Wednesday, January 30, 2013

अप्रवासी भारतीय कवयित्री -पंखुरी सिन्हा की कविताएँ

कवयित्री -पंखुरी सिन्हा 
e-mail-sinhapankhuri412@yahoo.ca
पंखुरी सिन्हा की दो कविताएँ -

परिचय -
जब फूल की कोई पंखुरी अपनी खुशबू को हवाओं के हवाले करती है तो उसकी खुशबू देश और देश की सीमाओं के बाहर लोगों को आह्लादित कर देती है | लेकिन वही पंखुरी जब नारी देह धारण कर कलम की खुशबू बिखेर दे और हिंदी साहित्य के पाठकों को आह्लादित कर दे तो उसे हम पंखुरी सिन्हा के नाम से अपने दिलोदिमाग में दर्ज कर लेते हैं | बिहार राज्य का मुजफ्फरपुर जिला अपनी शाही लीचियों के लिए ,आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री के लिए और प्रसिद्ध है लंगट कालेज के लिए | इसी उर्वर भूमि में एक होनहार युवा कवयित्री का जन्म 18-06-1975 को हुआ था | बचपन से मेधावी इस युवा कवयित्री को C.B.S.E बोर्ड की बारहवीं कक्षा में सर्वोच्च स्थान पाने पर भारत गौरव सम्मान मिला था | देश की नामचीन पत्रिकाओं ने पंखुरी सिन्हा की कविताओं ,कहानियों को आदरपूर्वक प्रकाशित किया है | स्नातक की शिक्षा इन्द्रप्रस्थ कालेज दिल्ली विश्व विद्यालय एवं पत्रकारिता में डिप्लोमा पुणे से किया तो एम० ए० इतिहास सनी बफैलो से किया |तमाम चैनलों से गुजरते हुए लेखन में सक्रियता पत्रकारिता के साथ बनी रही | कोई भी दिन ,[कहानी संग्रह ]किस्सा -ए -कोहिनूर भारतीय ज्ञानपीठ नई दिल्ली से प्रकाशित कथा संग्रह है और कविता संग्रह शीघ्र प्रकाश्य है | वर्तमान में पंखुरी सिन्हा कैलगरी, कनाडा में हैं | गिरजाकुमार माथुर और शैलेश मटियानी सम्मान से सम्मानित इस युवा कवयित्री की दो कविताएँ हम आपके साथ साझा कर रहे हैं |

एक 
उलझना ,कैक्टस फूलने के वक्त में 

और फिर एक नया खेल शुरू हुआ,
कि अगर आप एक ही बात में उलझे हैं,
तो बेकार उलझे हैं,
आगे बढें,
रट लगायें,
पर कोई कैसे भूल जाये,
अपनी उस थोड़ी सी ज़मीन को,
जिसमे वो फूल उगाया करता था,
अलग, अलग रंग के,
अलग, अलग जाति के,
पर सबसे अव्वल,
फूल जो खिला करते थे,
अलग, अलग समय,
तमाम फूल सुबह नहीं,
कुछ शाम को,
कुछ चाँद के स्पर्श से,
और एक कैक्टस जो खिलता था,
आधी रात को,
कैसे भूल जाये कि कब्ज़ा हो गया उस सबकुछ पर,
और ज़मीन जो छावनी बन गई,
मुआवजा तक नहीं मिला उसका,
कोई कैसे उलझा रहे,
उस ज़मीन में?

