Friday, August 3, 2012

बादल आ गए -कवि - कैलाश गौतम

लोकप्रिय कवि -कैलाश गौतम 
समय -[08-01-1944से 09-12-2006]
एक गीत -लो पढ़ो यह आज का अखबार बादल आ गए -कैलाश गौतम 
आ गए 
उस पार से इस पार 
बादल आ गए |
लो पढ़ो 
यह आज का अखबार 
बादल आ गए |

पर्वतों को लाँघते 
झकझोरते जंगल 
हवा से खेलते बादल ,
घाटियों को गुदगुदाते 
छेड़ते झरने 
शिलाएँ ठेलते बादल ,
लिख गई 
चारो तरफ जलधार 
बादल आ गए |

केवड़े फूले 
पकी जामुन ,नदी लौटी 
पसीना खेत में महका ,
घाट पर फूटे घड़े 
पनिहारिनें बिछ्लीं 
कछारों में हिरन बहका 
भीड़ में 
खुलकर मिले त्यौहार 
बादल आ गए |

भीड़ के हाथों लगी 
झूले चढ़ीं 
मीठी फुदकती कजलियाँ भोली 
घर चलो 
मेरी पहाड़ी नगीनों अब 
गुनगुनाती तितलियाँ बोलीं 
पटरियों से 
उठ गए बाज़ार 
बादल आ गए |
चित्र -गूगल से साभार 

7 comments:

  1. वाह...
    बहुत सुन्दर..
    सादर
    अनु

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  2. बहुत मनभावन प्रस्तुति...

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  3. सच कहा, अब तो बादलों का आना भी खबर बन गयी है।

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  4. लोकप्रिय कवि -कैलाश गौतम की रचना पढवाने के लिए,,,,आभार

    RECENT POST काव्यान्जलि ...: रक्षा का बंधन,,,,

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  5. पर्वतों को लाँघते
    झकझोरते जंगल
    हवा से खेलते बादल ,
    घाटियों को गुदगुदाते
    छेड़ते झरने
    शिलाएँ ठेलते बादल ,
    लिख गई
    चारो तरफ जलधार
    बादल आ गए |
    ______________________________


    अब बादलों का आना अखबार में कभी क्भार छपने वाली किसी सुखद खबर सा लगता है।

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  6. भाव प्रधान रचना के लिए शुक्रिया ...

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  7. पूरा श्रावण परिदृश्य खींच दिया...धन्यवाद...रचना साझा करने के लिए...

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