Saturday, January 5, 2013

एक कविता -माँ की चिट्ठी /कवि -अरुण आदित्य

कवि -अरुण आदित्य 
सम्पर्क -08392920836
एक कविता- माँ की चिट्ठी -कवि अरुण आदित्य 

गाँवों की पगडंडी जैसे 
टेढ़े अक्षर डोल रहे है 
अम्मा की ही है यह चिट्ठी 
एक -एक कर बोल रहे हैं 

अड़तालीस घंटे से छोटी 
अब तो कोई रात नहीं है 
पर आगे लिखती है अम्मा 
घबराने की बात नहीं है 

दीया -बत्ती माचिस सब है 
बस थोड़ा सा तेल नहीं है 
मुखिया जी कहते इस जुग में 
दिया जलाना खेल नहीं है 

गाँव -देश का हाल लिखूं क्या 
ऐसा तो कुछ खास नहीं है 
चारो ओर खिली है सरसों 
पर जाने क्यों वास नहीं 

केवल धड़कन ही गायब है 
बाकी  सारा गाँव वही है 
नोन -तेल सब कुछ महंगा है 
इंसानों का भाव वही है 

रिश्तों की गर्माहट गायब 
जलता हुआ अलाव वही है 
शीतलता ही नहीं मिलेगी 
आम -नीम की छाँव वही है 

टूट गया पुल गंगा जी का 
लेकिन अभी बहाव वही है 
मल्लाहा तो बदल गया पर 
छेदों वाली नाव वही है 

बेटा सुना शहर में तेरे 
मारकाट का दौर चल रहा 
कैसे लिखूं यहाँ आ जाओ 
उसी आग में गाँव जल रहा 

कर्फ्यू यहाँ नहीं लगता 
पर कर्फ्यू जैसा लग जाता है 
रामू का वह जिगरी जुम्मन 
मिलने से अब कतराता है 

चौराहों पर यहाँ -वहां 
रिश्तों पर कर्फ्यू लगा हुआ है 
इनकी नज़रों से बच जाना 
यही प्रार्थना यही दुआ है 

तेरे पास चाहती आना 
पर न छूटती है यह मिटटी 
आगे कुछ भी लिखा न जाये 
जल्दी से तुम देना चिट्ठी 

अरुण आदित्य के चर्चित उपन्यास उत्तर वनवास के लोकार्पण
की छवि सबसे बाएं नामवर सिंह बीच में राजेन्द्र यादव और
 सबसे दाएँ उपन्यासकार /कवि अरुण आदित्य 
[अरुण आदित्य हिंदी के जाने -माने कवि और उपन्यासकार हैं |जीविका के लिए एक ईमानदार पत्रकार हैं और सम्प्रति अमर उजाला इलाहाबाद के स्थानीय सम्पादक हैं | उत्तर बनवास इनका महत्वपूर्ण उपन्यास है और यह सब रोज नहीं  होता कविता संग्रह ]

13 comments:

  1. माँ के शब्दों का मोल समझना..यह सीखने की अनवरत प्रक्रिया है..

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  2. वाह....
    बहुत बहुत सुन्दर रचना....
    अड़तालीस घंटे से छोटी
    अब तो कोई रात नहीं है
    पर आगे लिखती है अम्मा
    घबराने की बात नहीं है ..
    माँ का प्रेम और सामजिक सरोकार लिए कविता...
    आभार तुषार जी.

    अनु

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (06-01-2013) के चर्चा मंच-1116 (जनवरी की ठण्ड) पर भी होगी!
    --
    कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि चर्चा में स्थान पाने वाले ब्लॉगर्स को मैं सूचना क्यों भेजता हूँ कि उनकी प्रविष्टि की चर्चा चर्चा मंच पर है। लेकिन तभी अन्तर्मन से आवाज आती है कि मैं जो कुछ कर रहा हूँ वह सही कर रहा हूँ। क्योंकि इसका एक कारण तो यह है कि इससे लिंक सत्यापित हो जाते हैं और दूसरा कारण यह है कि किसी पत्रिका या साइट पर यदि किसी का लिंक लिया जाता है उसको सूचित करना व्यवस्थापक का कर्तव्य होता है।
    सादर...!
    नववर्ष की मंगलकामनाओं के साथ-
    सूचनार्थ!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. रिश्तों की गर्माहट गायब
    जलता हुआ अलाव वही है
    शीतलता ही नहीं मिलेगी
    आम -नीम की छाँव वही है

    हृदयस्पर्शी कविता

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  5. इस कविता को पढ़कर वह गाँव याद आ गया जो चिट्ठी-चिट्ठी शहर पहुँचता था।

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  6. माँ के एक एक शब्द अनमोल,,,
    अरुण आदित्य जी,,,परिचय कराने के लिए आभार,,

    recent post: वह सुनयना थी,

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  7. रिश्तों की गर्माहट गायब
    जलता हुआ अलाव वही है
    शीतलता ही नहीं मिलेगी
    आम -नीम की छाँव वही है

    भावपूर्ण नवगीत

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  8. माँ की इस चिट्ठी ने सब हाल तो कह ही दिया है ..

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  9. अम्मा की चिठ्ठी मेरी पसन्दीदा कविताओं में से है भाई। और अरुण वैसे भी बहुत सरल सहज शब्दों में बात करते हैं।

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  10. Vaah! Ise kahate hai kavitaee. Dil se badhai. Dhanyavaad. - kamal jeet Choudhary ( j and k )

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  11. बहुत बहुत खूब! इसे मैने आपके नाम सहित अपने मित्रों से बांटा और सभी ने आपकी कविता को बेहद पसंद किया! :)

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  12. बहुत बहुत खूब! इसे मैने आपके नाम सहित अपने मित्रों से बांटा और सभी ने आपकी कविता को बेहद पसंद किया! :)

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  13. अनमोल रचना... आभार तुषार जी

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