Thursday, October 4, 2012

एक गीत -अपना दुःख कब कहती गंगा

हर की पैड़ी हरिद्वार -चित्र गूगल से साभार 
भूगोल की किताबों में भले ही गंगा को नदी लिखा गया हो |दुनिया की किंवदन्तियों में भले ही इसे नदी माना जाता  हो | लेकिन पौराणिक आख्यानों में इसे देवी का दर्जा प्राप्त है |गंगा हमारे लिए माँ है ,यह भारत की जीवन रेखा है |एक गंगा धरती पर बहती है दूसरी हमारी आस्थाओं में प्रवाहमान है |धरती की गंगा भले ही एक दिन हमारे कुकर्मों से हमारी आँखों से हमेशा के लिए ओझल हो जाये या उसका अस्तित्व समाप्त हो जाये |लेकिन  हमारी आस्था में प्रवाहमान गंगा कभी खत्म नहीं होगी |लेकिन क्या सिर्फ़ हमें आस्था में ही गंगा चाहिए या वास्तविकता में |गंगा जैसी औषधीय गुण वाली नदी इतनी खराब स्थिति में क्यों पहुँच गयी |हम अपनी नदियों की पवित्रता क्यों नहीं बचा पा रहे हैं |क्या हम सिर्फ़ सरकार पर दोष मढ़कर बच सकते हैं |हम दुनिया के अन्य देशों की तरह अपनी नदियों को साफ सुथरा क्यों नहीं रख सकते हैं |हमें धार्मिक मान्यताओं की जकड़न से मुक्त होकर गंगा में कूड़ा -कचरा ,माला -फूल ,मूर्ति विसर्जन नहीं करना चाहिए |सरकार तो जिम्मेदार है ही हम कम जिम्मेदार नहीं हैं |अब वक्त आ गया है हमें गंभीरता से सोचना होगा कि हमें जीवनदायिनी नदियाँ चाहिए या गाद या मलबा |जिन नदियों के किनारे हमारे प्राचीन नगर बसे ,जिनके किनारे हमारी सभ्यताएं विकसित हुईं जिनकी छाँव में हमारी परम्पराएँ विकसित हुईं हम उनके प्रति इतने चुप क्यों हैं ,उदासीन क्यों हैं |कुछ आप सब भी सोचिये कुछ सरकार को भी सोचना चाहिए |

एक गीत -अपना दुःख कब कहती गंगा 
स्वर्ग छोड़कर 
चट्टानों में ,
वीरानों में बहती गंगा |
दुनिया का 
संताप मिटाती 
खुद कितने दुःख सहती गंगा |

रहे पुजारिन 
या मछुआरिन 
सबसे साथ निभा लेती है ,
सबके 
आंचल में सुख देकर 
सारा दर्द चुरा लेती है 
आंख गड़े 
या फटे बिवाई 
अपना दुःख कब कहती गंगा |

चित्रकार ,
शिल्पी माँ तेरी 
छवियाँ रोज गढ़ा करते हैं ,
कितने काशी 
संगम तेरे 
तट पर मंत्र पढ़ा करते हैं ,
सागर से 
मिलने की जिद में 
दूर -दूर तक दहती गंगा |

गाद लपेटे 
कोमल तन पर 
थककर भी विश्राम न करती ,
अभिशापित 
होकर आयी हो 
या तुमको प्रिय है यह धरती ,
कुछ तो है 
अवसाद ह्रदय में 
वरना क्यों चुप रहती गंगा |

तेरे जल में 
राख बहाकर 
कितने पापी स्वर्ग सिधरते ,
तेरी अमृतमय 
बूंदों से 
हरियाली के स्वप्न उभरते ,
जो भी डूबा 
उसे बचाती 
खुद कगार पर ढहती गंगा |
चित्र -गूगल से साभार 

11 comments:

  1. प्रभावित करती कविता .

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  2. Dua kartee hun ki is nadee ko qudrat kabhee na mitaye! Ham to tule hue hain mitane pe.

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  3. वर्षों से बस सहती गंगा..

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  4. ganga ka dard sunder tarike se likha hai
    prabhavi kavita
    rachana

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  5. बहुत सुन्दर.....
    हर हर गंगे...

    सादर
    अनु

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  6. आप ने सही चिंता व्यक्त की है ,जिस नदी को माँ का दर्ज़ा दिए गया है अब उसे बचाने के लिए हर व्यक्ति को अपने सत्र पर प्रयास करने होंगे..सिर्फ सरकार के भरोसे रहना व्यर्थ है.
    .......
    कविता भी बहुत अच्छी लिखी है..
    कुछ तो है अवसाद ह्रदय में वरना क्यों चुप रहती गंगा |.......
    सत्य कहा!

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  7. गंगा सी निर्मल रचना के हार्दिक बधाई जयकृष्ण जी!

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  8. मगर आज गंगा को हालत देखकर दुःख भी होता है .

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  9. भाई राजपूत जी गंगा की इसी दुर्दशा का तो हम कविता में चित्रण किये हैं |

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  10. गाद लपेटे
    कोमल तन पर
    थककर भी विश्राम न करती ,
    अभिशापित
    होकर आयी हो
    या तुमको प्रिय है यह धरती ,
    कुछ तो है
    अवसाद ह्रदय में
    वरना क्यों चुप रहती गंगा |

    प्रश्न स्वाभाविक है और विचारणीय भी.
    बहुत सुंदर प्रस्तुति.

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