने गीत विधा पर केन्द्रित पत्रिका अन्तरा के प्रकाशन का शुभारम्भ किया था ,जो पाठको के बीच अपनी अलग छवि बनाने में कामयाब रही है | अन्तरा का छठा अंक बहुत ही पठनीय और संग्रहनीय है |यह अंक गीत विशेषांक है | हाल ही में गीत विधा पर कई विशेषांक प्रकाशित हुए है सबकी अपनी -अपनी सम्पादकीय दृष्टि और सोच है ,इसी तरह भाई नरेन्द्र दीपक की अपनी सोच है | अन्तरा के अंक के बारे में यही कहना उचित होगा -सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर ......वास्तव में यह कोई भारी -भरकम अंक नहीं है लेकिन इस अंक में अन्य गीत अंको से बहुत कुछ अलग है | पत्रिका के आरम्भ में तीन महत्वपूर्ण आलेख हैं -हिंदी गीतों का व्यापक वितान लेखक कैलाशचन्द्र पन्त ,नवगीत गीत है पर डॉ0 भारतेन्दु मिश्र का आलेख ,गीतों की सदानीरा नदी नर्मदा पर चन्द्रसेन विराट  का आलेख | ग्यारह छायावादोत्तर प्रमुख कवियों के एक -एक गीत के साथ उन पर चर्चा [आलेख ] इस अंक को संग्रहनीय बनाता है | ये वो कवि है जिनसे गीत विधा को गौरव हासिल हुआ है -रामेश्वर शुक्ल अंचल पर दिवाकर वर्मा का आलेख ,हरिवंशराय बच्चन पर राम अधीर का आलेख ,गोपाल सिंह नेपाली पर डॉ 0 सुरेश गौतम का आलेख शिवमंगल सिंह सुमन पर श्रीराम परिहार का आलेख ,बलवीर सिंह रंग पर डॉ 0 प्रेम कुमारी कटियार का आलेख रमानाथ अवस्थी पर डॉ सुरेश गौतम का आलेख ,वीरेन्द्र मिश्र पर शिवशंकर शर्मा का आलेख पदमविभूषण गोपालदास नीरज पर डॉ0 पशुपतिनाथ उपाध्याय का आलेख ,मुकुटबिहारी सरोज पर सुमेर सिंह शैलेश का आलेख और डॉ0 शिव बहादुर सिंह भदौरिया पर मधु शुक्ला का पठनीय आलेख है | गीत खण्ड के अंतर्गत कुछ चुनिन्दा गीतकारों को ही शामिल किया गया है जिनके नाम इस क्रम में हैं -यश मालवीय ,कुमार रवीन्द्र ,शान्ति सुमन ,मधु शुक्ला ,राजकुमारी रश्मि ,दिनेश शुक्ल ,राम सेंगर ,जयकृष्ण राय तुषार ,रजनी मोरवाल ,किशोर काबरा ,जगदीश श्रीवास्तव ,सत्येन्द्र तिवारी और चन्द्रसेन विराट ,स्तम्भ के अंतर्गत ज्योत्स्ना प्रवाह का आलेख प्रेम एक गीत है पठनीय है |बिलकुल प्रारम्भ में नीरज जी का एक गीत है | कुल मिलाकर सम्पादक नरेन्द्र दीपक का यह बेजोड़ कार्य सराहनीय है और उनकी सम्पादकीय टीम साधुवाद की हक़दार है |गीतों के पतन में स्वयं गीत कवियों की भूमिका प्रमुख रही है मंचीय स्वभाव एक दूसरे पर गद्य में कुछ न लिखना ,अपने से बड़ा गीत कवि किसी को न मानना भी एक कारण है |लेकिन गीत तो प्रकृति की हर लय में समाहित है ,यह कभी ख़त्म ही नहीं हो सकता बस इसका तेवर और कलेवर बदल सकता है |यह विरहाकुल नायिका का दोस्त है तो प्रेम मग्न नायक नायिका को रिझाता है |कभी खेत में काम करते मजदूर का साथ निभाता है तो कभी क्रांति का काम करता है | गीत हमेशा जीवित रहेगा और इसे जीवित रखेगें भाई नरेन्द्र दीपक जैसे जीवट वाले सम्पादक उसे जीवित रखेगें कलम के सिपाही | वाचिक परम्परा का होने के कारण भी गीत कभी खत्म नहीं होगा | गीत की यह मशाल युगों -युगों तक जलती रहे |अन्तरा निरन्तर अपने प्रयास में दिनमान की तरह प्रकाशमान रहे |
-मेरी कलम से 