दो 
डेजर्ट -इफिकेशन [DESERTIFICATION]

कैसे लिखा जाये इंच, इंच बढ़ते रेगिस्तान के ऊपर,
घटते हुए ग्रासलैंड्स के ऊपर ?
क्या हमारे, आपके आहाते में,
पिछवाड़े में,
जो थोड़ी बहुत घास है?
उसका कोई नाता नहीं,
बड़े, बड़े, क्लाइमेट कांफरेंसज़ से,
क्या दुनिया की सारी हरीतिमा,
सारी घास का इकठठा हो जाना,
किन्ही ख़ास घास के मैदानों में,
आधुनिक योजना है?
प्रेएरिज़ और स्ट्तेपिज़ की सारी जंगली हवाओं का,
एक जगह होना,
और सभ्यता का कहीं और?
लेकिन अगर आपने,
घास के मैदानों की वनैली हवाओं पर लिखते, लिखते,
प्रेम कविता लिख डाली,
तो आप रेगिस्तानी गिरफ्त की बात नहीं कर रहे।

--------------पंखुरी सिन्हा

चित्र गूगल से साभार 

Sunday, January 27, 2013

आधुनिक सिनेमा और उर्दू शायरी के कबीर पद्मश्री निदा फ़ाज़ली और उनकी दो ग़ज़लें

सम्पर्क -09869487139
भारत सरकार द्वारा मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली को गणतन्त्र दिवस के मौके पर पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया जाना केवल निदा फ़ाज़ली का सम्मान नहीं वरन यह भारतीय संस्कृति ,हमारी गंगा -जमुनी तहजीब को भी सम्मान मिला है |निदा फ़ाज़ली आधुनिक उर्दू शायरी के कबीर हैं | निदा फ़ाज़ली चाहे अदब हो या सिनेमा शायरी को कभी हल्का नहीं होने देते हैं |निदा साहब भाषा की सहजता के भी कायल हैं |हम सभी कलमकार उनको पद्मश्री दिए जाने पर उन्हें सलाम और प्रणाम करते हैं |उनका परिचय हमारे सुनहरी कलम से ब्लॉग पर मौजूद है |हम उनके सम्मान स्वरूप उनकी दो चर्चित ग़ज़लें आपके साथ साझा कर रहे हैं |  

पद्मश्री निदा फ़ाज़ली जी की दो ग़ज़लें -

एक [पाकिस्तान से लौटकर लिखी गई ग़ज़ल ]
इन्सान तो हैवान यहाँ भी है वहां भी 
अल्लाह निगहबान यहाँ भी है वहां भी 

खूंख्वार दरिन्दों के फ़क़त नाम अलग हैं 
शहरों में बयाबान यहाँ भी है वहां भी 

रहमान की कुदरत हो या भगवान की मूरत 
हर खेल का मैदान यहाँ भी है वहां भी 

हिन्दू भी मज़े में हैं मुसलमाँ भी मज़े में 
इन्सान परेशान यहाँ भी है वहां भी 

उठता है दिलो-जां से धुआं दोनों तरफ़ ही 
ये मीर 'का दीवान यहाँ भी है वहां भी 
दो 
सफ़र में धूप तो होगी ,जो चल सको तो चलो 
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो 

यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता 
मुझे गिरा के अगर तुम संभल सको तो चलो 

हर इक सफ़र को है महफूज़ रास्तों की तलाश 
हिफ़ाज़तों की रिवायत बदल सको तो चलो 

यही है ज़िन्दगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें 
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो 

किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं 
तुम अपने आपको खुद ही बदल सको तो चलो 

Wednesday, January 16, 2013

एक गीत -फिर नया दिनमान आया

चित्र -गूगल से साभार 
एक गीत -फिर नया दिनमान आया 
पर्वतों का 
माथ छूकर 
टहनियों का 
हाथ छूकर 
फिर नया दिनमान आया |
नया संवत्सर 
हमारे घर 
नया मेहमान आया |

सूर्यमुखियों के 
खिले चेहरे 
हमें भी दिख रहे हैं ,
कुछ नई 
उम्मीद वाले 
गीत हम भी लिख रहे हैं ,
ज़ेहन में 
भुला हुआ फिर से 
कोई उपमान आया |

पेड़ पर 
ऊंघते परिन्दे 
जाग कर उड़ने लगे हैं ,
नए मांझे 
फिर पतंगों की
तरफ बढ़ने लगे हैं ,
घना कोहरा 
चीरकर मन में 
नया  अरमान  आया |

