Sunday, December 9, 2012

तम्बुओं के शहर इलाहाबाद का अलबेला कवि -कैलाश गौतम

लोकप्रिय कवि -कैलाश गौतम 
समय [08-01-1944 से 09-12-2006]
आज पुण्यतिथि पर विशेष 
वह विगत कई दशकों का एक अलबेला कवि था | उसकी कविताओं में बनारस की मस्ती और संगम की रेती रची -बसी थी |उसकी कविताओं में पूर्वांचल की सोंधी मिटटी की महक और गमक रची -बसी थी ,मौलिकता का तो कोई जबाब ही नहीं | कोई दूसरा उसके जैसा नहीं हुआ और वह दूसरों के जैसा नहीं हुआ ,बिलकुल अलग ,दूधनाथ सिंह के शब्दों में जमात के बाहर का कवि | रिश्तों -नातों ,संवेदनाओं को सहजता से कविता में ही नहीं वह जीवन में भी बहुत जीवन्तता के साथ जीता था आपको यह बात अतिशयोक्ति  लग रही होगी लेकिन जो लोग कैलाश गौतम से एक बार भी मिले होंगे वो कैलाश गौतम के ही होकर रह गये होंगे |इस कवि का जन्म चंदौली [पहले बनारस ]के डिग्घी गाँव में 08 जनवरी  1944[सर्टिफिकेट के मुताबिक ] हुआ था | इलाहाबाद विश्व विद्यालय से एम० ए० हिंदी करने के बाद आकाशवाणी इलाहाबाद के ग्रामीण कार्यक्रम से जुड़ गये और पंचायत घर कार्यक्रम में गोवर्धन भैया के नाम से लोकप्रिय हो गये | धर्मयुग ,हंस से लेकर देश की सभी नामचीन पत्रिकाओं और पत्रों ने इस कवि की कविताओं को छापा और सराहा | जनता का तो यह अलबेला कवि था ही | क्या राजनेता क्या ऑफिसर सभी लोगों ने इस कवि की कविताओं को पसंद किया | हिंदी मंचों पर कैलाश गौतम अपने समय के लोकप्रिय कवि और मंच संचालन में बेजोड़ कवि उमाकांत मालवीय से जुड़े और फिर पीछे मुडकर कभी नहीं देखे | जोड़ा ताल ,सिर पर आग ,तीन चौथाई आन्हर ,कविता लौट पड़ी ,बिना कान का आदमी[दोहा संग्रह ] कैलाश गौतम की महत्वपूर्ण काव्य कृतियाँ हैं |चिंता नये जूते की व्यंग्य [गद्य ]संग्रह है इसके अतिरिक्त कुछ बाल पुस्तकें भी  हैं |महाकुम्भ पर लिखा अपूर्ण उपन्यास 'तम्बुओं का शहर 'एक अनमोल उपन्यास होता लेकिन वह अपूर्ण और अप्रकाशित रह गया | हिन्दुस्तानी एकेडमी के अध्यक्ष के पद पर रहते हुए 09-12-2006 को यह कवि हमें असमय छोड़ गया | हिंदी कविता और मंच को अभी कैलाश गौतम की बहुत जरूरत थी |आज इस लोकप्रिय कवि की पुण्यतिथि है |हम अपने श्रध्दा सुमन के रूप में कैलाश गौतम के दो गीत यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं |

कैलाश गौतम के दो गीत 
एक -कैसे -कैसे दिन होते थे 
कैसे -कैसे दिन होते थे |
ताल -ताल छूता था कोई 
हम पुरइन -पुरइन होते थे |

धूप -धूप थे हवा -हवा थे 
जवा कुसुम थे पुनर्नवा थे 
लहर -लहर 
होते थे पलछिन 
पलछिन पुलिन -पुलिन होते थे |

एक -एक हिलकोर याद है 
आँख -मिचौली चोर याद है 
बातों में 
तुलसी होते थे 
बातों में लेनिन होते थे |

खुलकर और ठठाकर हँसते 
पानी में गर्दन तक धंसते 
हम जाते थे 
सहज भीड़ से 
रस्ते जहाँ कठिन होते थे |

दो -रामधनी की दुलहिन
मुंह पर 
उजली धूप 
पीठ पर काली बदली है |
रामधनी की दुलहिन 
नदी नहाकर निकली है |

इसे देखकर 
जल जैसे 
लहराने लगता है ,
थाह लगाने वाला 
थाह लगाने लगता है ,
होठों पर है हंसी 
गले 
चाँदी की हंसली है |

गाँव -गली 
अमराई से 
खुलकर बतियाती है ,
अक्षत -रोली 
और नारियल 
रोज चढ़ाती है ,
ईख के मन में 
पहली -पहली 
कच्ची इमली है |

लहरों का कलकल 
इसकी 
मीठी किलकारी है ,
पान की आँखों में 
रहती 
यह धान की क्यारी है ,
क्या कहना है परछाई का 
रोहू मछली है |

दुबली -पतली 
देह बीस की 
युवा किशोरी है ,
इसकी अंजुरी 
जैसे कोई 
खीर कटोरी है ,
रामधनी कहता है 
हंसकर 
कैसी पगली है |

9 comments:

  1. हर दिन कैसे, कैसे, कैसे,
    सब जपते अब पैसे पैसे।

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  2. बहुत अच्छा परिचय...
    सुन्दर रचनाएँ...
    :-)

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  3. बहुत सुन्दर रचनाएँ.....
    कैलाश जी के विषय में जानना भी बहुत अच्छा लगा.
    कैलाश जी को हमारे श्रद्धासुमन.

    आभार
    अनु

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  4. अलबेला कवि की अलबेली रचनाएं..

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  5. भई आपने तो मेरी यादों का पिटारा खोल दिया....आकाशवाणी से उनके श्रीमुख से उनकी रचनाएं सुनने में जो आनन्द आता था वह बताया नहीं जा सकता.......
    सुन्दर संस्मरण...बहुत बहुत बधाई...

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  6. दुबली -पतली
    देह बीस की
    युवा किशोरी है ,
    इसकी अंजुरी
    जैसे कोई
    खीर कटोरी है ,
    रामधनी कहता है
    हंसकर
    कैसी पगली है ।

    सही अर्थों में इन्हें ही गीत कहते हैं।
    कविवर कैलाश गौतम को विनम्र श्रद्धांजलि।

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  7. बहुत अच्छी जानकारी दी

    जयचन्द प्रजापति
    kavitapraja.blogspot.com

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  8. बहुत सुंदर...
    कोलकाता से श्री अजय मलिक जी उपनिेदेशक कार्यान्वयन, गृह मंत्रालय ने आज बतकही में
    इस गीत की चर्चा की। बहुत अच्छी लगी। आनंद आया। द्वितीय पंक्ति में वे स्मृति आधार पर कह रहे हैं...ताल ताल के स्थान पर तार तार कह रहे हैं...कृपया पुष्टि करें। सादर। डॉ. राजीव रावत, हिंदी अधिकारी, आईआईटी खड़गपुर 721302 फोन नं 9564156315

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