सिद्ध गीतकार नरेन्द्र दीपक के सम्पादन में निकलने वाली गीतधर्मी पत्रिका अन्तरा का ताज़ा विशेषांक गीत केन्द्रित ही रखा गया है | दीपक जी की रचनात्मक प्रखर दृष्टि और संयोजन में इसे एक सर्जनात्मक चेहरा दे दिया |गीत में हमारी परम्परा और आज का गीत दोनों का ही प्रतिनिधित्व हुआ है | शिवमंगल सुमन जी से लेकर मधु शुक्ला के गीतात्मक संसार से पत्रिका हमें परिचित कराती है |निश्चित रूप से यह अपने समय में दर्ज एक रचनात्मक आन्दोलन है ,जिसकी एक विलक्षण भाव- भूमि अभिभूत करती है |
सुप्रसिद्ध गीत कवि -यश मालवीय 

एक गीत -मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार 
कवि -शिवमंगल सिंह सुमन 
मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार 
पथ ही मुड़ गया था |

गति मिली मैं चल पड़ा 
पथ पर कहाँ रुकना मना था 
राह अनदेखी ,अजाना देश 
संगी अनसुना था |
चाँद -सूरज की तरह चलता 
न जाना रात -दिन है 
किस तरह हम तुम गए मिल 
आज भी कहना कठिन है 
तन न आया मांगने अभिसार 
मन ही जुड़ गया था |

देख मेरे पंख चल ,गतिमय 
लता भी लहलहाई 
पत्र आंचल में छिपाए मुख 
कली भी मुस्कुराई |
एक क्षण को थम गए  डैने 
समझ विश्राम का पल 
पर प्रबल संघर्ष बनकर 
आ गयी आंधी सदल -बल |
डाल झूमी पर न टूटी 
किन्तु पंछी उड़ गया था |

कवि -शिवमंगल सिंह सुमन 

Wednesday, March 6, 2013

भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित चर्चित उपन्यास प्रेम की भूतकथा पर एक परिचर्चा


साहित्यिक समाचार
उपन्‍यास प्रेम की भूतकथा पर गोष्‍ठी
इतिहासरस और किस्सागोई का अदभुत उदाहरण है प्रेम की भूतकथा- दूधनाथ सिंह 
सबसे बाएं उपन्यासकार विभूति नारायण राय ,
प्रोफ़ेसर अली अहमद फातमी ,डॉ o सरवत खान ,
प्रो० सन्तोष भदौरिया और बोलते हुए प्रो० दूधनाथ 

महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के इलाहाबाद क्षेत्रीय केंद्र द्वारा ख्‍यातनाम साहित्‍यकार श्री विभूति नारायन राय के ज्ञानपीठ से प्रकाशित उपन्‍यास ^प्रेम की भूत कथा पर गोष्‍ठी का आयोजन किया गया। गोष्‍ठी की अध्‍यक्षता कर रहे वरिष्‍ठ साहित्‍यकार दूधनाथ सिंह ने कहा कि यह उपन्‍यास उपन्‍यासकार के अनुभव जगत में कैसे आया यह महत्‍वपूर्ण है, पढ़ कर मैं बहुत चकित हुआ विभूति नारायन राय उम्‍दा किस्‍म के किस्‍सागो हैं, उन्‍होंने प्रेम की भूतकथा में नयी डिवाइस और तकनीक का इस्‍तेमाल किया है उपन्‍यास में अदभुत कथारस है, मोड है, संरचनाएं हैं। रविन्‍द्र नाथ टैगोर ने इसे इतिहासरस कहा है। उपन्‍यास में इतिहासरस से अदभुत साक्षात्कार होता है। उन्‍होंने अपने पूर्व के उपन्‍यासों के कथा तत्‍व और शिल्‍प से स्‍पष्‍ट डिपार्चर किया है, उपन्‍यास का गद्य कवित्‍य मय है। मुख्‍य वक्‍ता प्रो. ए.ए. फातमी ने कहा कि, उपन्‍यास में न्‍याय व्‍यवस्‍था पर गहरा तंज है, प्रेम के किस्‍से के साथ जिन्दगी के कशमकश को भी साथ रखा गया है। प्रेम कथा सामाजिक सरोकार को साथ लेकर चलती है। उदयपुर की डा0 सरवत खान जिन्होंने उपन्‍यास का उर्दू में अनुवाद किया है ने कहा कि आज कल बहुत कुछ लिखा जा रहा है किन्‍तु मुहब्‍बत कि कहानिया नजर नहीं आती, विभूति जी के प्रेम चित्रण में फन झलकता है। यह उपन्‍यास जादुई यथार्थवाद का सफल नमूना है। उन्‍होंने इस उपन्‍यास को उर्दू वालों के लिए बहुत अहम बताया। उपन्‍यास के लेखक विभूति नारायन राय ने अपनी रचना प्रकिया को साझा करते हुए कहा कि, गुलेरी की कहानी उसने कहा था में प्रेम का उत्‍सर्ग मेरे लिए हमेशा रोमांचकारी रहा। उस कहानी में मेरे इस उपन्‍यास के लेखन में उत्‍प्रेरक का काम किया यह उपन्‍यास मेरे कई वर्षों के शोध का परिणाम है। उन्‍होंने इसके पढ़े जाने और पसंद किए जाने के लिए पाठक वर्ग का आभार भी व्‍यक्त किया। वक्‍ता हिमांशु रंजन ने प्रेम की भूतकथा को बडे कैनवास की कथा कहा, उन्‍होंने कहा कि उपन्‍यास कार ने इतिहास और परंपरा से ग्रहण करने का विवेक रखा है, शिल्‍प के लिहाज से उनका यह बहुत महत्वपूर्ण उपन्‍यास है। डॉ. गुफरान अहमद खान ने उर्दू वालों के लिए इस उपन्‍यास को एक जरूरी उपन्‍यास कहा। गोष्‍ठी का संयोजन एवं संचालन क्षेत्रीय केंद्र के प्रभारी प्रो. संतोष भदौरिया ने किया। स्‍वागत डॉ. प्रकाश त्रिपाठी ने किया। गोष्‍ठी में प्रमुख रूप से जिआउल हक, हरिश्‍चन्‍द्र पाण्‍डेय, हरिश्‍चन्‍द्र अग्रवाल, नंदल हितैषी, फखरूल करीम, जेपी मिश्रा, नीलम शंकर, संतोष चतुर्वेदी,सुरेद्र राही, असरफ अली बेग, प्रवीण शेखर, हीरालाल, अविनाश मिश्रा, रविनंदन सिंह, शैलेन्‍द्र सिंह, मनोज सिंह, अनिल भदौरिया, बी.एन. सिंह सहित बडी संख्‍या में साहित्‍य प्रेमी उपस्थित रहे।
रिपोर्ट -प्रो० सन्तोष भदौरिया 

सबसे बाएं वक्ता हिमांशु रंजन ,प्रो० दूधनाथ सिंह ,
प्रो० फ़ातमी ,डॉ 0 सरवत खान प्रो० सन्तोष भदौरिया
और बोलते हुए उपन्यासकार विभूति नारायण राय 
परिचर्चा का संचालन करते हुए प्रो० सन्तोष भदौरिया एवं अन्य वक्तागण