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| शायर -हसनैन मुस्तफ़ाबादी सम्पर्क -09415215064 रजिस्ट्रार जनरल ऑफिस हाईकोर्ट इलाहाबाद |
हसनैन मुस्तफ़ाबादी इलाहाबाद के वरिष्ठ और नामचीन शायर हैं |ऐसे ही शायरों /कवियों से इलाहाबाद शहर की गंगा -जमुनी तहजीब कायम है |इलाहाबाद विश्व विद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम० ए० ,और कानून में स्नातक [M.A,LL.B]हसनैन मुस्तफ़ाबादी का वास्तविक नाम गुलाम अबुल हसनैन है |आप इलाहाबाद उच्च न्यायालय में संयुक्त निबन्धक सह निजी सचिव रजिस्ट्रार जनरल हैं |उच्च न्यायालय में जी० ए० हसनैन के नाम से अधिक लोकप्रिय हैं |हसनैन मुस्तफ़ाबादी का जन्म तत्कालीन इलाहाबाद विभाजन के बाद अब कौशाम्बी जनपद में 30-11-1955 में हुआ था |इनके पिता का नाम बशारत हुसैन नकवी था |उस्ताद जनाब जिया गाज़ीपुरी थे |हसनैन मुस्तफ़ाबादी स्वाभाव से मिलनसार और विनम्र हैं |लेकिन उच्च न्यायालय में अत्यधिक व्यस्तता होने के कारण शायरी के लिए अधिक समय निकलना इनके लिए मुमकीन नहीं हो पाता | इनके लेखन या शायरी की विधा गज़ल ,नज्म ,रुबाई ,कसीदा सभी हैं |हसनैन साहब की ग़ज़लें पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं |आज हम अन्तर्जाल पर उनकी एक गज़ल और कुछ चुनिन्दा अशआर आप तक पहुँचा रहे हैं |
कुछ चुनिन्दा अशआर और एक गज़ल -शायर हसनैन मुस्तफ़ाबादी
इस दौर में सच्चाई ढूँढे से नहीं मिलती
कुछ चुनिन्दा अशआर और एक गज़ल -शायर हसनैन मुस्तफ़ाबादी
इस दौर में सच्चाई ढूँढे से नहीं मिलती
अफवाहों की दुनिया में नायब सदाकत है .
परदे में दोस्ती के है नफ़रत भरी हुई
अब तो मुनाफकत भी मुहब्बत का नाम है
राह में उल्फत की जो कांटा गड़ा वह रह गया
हूँ तो मंज़िल पर मगर वह चुभ रहा है आज भी
अब मेरे आँसू भी मेरा साथ दे पाते नहीं
सामना है रोज मेरा एक नई उफ़ताद से
वह उलझ जाते हैं मुझसे छोटी -छोटी बात पर
मैं समझता हूँ कि ये भी हुस्न के जौहर में है
दामन का चाक चाके गरेबाँ से मिल गया
इतना बढ़ा जुनूं दिले खाना खराब का
सूये मन्जिल जो नहीं चलते हैं रस्ता देखकर
ठोकरें हमराह हो जाती हैं अन्धा देखकर
ऑंखें बचा के आये अयादत के वास्ते
क्यों जल गया हसद से कलेजा जनाब का
क्या बताऊँ बेरुखिये हुस्न क्या -क्या कर गई
उनको भी रुसवा किया मुझको भी रुसवा कर गई
पहलू बदलना छोड़िये मक्कार की तरह
जिसकी तरफ भी रहिये तरफदार की तरह
ऑंखें बचा के आये अयादत के वास्ते
क्यों जल गया हसद से कलेजा जनाब का
क्या बताऊँ बेरुखिये हुस्न क्या -क्या कर गई
उनको भी रुसवा किया मुझको भी रुसवा कर गई
पहलू बदलना छोड़िये मक्कार की तरह
जिसकी तरफ भी रहिये तरफदार की तरह
ग़ज़ल
आपसी यकसानियत लाजिम है उलफत के लिए
दूरियाँ बन जाती हैं मेआर नफरत के लिए
बदगुमानी से हमेशा बच के रहना चाहिए
इक गलतफहमी ही काफी है कुदूरत के लिए
कोई रंग हरगिज नहीं चढ़ता है काले रंग पर
नस्ल अच्छी चाहिए अच्छी नसीहत के लिए
बढ़ के एक दिन राख कर देगा बहारे जिन्दगानी
दिल न गैरों का जलाओ अपनी शोहरत के लिए
कब रउनत अपने बंदे की खुदा को है पसंद
खाकसारी रौशनी होती है जुल्मत के लिए
आह से बचना यतीमों की हमेशा चाहिए
है यही हसनैन बेहतर आदमियत के लिए



9 Comments:
hasnain sahab bahut umda shayar hain.
....लाज़वाब अहसास...दिल को छूती बहुत सुन्दर प्रस्तुति..
बेहद शानदार अशआर.....
हसनैन साहब के बारे मैं जान कर अच्छा लगा .. और उनकी शायरी भी बहुत पसंद आई ... आभार
bahut hi umda rachna,bdhai....
Bahut Umda...
पहलू बदलना छोड़िये मक्कार की तरह
जिसकी तरफ भी रहिये तरफदार की तरह
बदगुमानी से हमेशा बच के रहना चाहिए
इक गलतफहमी ही काफी है कुदूरत के लिए
bahut badhiya
बहुत खूब, परिचय का आभार..
राह में उल्फत की जो कांटा गड़ा वह रह गया
हूँ तो मंज़िल पर मगर वह चुभ रहा है आज भी ..
बहुत खूब ... हसनैन साहब के शेर उनके अदब की कहानी कह रहे हैं ... उनको जनन्ना बहुत ही अच्छा लगा ...
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