Wednesday, May 23, 2012

एक नवगीत -डाल के फूलों हमें फिर बाँटना महके हुए दिन

चित्र -गूगल से साभार 
एक गीत -डाल के फूलों हमें फिर बाँटना महके हुए दिन
कोयले की  
आँच जैसे 
हो गए दहके हुए दिन |
डाल के 
फूलों हमें 
फिर बाँटना महके हुए दिन |

इन हवाओं 
के थपेड़े 
हो गए आघात वाले ,
पीतवर्णी 
हो गए पत्ते 
हरी सी गाछ वाले ,
ये चुप्पियाँ 
तोड़ो परिन्दों 
बाँटना चहके हुए दिन |

ओ प्रिये !
तुम वायलिन पर 
फिर मिलन के गीत गाना ,
पथरा गयी 
सम्वेदना के 
पांव में घुँघरू सजाना ,
फिर साँझ 
होते लौट आयें 
भोर के बहके हुए दिन |

पारदर्शी 
आसमानों में 
धुँए छाने लगे हैं ,
बस्तियों में 
तेन्दुए वन 
छोड़कर आने लगे हैं ,
खून के 
छींटे न जिसमें ,
चाहिए टहके हुए दिन |
चित्र -गूगल से साभार 

Tuesday, May 22, 2012

एक नवगीत -खुली हुई वेणी को धूप में सुखाना मत

चित्र -गूगल से साभार 
खुली हुई वेणी को धूप में सुखाना मत 
खुली हुई वेणी को 
धूप में सुखाना मत 
बूंद -बूंद धरती पे गिरने दो |
सूख रही 
झीलों में लहर उठे 
प्यासे इन हँसों को तिरने दो |

तुम्हें देख 
सागर से उमड़ -घुमड़ 
बादल भी धार तोड़ बरसेंगे ,
फूटेंगे 
धानों में कल्ले 
हम बच्चों को दूध -भात परसेंगे ,
हरियाली के 
सपने आयेंगे 
दुर्दिन में इनको मत मरने दो |

धूल भरी आंधी ,
तूफानों को 
हरे -हरे पेड़ों तुम सह लेना ,
मौसम तो 
हरगिज ये बदलेगा 
फिर मन में बात दबी कह लेना ,
दहक रही 
घाटी फिर महकेगी 
फूलों में गन्ध नई भरने दो |

खुरदरी 
हथेलियों में देखना 
मेंहदी के रंग उभर आयेंगे ,
ठूँठों पर 
हाँफते परिन्दे ये 
देख तुम्हें अनायास गायेंगे ,
हम भी 
पद्मावत रच डालेंगे 
अस्त -व्यस्त शाम को सँवरने दो |
चित्र -गूगल से साभार 

Thursday, May 17, 2012

एक नवगीत -हन्टर बरसाते दिन मई और जून के

चित्र -गूगल से साभार 
एक नवगीत -हन्टर बरसाते दिन मई और जून के
हन्टर 
बरसाते दिन 
मई और जून के |
खुजलाती 
पीठों पर 
कब्जे नाख़ून के |

जेठ की 
दुपहरी में 
सोचते आषाढ़ की ,
सूखे की 
चिन्ता में 
कभी रहे बाढ़ की ,
किससे 
हम दर्द कहें 
हाकिम ये दून के |

हाँफ  रही 
गौरय्या
चोंच नहीं दाना  है ,
इस पर भी 
मौसम का 
गीत इसे  गाना है  ,
भिक्षुक को 
आते हैं 
सपने परचून के |

आचरण 
नहीं बदले 
बस हुए तबादले ,
जनता के 
उत्पीड़क 
राजा के लाडले ,
कटे हुए 
बाल हुए 
हम सब सैलून के |

मूर्ति के 
उपासक ही 
मूरत के चोर हुए ,
बापू के 
चित्र टांग 
दफ़्तर घूसखोर हुए ,
नेता के 
दौरे हैं रोज 
हनीमून के |

पैमाइस के 
झगड़े 
फर्जी बैनामे हैं ,
सरपंचों की -
लाठी और 
सुलहनामे हैं ,
अख़बारों 
पर छींटे 
रोज सुबह खून के |
चित्र -गूगल से साभार 

Wednesday, May 9, 2012

एक गीत -एक पत्ता हरा जाने किस तरह है पेड़ पर

चित्र -गूगल से साभार 
एक पत्ता हरा जाने किस तरह है पेड़ पर 
चोंच में 
दाना नहीं है 
पंख चिड़िया नोचती है |
भागते 
खरगोश सी पीढ़ी 
कहाँ कुछ सोचती है |

उगलती है 
झाग मुँह से 
गाय सूखी मेंड़ पर ,
एक पत्ता 
हरा जाने -
किस तरह है पेड़ पर ,
डूबते ही 
सूर्य के माँ 
दिया -बाती खोजती है |

पेड़ की 
शाखों पे 
बंजारे अभी -भी झूलते हैं ,
आज भी 
हम सुपरिचित 
पगडंडियों को  भूलते हैं ,
सास अब भी 
बहू पर 
इल्जाम सारा थोपती है |

धुले आँगन में 
महावर पाँव के 
छापे पड़े हैं ,
दांत में 
ऊँगली दबाये 
नैन फोटो पर गड़े हैं ,
बड़ी भाभी 
ननद को 
खुपिया नज़र से टोकती है |
चित्र -गूगल से साभार