Thursday, March 1, 2012

प्रकाश सिंह अर्श की ग़ज़लें

युवा कवि -प्रकाश सिंह अर्श 
सम्पर्क -09811547653
हिन्दी और भोजपुरी के ख्यातिलब्ध कवि कैलाश गौतम एक गीत में कहते हैं कि -आज का मौसम कितना प्यारा /कहीं चलो ना जी /बलिया, बक्सर,पटना ,आरा /कहीं चलो ना  जी |आरा में जरूर कोई खास बात होगी जो बिहार के इस भोजपुर के इलाके की ओर कवि को बरबस खींच ले गयी |आधुनिक शिक्षा -दीक्षा और परिवेश के बावजूद आज के दौर में कई युवा हैं जिनका गम्भीर लेखन साहित्य की दशा  और दिशा को बदल रहा है |प्रकाश सिंह अर्श भी उन्ही युवाओं में से एक हैं जो प्रबन्धन के क्षेत्र में रहते हुए उम्दा ग़ज़लें कह रहे हैं |बिहार का जनपद आरा साहित्य के लिए तो जाना पहचाना जाता ही है |यह जनपद क्रन्तिकारी बाबू कुँवरसिंह के नाम से भी जाना और पहचाना जाता है |प्रकाश सिंह अर्श का जन्म इसी जनपद की मिटटी में गाँव -खननी कलां में  02-01-1981को हुआ था | प्रकाश सिंह अर्श की यह जन्म तिथि सर्टिफिकेट में दर्ज़ है |मुजफ्फरपुर के प्रसिद्ध लंगट सिंह  कालेज से स्नातक अर्श ने एम० बी० ए० की डिग्री हासिल किया |लंगट सिंह वही कालेज है जहाँ भारत के प्रथम राष्ट्रपति बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने अध्ययन और अध्यापन दोनों ही किया था |इस समय प्रकाश सिंह अर्श इण्डिया बुल्स में असोसिएट वाइस प्रेसिडेन्ट हैं |प्रकाश सिंह अर्श अन्तर्जाल की दुनिया में सक्रिय हैं फिर भी हम आपसे इस होनहार युवा गज़लकार का परिचय करा रहे हैं |
प्रकाश सिंह अर्श की ग़ज़लें -
एक 
उक़ताए हुये क्यूँ हो कहो ख़ैरियत तो है 
घबराए हुये क्यूँ हो कहो ख़ैरियत तो है

ऐसा भी क्या किया है तुम्ने वफ़ा के साथ
कतराए हुये क्यूँ हो कहो ख़ैरियत तो है 

आँखों में तेरे सारे फ़सानें हैं रात के 
शर्माए हुये क्यूँ हो कहो ख़ैरियत तो है 

सारा जहान जानता है दौलत नई नई 
अगराए हुये क्यूँ हो कहो ख़ैरियत तो है 

लुटने का मज़ा भी तो कभी आप लिजिये 
झुंझ्लाए हये क्यूँ हो कहो ख़ैरियत तो है 
दो 
बडी हसरत से सोचे जा रहा हूँ
तुम्हारे वास्ते क्या क्या रहा हूँ

वो जितनी बार चाहा पास आया
मैं उसके वास्ते कोठा रहा हूँ 

कबूतर देख कर सबने उछाला
भरी मुठ्ठी का मैं दाना रहा हूँ 

मैं लम्हा हूँ कि अर्सा हूँ  कि मुद्दत
न जाने क्या हूँ बीता जा रहा हूँ 

मैं हूँ तहरीर बच्चों की तभी तो
दरो-दीवार से मिटता रहा हूँ 

सभी रिश्ते महज़ क़िरदार से हैं
इन्ही सांचे मे ढलता जा रहा हूँ 

जहां हर सिम्‍त रेगिस्‍तान है अब
वहां मैं कल तलक दरिया रहा हूँ
तीन 
हम दोनों का रिश्ता ऐसा, मैं जानूँ या तू जानें
थोडा खट्टा- थोडा मीठा, मै जानूँ या तू जानें 

सुख दुख दोनों के साझे हैं फिर तक्‍सीम की बातें क्‍यों
क्या -क्या हिस्से में आयेगा मैं जानूँ या तू जानें

किसको मैं मुज़रिम ठहराउँ, किसपे तू इल्ज़ाम धरे
दिल दोनों का कैसे टूटा मैं जानूँ या तू जानें

धूप का तेवर क्यूं बदला है , सूरज क्यूं कुम्हलाया है 
तू ने हंस के क्या कह डाला , मैं जानूँ या तू जानें

दुनिया इन्द्र्धनुष के जैसी रिश्तों मे पल भर का रंग
कितना कच्चा कितना पक्का मैं जानूँ या तू जानें

इक मुद्दत से दीवाने हैं हम दोनों एक दूजे के 
मैं तेरा हूँ तू है मेरा , मैं जानूँ या तू जानें
चित्र -गूगल से साभार 

8 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर....परिचय का आभार....

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  2. सुन्दर गज़लें..
    शुक्रिया तार्रुफ के लिए..

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  3. तुषार जी,
    सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई धन्यवाद व आभार

    ग़ज़ल पर बाद में कमेन्ट करूँगा :)

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  4. बढ़िया गजल के साथ ही सुन्दर प्रस्तुति ..

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  5. इक मुद्दत से दीवाने हैं हम दोनों एक दूजे के
    मैं तेरा हूँ तू है मेरा , मैं जानूँ या तू जानेंbahut sundar prastuti.

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  6. बहुत शुक्रिया तुषार जी , जिस तरह आपने मुझे नवाज़ा है अपने बेहतरीन लफ़्ज़ों की अदायगी से, और जो जगह दि है आपने अपने ब्लोग पर उसके लिये सिर्फ शुक्रिया बहुत कम है ! प्रवीण जी विद्या जी के.शमा जी, रेखा जी, डा. निशा जी और वीनस को बहुत बहुत शुक्रिया मेरी ग़ज़ल को पसन्द करने के लिये और स्नेह बरपाने के लिये !
    तुषार जी एक बार फिर से आपका बहुत बहुत शुक्रिया ... ऐसे ही स्नेह बनाए रखें !
    इससे और अच्छा लिखने के लिये और ताक़त मिलती है!


    आप सभी का
    अर्श

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  7. क़ामयाब ग़ज़ल के लिये बधाई. इन शे’रों के लिये विशेष बधाई -
    वो जितनी बार चाहा पास आया
    मैं उसके वास्ते कोठा रहा हूँ

    धूप का तेवर क्यूं बदला है , सूरज क्यूं कुम्हलाया है
    तू ने हंस के क्या कह डाला , मैं जानूँ या तू जानें

    वाह !!

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