Wednesday, September 12, 2012

एक समीक्षा -गज़ल संग्रह 'ख़्वाब पत्थर हो गए '

शायर -मनीष शुक्ला 
एक समीक्षा -गज़ल संग्रह- ख़्वाब पत्थर हो गए
मनीष शुक्ला का प्रथम गज़ल संग्रह

गुज़िस्ता मौसमों को याद करके |
परिन्दे  रो पड़े    फ़रियाद  करके |

भले हासिल हुआ कुछ भी न लेकिन |
जहां खुश है    हमें    बरबाद    करके 
                शायर -  मनीष शुक्ला 

अच्छा लिखना ,अच्छा दिखना ,अच्छा सुनना अच्छा बोलना और वास्तव में अच्छा होना शायर मनीष शुक्ला  की सबसे बड़ी खूबसूरती है |शायद पुराने लखनऊ का असर है | मनीष शुक्ला  का एक खूबसूरत गज़ल संग्रह'ख़्वाब पत्थर हो गए ' बड़े ही शानदार ढंग से हमारे बीच हाल ही में आया है |प्रशासनिक व्यस्तताओं के बावजूद मनीष शुक्ल एक बेहतरीन शायर हैं |मनीष शुक्ल की पुस्तक -ख़्वाब पत्थर हो गये का शानदार ढंग से विमोचन संगीत नाटक अकादमी लखनऊ में 02-09-2012 को प्रो० फजले इमाम ,प्रो० मालिक जादा मंजूर प्रो० शारिव रुदौलवी के  द्वारा किया गया |मनीष शुक्ला  बदलते दौर के शायर है आज की विषम परिस्थितयों पर उनकी पैनी नज़र है |उनकी शायरी रिवायती  उर्दू  शायरी के अधिक निकट है |विगत दस वर्षों से मनीष जी की ग़ज़लें  उर्दू की पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं |लेकिन समय के साथ विकसित होती हिंदी गज़ल की शब्दावली से मनीष जरा भी परहेज नहीं करते हैं |अभी इस शायर का यह प्रथम गज़ल संग्रह है जो हिंदी और उर्दू दोनों में एक साथ प्रकाशित हुआ है -पुस्तक की भूमिका में प्रो० शारिव रुदौलवी लिखते हैं 'मनीष शुक्ला गज़ल के शायर हैं और अभी उन का शेरी असासा बहुत नहीं है ,लेकिन उन्होंने जिस तरह गज़ल को बरता वो दिलों पर असर करने वाला है |इसका सबब उनका बेतकल्लुफ़ इज़हार है |आज की जिंदगी का सबसे बड़ा मसअला मसरूफ़ियत है |हर शख्स छोटा हो या बड़ा आप को मसरूफ़ ही नज़र आएगा |तेज़ रफ़्तार सवारियों ने आमद -ओ -रफ़्त की मुद्दत को कम कर दिया |इसके बावजूद दूसरों की बात तो दूर रही खुद अपने से मुलाकात नहीं होती |....प्रो० रुदौलवी आगे लिखते हैं और जरा सी ज़ाती कर्ब से हटकर देखिए तो मनीष शुक्ला के यहाँ आज की ज़िन्दगी की वो तस्वीरें भी नज़र आएँगी जिन से अक्सर हमारी तहज़ीब ,मुहब्बत और रवादारी को शर्मसार होना पड़ा है -

हर इक चेहरा बहुत सहमा हुआ है |
तिरी बस्ती को आखिर क्या हुआ है |

ज़रा सोचो कोई तो बात होगी |
कोई रस्ते पे क्यूँ बैठा हुआ है |

ख़्वाब पत्थर हो गए का प्रकाशन स्काईलार्क प्रकाशन ,जानकीपुरम लखनऊ से हुआ है | पुस्तक का कवर मनीष जी की धर्मपत्नी श्रीमती अन्तिमा शुक्ला जी ने बहुत ही खूबसूरत ढंग से किया है |मूल्य की दृष्टि से भी पुस्तक मात्र एक सौ पच्चीस रूपये की है जो समय के हिसाब से बहुत उचित और पाठक की पहुँच में है |मनीष जी को इस गज़ल संग्रह [ख़्वाब पत्थर हो गए] के लिए बधाई और ढेरों शुभकामनाएँ | मनीष शुक्ला का संपर्क -09415101115
मनीष शुक्ल के गज़ल संग्रह ख़्वाब पत्थर हो गए का विमोचन-
 02-09-2012 को लखनऊ के संगीत नाटक अकादमी सभागार
 में हुआ |सबसे बाएं मिर्ज़ा शफीक हुसैन शफक उसके बाद प्रो० 
मालिक ज़ादा मंजूर उनके बगल में शारिव रुदौलवी और उनके 
बगल में  प्रो० फजले इमाम और सबसे दाएँ कवि मनीष शुक्ला  
विमोचन समारोह में उपस्थित सम्मानित श्रोतागण 

14 comments:

  1. मनीषजी को ढेरों बधाईयाँ..

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  2. इस पोस्ट के लिए आभार तुषार जी...
    मनीष जी को बधाइयां एवं शुभकामनाएं..
    सादर
    अनु

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  3. मनीष जी को ढेरों बधाइयां,,,
    तुषार जी आपका बहुत२ आभार,,,,,,

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  4. पुस्तक परिचय अच्छा लगा।

    भले हासिल हुआ कुछ भी न लेकिन |
    जहां खुश है हमें बरबाद करके
    यह शे’र बहुत अच्छा लगा।

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  5. zarranawazi ke liye bahut bahut shukria tushar ji, aur sabhi tippanikartao'n ko hardik dhanyawad

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  6. मनीषजी को ढेरों बधाईयाँ..

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  7. मनीष जी को बधाई... शुभकामनाएं..

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  8. manishji ko bahut bahut badhaiyan aur shubhkamnaye...

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  9. मनीष शुक्ल के गज़ल संग्रह'ख़्वाब पत्थर हो गए ' को पढने के बाद एहसास होता है की नौजवान शायरों की खेप में वे बड़े ही शानदार ढंग से हमारे बीच हाज़िर हैं. मैं इस रस्मे इजरा पर हाज़िर था ... खुद को सम्मानित महसूस कर रहा हूँ.

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  10. Is khoobsurat Kitaab ki jaankaari ka bahut bahut shukriya...Main Manish ji se sampark kar is kitab ko paane ki baat karta hoon.


    Neeraj

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  11. मनीष जी एक उम्दा गज़लकार ही नहीं एक बेमिसाल इंसान भी हैं -आपने उनके कृतित्व की इस समीक्षा से छान्दसिक अनुगायन की प्रतिष्टा में चार चाँद ही लगाया है -मैं उनकी रचनाएं पढता रहा हूँ -कथ्य और भाव्भ्य्कती में मौलिक और बेजोड़ हैं वे !

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  12. *भावाभिव्यक्ति!

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