नई किरणों 
से नई आशा 
नई उम्मीद जागे ,
पत्तियों के 
साथ ताज़े फूल 
गूँथे नए धागे ,
खुशबुओं का 
शाल ओढ़े 
फिर नया पवमान आया |

खूंटियों पर 
टंगे कैलेन्डर 
हवा में झूलते हैं ,
हम इन्हीं 
को देखकर 
बीता हुआ कल भूलते हैं ,
चलो मिलकर 
पियें काफ़ी 
किचन से फ़रमान आया |
[यह गीत दिनांक 28-01-2013 को दैनिक जागरण के सप्तरंग पुनर्नवा साहित्यिक पृष्ठ पर प्रकाशित हो गया है |हम सम्पादक व सुप्रसिद्ध कथाकार राजेन्द्र राव जी के विशेष आभारी हैं ]
चित्र -गूगल से साभार 

Saturday, January 5, 2013

एक कविता -माँ की चिट्ठी /कवि -अरुण आदित्य

कवि -अरुण आदित्य 
सम्पर्क -08392920836
एक कविता- माँ की चिट्ठी -कवि अरुण आदित्य 

गाँवों की पगडंडी जैसे 
टेढ़े अक्षर डोल रहे है 
अम्मा की ही है यह चिट्ठी 
एक -एक कर बोल रहे हैं 

अड़तालीस घंटे से छोटी 
अब तो कोई रात नहीं है 
पर आगे लिखती है अम्मा 
घबराने की बात नहीं है 

दीया -बत्ती माचिस सब है 
बस थोड़ा सा तेल नहीं है 
मुखिया जी कहते इस जुग में 
दिया जलाना खेल नहीं है 

गाँव -देश का हाल लिखूं क्या 
ऐसा तो कुछ खास नहीं है 
चारो ओर खिली है सरसों 
पर जाने क्यों वास नहीं 

केवल धड़कन ही गायब है 
बाकी  सारा गाँव वही है 
नोन -तेल सब कुछ महंगा है 
इंसानों का भाव वही है 

रिश्तों की गर्माहट गायब 
जलता हुआ अलाव वही है 
शीतलता ही नहीं मिलेगी 
आम -नीम की छाँव वही है 

टूट गया पुल गंगा जी का 
लेकिन अभी बहाव वही है 
मल्लाहा तो बदल गया पर 
छेदों वाली नाव वही है 

बेटा सुना शहर में तेरे 
मारकाट का दौर चल रहा 
कैसे लिखूं यहाँ आ जाओ 
उसी आग में गाँव जल रहा 

कर्फ्यू यहाँ नहीं लगता 
पर कर्फ्यू जैसा लग जाता है 
रामू का वह जिगरी जुम्मन 
मिलने से अब कतराता है 

चौराहों पर यहाँ -वहां 
रिश्तों पर कर्फ्यू लगा हुआ है 
इनकी नज़रों से बच जाना 
यही प्रार्थना यही दुआ है 

तेरे पास चाहती आना 
पर न छूटती है यह मिटटी 
आगे कुछ भी लिखा न जाये 
जल्दी से तुम देना चिट्ठी 

अरुण आदित्य के चर्चित उपन्यास उत्तर वनवास के लोकार्पण
की छवि सबसे बाएं नामवर सिंह बीच में राजेन्द्र यादव और
 सबसे दाएँ उपन्यासकार /कवि अरुण आदित्य 
[अरुण आदित्य हिंदी के जाने -माने कवि और उपन्यासकार हैं |जीविका के लिए एक ईमानदार पत्रकार हैं और सम्प्रति अमर उजाला इलाहाबाद के स्थानीय सम्पादक हैं | उत्तर बनवास इनका महत्वपूर्ण उपन्यास है और यह सब रोज नहीं  होता कविता संग्रह ]